देव — हँसी की चोट; सपना; दरबार – Class 11 Hindi Chapter 11 Notes & NCERT PDF
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पाठ 11: देव — हँसी की चोट; सपना; दरबार
कवि-परिचय
महाकवि देव (सन् 1673–1767) का जन्म इटावा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था। औरंगज़ेब के पुत्र आलमशाह के संपर्क में आने के बाद उन्होंने अनेक आश्रयदाता बदले, पर सबसे अधिक संतुष्टि भोगीलाल नामक सहृदय आश्रयदाता के यहाँ मिली, जिन्होंने प्रसन्न होकर उन्हें लाखों की संपत्ति दान की। दरबारों का आडंबरपूर्ण और चाटुकारिता-भरा जीवन निकट से देखने के कारण देव को उससे वितृष्णा हो गई।
1. हँसी की चोट (सवैया)
साँसनि ही सौं समीर गयो अरु, आँसुन ही सब नीर गयो ढरि।
तेज गयो गुन लै अपनो, अरु भूमि गई तन की तनुता करि॥
'देव' जियै मिलिबेही की आस कि, आसहू पास अकास रह्यो भरि,
जा दिन तै मुख फेरि हरै हँसि, हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि॥
भावार्थ: यह विप्रलंभ (वियोग) शृंगार का उदाहरण है। कृष्ण के मुँह फेर लेने से गोपी हँसना भूल गई है। शरीर के पाँच तत्त्वों में से —
जिस दिन से हरि ने मुस्कराकर, देखकर हृदय हर लिया और फिर मुँह फेर लिया, तब से गोपी केवल मिलन की आशा पर जीवित है।
2. सपना (कवित्त)
झहरि-झहरि झीनी बूँद हैं परति मानो,
घहरि-घहरि घटा घेरी है गगन में।
आनि कह्यो स्याम मो सौं 'चलौ झूलिबे को आज'
फूली न समानी भई ऐसी हौं मगन मैं॥
चाहत उठ्योई उठि गई सो निगोड़ी नींद,
सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में।
आँख खोलि देखौं तौ न घन हैं, न घनश्याम,
वेई छाई बूँदैं मेरे आँसु ह्वै दृगन में॥
भावार्थ: सपने में वर्षा की झीनी बूँदें झड़ रही हैं, आकाश में घटाएँ घुमड़ रही हैं। श्याम आकर कहते हैं — "चलो, आज झूला झूलें।" गोपी फूली नहीं समाती। वह उठना ही चाहती थी कि निर्दयी नींद टूट गई — जागने से उसके भाग्य ही सो गए। आँख खोलकर देखती है तो न बादल हैं, न घनश्याम — वही बूँदें अब उसकी आँखों में आँसू बनकर छा गई हैं। यहाँ संयोग से वियोग में बदलने का मार्मिक चित्रण है।
3. दरबार (सवैया)
साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी, रंग रीझ को माच्यो।
भूल्यो तहाँ भटक्यो घट औघट बूढ़िबे को काहू कर्म न बाच्यो॥
भेष न सूझ्यो, कह्यो समझ्यो न, बतायो सुन्यो न, कहा रुचि राच्यो।
'देव' तहाँ निबरे नट की बिगरी मति को सगरी निसि नाच्यो॥
भावार्थ: यह पतनशील, निष्क्रिय सामंती व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है। राजा अंधा (विवेकहीन) है, दरबारी गूँगे (चाटुकार, सच न बोलने वाले) हैं, सभा बहरी है — फिर भी रंग-रीझ (भोग-विलास) मचा है। कलाकार वहाँ भटकता रहा, डूबने (पतन) का कोई कर्म बचा नहीं; उसका वेश किसी ने देखा नहीं, कहा किसी ने समझा नहीं, बताया किसी ने सुना नहीं। देव कहते हैं — ऐसे दरबार में भटका हुआ कलाकार (नट) अपनी बिगड़ी बुद्धि से सारी रात व्यर्थ नाचता रहा। गुणग्राहकता और कला की परख का पूर्ण अभाव है।
शब्दार्थ
काव्य-सौन्दर्य
परीक्षा हेतु
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓देव रीतिकाल के प्रतिभाशाली कवि हैं जिनमें अनुप्रास-यमक का प्रबल आकर्षण है
- ✓'हँसी की चोट' में पंच तत्त्वों के माध्यम से वियोग का चित्रण
- ✓'सपना' में संयोग का स्वप्न टूटकर वियोग के आँसुओं में बदलता है
- ✓'दरबार' में सामंती दरबारों की विवेकहीनता पर व्यंग्य
- ✓सवैया-कवित्त छंद और ब्रजभाषा का माधुर्य
👨🏫 Teaching Tips
- →पंच तत्त्वों की तालिका बोर्ड पर बनाकर 'हँसी की चोट' समझाएँ
- →'झहरि-झहरि', 'घहरि-घहरि' से ध्वनि-बिंब पर गतिविधि कराएँ
- →'दरबार' को भारतेंदु के 'अंधेर नगरी' से जोड़कर चर्चा कराएँ
- →यमक और अनुप्रास के उदाहरण पाठ से छाँटने की प्रतियोगिता करें
- →'सपना' कवित्त का सस्वर पाठ कराएँ
- →आज की चाटुकारिता से 'दरबार' की तुलना पर लेख लिखवाएँ
📋 Assessment Questions
- 'हँसी की चोट' में कवि ने किन पंच तत्त्वों का वर्णन किया है और वे कैसे विदा होते हैं?
- नायिका सपने में क्यों प्रसन्न थी और सपना कैसे टूटा?
- 'दरबार' सवैये में वर्णित वातावरण का चित्रण कीजिए
- देव के अलंकार-प्रयोग के दो उदाहरण दीजिए
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