गूँगे – Class 11 Hindi Chapter 4 Notes & NCERT PDF
Notes and a simple summary of Chapter 4 of the NCERT Class 11 Hindi book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.
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पाठ 4: गूँगे
लेखक-परिचय
रांगेय राघव (1923–1962) का जन्म आगरा में हुआ। उनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था, परंतु उन्होंने 'रांगेय राघव' नाम से साहित्य-रचना की। उनके पूर्वज दक्षिण आरकाट से जयपुर-नरेश के निमंत्रण पर जयपुर आए थे और बाद में आगरा में बस गए। आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. की। 39 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु हो गई।
उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता और आलोचना — अनेक विधाओं में लिखा। 1936 से कहानियाँ लिखनी शुरू कीं और अस्सी से अधिक कहानियाँ लिखीं। सन् 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया। उनकी रचनाएँ दस खंडों में रांगेय राघव ग्रंथावली नाम से प्रकाशित हैं।
प्रमुख रचनाएँ:
उनकी कहानियों में शोषित-पीड़ित मानव के यथार्थ का मार्मिक चित्रण है; वे शोषण से मुक्ति का मार्ग भी दिखाती हैं। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है।
पाठ-परिचय
'गूँगे' कहानी में एक गूँगे किशोर के माध्यम से शोषित मानव की असहायता का चित्रण है — कभी वह मूक भाव से सब अत्याचार सह लेता है, कभी आक्रोश व्यक्त करता है। लेखक ने दिव्यांगों के प्रति समाज की संवेदनहीनता को रेखांकित किया है और बताया है कि उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह मानना चाहिए। कहानी यह भी कहती है कि जो लोग अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत नहीं, वे भी गूँगे-बहरे हैं।
पाठ-सार
गूँगे का परिचय
स्त्रियाँ एक गूँगे लड़के को घेरे हैं। वह जन्म से वज्र बहरा होने के कारण गूँगा है। इशारों से वह बताता है कि बचपन में माँ उसे छोड़ गई क्योंकि पिता मर गया था; जिन्होंने पाला (बुआ-फूफा), वे मारते बहुत हैं। किसी ने बचपन में गला साफ़ करने की कोशिश में गले का काकल (कौआ) काट दिया था। वह बोलने की ज़बरदस्त कोशिश करता है, पर केवल "कर्कश काँय-काँय" निकलती है —
"कैसी यातना है कि वह अपने हृदय को उगल देना चाहता है, किंतु उगल नहीं पाता।"
स्वाभिमान
पूछने पर कि खाता क्या है, वह बताता है कि हलवाई के यहाँ लड्डू बनाए, कड़ाही माँजी, कपड़े धोए। सीने पर हाथ मारकर इशारा करता है — "हाथ फैलाकर कभी नहीं माँगा, भीख नहीं लेता", भुजाओं पर हाथ रखकर — "मेहनत का खाता हूँ।"
चमेली के घर
कोमल हृदय वाली चमेली उसे खाना और चार रुपये देने की बात पर अपने घर रख लेती है। सुशीला कहती है — "पछताओगी।" घर पर बुआ-फूफा चाहते थे कि वह पल्लेदारी करके बारह-चौदह आने कमाए और बदले में बाजरे-चने की रोटियाँ खाए। अब वह चमेली के घर काम करता है; बच्चे चिढ़ाते हैं, पर वह नाराज़ नहीं होता।
भागना और लौटना
एक दिन गूँगा भाग जाता है। चमेली झुँझलाती है — "नाली का कीड़ा! 'एक छत उठाकर सिर पर रख दी' फिर भी मन नहीं भरा।" रात को वह लौटता है और इशारा करता है — भूखा हूँ। चमेली रोटियाँ फेंक देती है; वह देर तक नहीं छूता, फिर खा लेता है। चमेली चिमटे से उसकी पीठ पर मारती है — वह रोता नहीं; पर जब चमेली की आँख से आँसू गिरता है, तब गूँगा भी रो देता है। फिर उसे बार-बार भागने-लौटने की आदत पड़ जाती है।
बसंता और गूँगा
मालकिन का बेटा बसंता गूँगे को चपत मार देता है। गूँगे का हाथ उठता है, पर अपने-आप रुक जाता है। वह चमेली का हाथ पकड़कर शिकायत करता है; चमेली को लगता है जैसे उसके अपने बेटे ने हाथ पकड़ा हो, पर पुत्र-ममता में वह हाथ छुड़ा लेती है। उसे अनुभव होता है कि गूँगे में बसंता से कहीं अधिक बल है, फिर भी उसने हाथ नहीं चलाया —
"वह पक रही थी, इसी से बसंता बसंता है... गूँगा गूँगा है।"
गूँगे की आँखों में पानी है — "जैसे उनमें एक शिकायत थी, पक्षपात के प्रति तिरस्कार था।"
निष्कासन और अंत
चोरी के संदेह में क्रुद्ध चमेली उसे "मक्कार, बदमाश" कहकर दरवाज़े से बाहर धकेल देती है — फिर लज्जित होती है कि बहरे से क्या-क्या कह रही थी। घंटे भर बाद गूँगा खून से भीगा लौटता है — सड़क के लड़कों से पिटकर, क्योंकि गूँगा होने के नाते वह उनसे दबना नहीं चाहता था। दहलीज़ पर सिर रखकर वह कुत्ते की तरह चिल्ला रहा है।
"और ये गूँगे... अनेक-अनेक हो संसार में भिन्न-भिन्न रूपों में छा गए हैं — जो कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते।"
चमेली सोचती है — आज ऐसा कौन है जो गूँगा नहीं है? हर कोई भीतर से छटपटाता है, पर स्नेह और समानता की चाह में चुप रहता है।
पात्र-चित्रण
शब्दार्थ
भाषा-शैली
केन्द्रीय भाव
समाज दिव्यांगों पर दया तो दिखाता है, पर उन्हें बराबरी और अधिकार नहीं देता। गूँगे का संघर्ष हर उस शोषित व्यक्ति का संघर्ष है जो अन्याय को पहचानकर भी उसे चुनौती नहीं दे पाता। और जो समाज अपने दायित्वों के प्रति सचेत नहीं, वह स्वयं "गूँगा-बहरा" है।
परीक्षा हेतु
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓गूँगे पात्र के माध्यम से शोषित और दिव्यांग मनुष्य की असहायता और स्वाभिमान को समझना
- ✓समाज की दया और अधिकार के बीच के अंतर को पहचानना
- ✓चमेली के मन में ममता, क्रोध और पुत्र-मोह के द्वंद्व का विश्लेषण करना
- ✓बहुवचन शीर्षक 'गूँगे' के प्रतीकात्मक और व्यापक अर्थ को स्पष्ट करना
- ✓रांगेय राघव की मार्मिक, उपमा-प्रधान और मनोवैज्ञानिक भाषा-शैली को पहचानना
👨🏫 Teaching Tips
- →कहानी शुरू करने से पहले विद्यार्थियों से संकेत-भाषा (साइन लैंग्वेज) के कुछ इशारे सीखने को कहें
- →गूँगे के स्वाभिमान को दर्शाने वाले प्रसंगों की सूची समूह में बनवाएँ
- →चमेली के बदलते मनोभावों का 'भावना-ग्राफ़' बनवाएँ — करुणा, क्रोध, लज्जा, ममता
- →'बसंता गूँगा होता तो?' प्रश्न पर भूमिका-निर्वाह (रोल-प्ले) कराएँ
- →'स्पर्श', 'कोशिश', 'इकबाल' जैसी फ़िल्मों के अंश दिखाकर समीक्षा लिखवाएँ
- →पाठ के प्रमुख गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या का अभ्यास कराएँ
- →दिव्यांगों के सहयोग के लिए विद्यालय स्तर पर क्या किया जा सकता है — इस पर परिचर्चा कराएँ
📋 Assessment Questions
- गूँगे ने अपने स्वाभिमानी होने का परिचय किस प्रकार दिया?
- 'मनुष्य की करुणा की भावना उसके भीतर गूँगेपन की प्रतिच्छाया है' — स्पष्ट कीजिए।
- 'गूँगा दया या सहानुभूति नहीं, अधिकार चाहता था' — सिद्ध कीजिए।
- कहानी का शीर्षक 'गूँगे' क्यों रखा गया है, जबकि इसमें एक ही गूँगा पात्र है?
- 'नाली का कीड़ा! एक छत उठाकर सिर पर रख दी' — चमेली के मनोभाव स्पष्ट कीजिए।
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All chapters in अंतरा भाग 1 (Antra) - Hindi Class 11
- 1. ईदगाह
- 2. दोपहर का भोजन
- 3. टॉर्च बेचनेवाले
- 4. गूँगे
- 5. ज्योतिबा फुले
- 6. खानाबदोश
- 7. उसकी माँ
- 8. भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
- 9. कबीर — अरे इन दोहुन राह न पाई; बालम, आवो हमारे गेह रे
- 10. सूरदास — खेलन में को काको गुसैयाँ; मुरली तऊ गुपालहिं भावति
- 11. देव — हँसी की चोट; सपना; दरबार
- 12. सुमित्रानंदन पंत — संध्या के बाद
- 13. महादेवी वर्मा — जाग तुझको दूर जाना
- 14. नागार्जुन — बादल को घिरते देखा है
- 15. श्रीकांत वर्मा — हस्तक्षेप
- 16. सुदामा पांडेय 'धूमिल' — घर में वापसी