टॉर्च बेचनेवाले – Class 11 Hindi Chapter 3 Notes & NCERT PDF
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पाठ 3: टॉर्च बेचनेवाले
लेखक-परिचय
हरिशंकर परसाई (1924–1995) का जन्म जमानी गाँव, ज़िला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) में हुआ। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। कुछ वर्षों तक अध्यापन करने के बाद सन् 1947 से वे स्वतंत्र लेखन में जुट गए। उन्होंने जबलपुर से 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली।
परसाई ने व्यंग्य विधा को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की। उनके व्यंग्य समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर करारी चोट करते हुए पाठक को गुदगुदाते भी हैं और झकझोरते भी हैं। बोलचाल के शब्दों का सधा हुआ प्रयोग उनकी भाषा की विशेषता है — कौन-सा शब्द कब और कैसा प्रभाव पैदा करेगा, यह वे बखूबी जानते थे।
प्रमुख रचनाएँ:
पाठ-परिचय
'टॉर्च बेचनेवाले' एक व्यंग्य रचना है। इसमें टॉर्च के प्रतीक के माध्यम से परसाई ने आस्थाओं के बाज़ारीकरण और धार्मिक पाखंड पर प्रहार किया है।
पाठ-सार
कथावाचक (लेखक) एक ऐसे व्यक्ति से मिलता है जो पहले चौराहों पर बिजली के टॉर्च बेचा करता था। इस बार उसने दाढ़ी बढ़ा ली है और लंबा कुरता पहन रखा है। पूछने पर वह कहता है:
"वह काम बंद कर दिया। अब तो आत्मा के भीतर टॉर्च जल उठा है। ये 'सूरजछाप' टॉर्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं।"
लेखक चुटकी लेता है — "जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है।" तब टॉर्चवाला अपना पूरा किस्सा सुनाता है।
पाँच साल पहले का संकल्प
वह और उसका एक दोस्त हताश बैठे थे। उनके सामने सवाल था — "पैसा कैसे पैदा करें?" यह सवाल हिलता ही नहीं था:
"यार, इस सवाल के पाँव ज़मीन में गहरे गड़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं।"
दोनों ने तय किया कि अलग-अलग दिशाओं में किस्मत आज़माने निकलेंगे और ठीक पाँच साल बाद उसी तारीख और उसी वक्त उसी जगह मिलेंगे। अलग जाने का कारण — "साथ जाने में किस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है।"
'सूरज छाप' टॉर्च का धंधा
टॉर्चवाला चौराहों पर लोगों को इकट्ठा करके अँधेरे का डर दिखाता — रातें काली हैं, आदमी भटक जाता है, साँप डँस लेता है... लोग भर-दोपहर में अँधेरे के डर से काँपने लगते। फिर वह कहता कि प्रकाश भी है और वह प्रकाश उसकी 'सूरज छाप' टॉर्च में है। उसका अनुभव था — "आदमी को डराना कितना आसान है!"
दोस्त से मुलाकात
पाँच साल बाद दोस्त तय जगह पर नहीं आया। उसे ढूँढ़ते हुए टॉर्चवाला एक शहर में पहुँचा, जहाँ मैदान में खूब रोशनी थी, मंच सजा था, लाउडस्पीकर लगे थे और हज़ारों नर-नारी श्रद्धा से झुके बैठे थे। मंच पर रेशमी वस्त्रों में, लंबी दाढ़ी और लंबे केशों वाले एक भव्य पुरुष प्रवचन दे रहे थे:
"आज आत्मा में भी अंधकार है... डरो मत। जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश है... प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ।"
वे लोगों को अपने 'साधना मंदिर' में बुला रहे थे। टॉर्चवाला हँस पड़ा — उसे समझ आ गया कि यह भव्य पुरुष वही उसका पुराना दोस्त है। दोस्त ने उसे पहचानकर कार में बिठा लिया और ड्राइवर के सामने चुप रहने को कहा। बँगले का वैभव देखकर वह दंग रह गया।
असली रहस्य
टॉर्चवाले ने दोस्त से कहा — "तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टॉर्च हो।" जो भी अँधेरे का डर दिखाता है, वह अपनी कंपनी का टॉर्च बेचना चाहता है; ऐसे लोग कभी नहीं कहते कि दुनिया में प्रकाश फैला है। दोस्त ने सहज होकर स्वीकार किया:
"तेरी बात ठीक ही है। मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है।"
उस टॉर्च की कोई दुकान नहीं — "वह बहुत सूक्ष्म है। मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है।" दो दिन दोस्त के पास रहकर, तीसरे दिन टॉर्चवाले ने 'सूरज छाप' टॉर्च की पेटी नदी में फेंक दी और नया काम शुरू कर दिया। अंत में वह कहता है:
"धंधा वही करूँगा, यानी टॉर्च बेचूँगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।"
पात्र-चित्रण
शब्दार्थ
भाषा-शैली
केन्द्रीय भाव
धर्म और अध्यात्म के नाम पर लोगों के भय का व्यापार किया जाता है। 'सूरज छाप' टॉर्च और 'आत्मा का टॉर्च' — दोनों धंधे एक ही तर्क पर चलते हैं: पहले डर दिखाओ, फिर उपाय बेचो। फ़र्क इतना है कि दूसरा धंधा ज़्यादा सूक्ष्म, ज़्यादा "सनातन" और ज़्यादा मुनाफ़े वाला है।
परीक्षा हेतु
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓टॉर्च के प्रतीक से आस्थाओं के बाज़ारीकरण और धार्मिक पाखंड की पहचान करना
- ✓पहले डर दिखाना, फिर उपाय बेचना — दोनों धंधों के एक ही तर्क को समझना
- ✓परसाई की व्यंग्य-शैली, प्रतीक-योजना और बोलचाल की भाषा की विशेषताएँ जानना
- ✓'सूरज छाप' और 'सनातन कंपनी' जैसे प्रयोगों के व्यंग्यार्थ को स्पष्ट करना
- ✓अंतिम वाक्य 'बस कंपनी बदल रहा हूँ' के चरम व्यंग्य को समझना
👨🏫 Teaching Tips
- →कक्षा को दो समूहों में बाँटकर टॉर्चवाले और भव्य पुरुष के 'प्रवचनों' का पाठ करवाएँ और समानताएँ बोर्ड पर लिखें
- →प्रतीक-तालिका बनवाएँ: टॉर्च, अँधेरा, सूरज छाप, साधना मंदिर — प्रत्येक का संकेतार्थ
- →आज के विज्ञापनों में 'डर दिखाकर बेचने' के उदाहरण खोजने की गतिविधि कराएँ
- →'सवाल के पाँव ज़मीन में गहरे गड़े हैं' जैसे मानवीकरण पर भाषा-चर्चा करें
- →पाठ के अंतिम वाक्य पर 'यदि मैं लेखक होता' शीर्षक से वैकल्पिक अंत लिखवाएँ
- →अंधविश्वास पर लेख या परिचर्चा (योग्यता-विस्तार) आयोजित करें
- →एनसीईआरटी द्वारा परसाई पर बनी फ़िल्म दिखाकर लेखक-परिचय को जीवंत बनाएँ
📋 Assessment Questions
- लेखक ने टॉर्च बेचनेवाली कंपनी का नाम 'सूरज छाप' क्यों रखा?
- पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात किन परिस्थितियों में हुई?
- भीतर के अँधेरे की टॉर्च और 'सूरज छाप' टॉर्च बेचने के धंधे में क्या अंतर है?
- 'धंधा वही करूँगा... बस कंपनी बदल रहा हूँ' — आशय स्पष्ट कीजिए।
- 'व्यंग्य विधा में भाषा सबसे धारदार है' — इस पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए।
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All chapters in अंतरा भाग 1 (Antra) - Hindi Class 11
- 1. ईदगाह
- 2. दोपहर का भोजन
- 3. टॉर्च बेचनेवाले
- 4. गूँगे
- 5. ज्योतिबा फुले
- 6. खानाबदोश
- 7. उसकी माँ
- 8. भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
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- 12. सुमित्रानंदन पंत — संध्या के बाद
- 13. महादेवी वर्मा — जाग तुझको दूर जाना
- 14. नागार्जुन — बादल को घिरते देखा है
- 15. श्रीकांत वर्मा — हस्तक्षेप
- 16. सुदामा पांडेय 'धूमिल' — घर में वापसी