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भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है? – Class 11 Hindi Chapter 8 Notes & NCERT PDF

Class 11HindiChapter 8NCERT book: अंतरा भाग 1 (Antra) - Hindi Class 11

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पाठ 8: भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?

लेखक-परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) का जन्म काशी में हुआ। उनका व्यक्तित्व देश-प्रेम और क्रांति-चेतना से समृद्ध था; किशोर अवस्था में ही उन्होंने देश की दुर्दशा का त्रासद अनुभव कर लिया था। वे हिंदी क्षेत्र में पुनर्जागरण की चेतना के अप्रतिम नायक थे; बंगाल के मनीषी ईश्वरचंद्र विद्यासागर से उनका अंतरंग संबंध था।

  • पत्रकारिता: कविवचनसुधा पत्रिका निकाली; हरिश्चंद्र मैगज़ीन का संपादन किया, जो बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका नाम से छपी; स्त्री-शिक्षा के लिए बाला बोधिनी पत्रिका निकाली। उन्होंने तदीय समाज की स्थापना भी की।
  • अनूदित नाटक: धनंजय विजय, विद्या सुंदर, पाखंड विडंबन, सत्य हरिश्चंद्र, मुद्राराक्षस।
  • मौलिक नाटक: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, श्री चंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, नील देवी।
  • भारतेंदु की धारणा के अनुसार सन् 1873 में "हिंदी नई चाल में ढली"—खड़ी बोली गद्य की नई यात्रा शुरू हुई।
  • हिंदी नाटक और निबंध की परंपरा भारतेंदु से शुरू होती है; वे अपने समकालीनों के नेता और परवर्ती लेखकों के पथ-प्रदर्शक थे। उर्दू में वे "रसा" उपनाम से लिखते थे।
  • पाठ-परिचय

    भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है? भारतेंदु का प्रसिद्ध भाषण है, जो उन्होंने बलिया के ददरी मेले में दिया था। इसमें एक ओर ब्रिटिश शासन की मनमानी पर व्यंग्य है, तो दूसरी ओर अंग्रेज़ों के परिश्रमी स्वभाव के प्रति आदर भी। भारतेंदु आलस्य, समय के अपव्यय, रूढ़ियों और गलत जीवन-शैली पर प्रहार करते हैं तथा जनसंख्या-नियंत्रण, श्रम की महत्ता, आत्मबल, त्याग, एकता और स्वदेशी को उन्नति के लिए अनिवार्य मानते हैं।

    पाठ-सार

    बलिया का उत्साह और "इंजन" की आवश्यकता

    भारतेंदु कहते हैं कि "इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है।" बनारस जैसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता, तब बलिया में इतना उत्साह प्रशंसनीय है; इसका कारण कलेक्टर रॉबर्ट साहब और उनके सहयोगियों को बताते हुए वे अकबर-बीरबल-टोडरमल की उपमा देते हैं। हिंदुस्तानी लोग रेल की गाड़ी के डिब्बों जैसे हैं—अच्छे-अच्छे डिब्बे, पर बिना इंजन (चलाने वाले) के नहीं चल सकते। उन्हें हनुमान की तरह बल याद दिलाने की ज़रूरत है—"का चुप साधि रहा बलवाना"। पर राजा-महाराजे पूजा-भोजन-गप में, और हाकिम सरकारी काम, बॉल, घुड़दौड़, थिएटर में व्यस्त हैं। साधारण प्रजा की दशा तीन मेंढकों वाली कहानी के सबसे नीचे वाले जैसी है—"गए हम"।

    उन्नति की घुड़दौड़

    प्राचीन भारतीयों ने बाँस की नलियों से ग्रहों की ऐसी सही गति लिखी कि विलायत की लाखों की दूरबीनें भी वही परिणाम देती हैं; पर आज लाखों पुस्तकें और यंत्र होते हुए भी हम "चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी" बने हैं। संसार में उन्नति की घुड़दौड़ चल रही है—अमेरिकन, अंग्रेज़, फ्रांसीसी सरपट दौड़ रहे हैं, जापानी टट्टू भी हाँफते हुए दौड़ रहे हैं, पर हम खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोद रहे हैं। जो इस समय पीछे रह गया, वह फिर आगे नहीं बढ़ सकेगा।

    अवसर को न खोने की सीख

    भागवत के श्लोक से वे कहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य-जन्म, गुरु-कृपा और ईश्वर की अनुकूलता पाकर भी जो भव-सागर पार न करे, वह "आत्महत्यारा" है; वैसे ही अंग्रेज़ी राज में साधन और अवसर पाकर भी उन्नति न करना हमारा अभाग्य है। हम "कूएँ के मेंढक, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम" बने रहें तो यह कमबख्ती है।

    आलस्य पर प्रहार

    "पेट के धंधे से छुट्टी नहीं" कहने वालों को वे इंग्लैंड का उदाहरण देते हैं—वहाँ किसान खेत जोतते हुए भी नई कल/विधि सोचता है और कोचवान भी खाली समय में अखबार पढ़ता है; "एक छिन भी व्यर्थ न जाए"। यहाँ निकम्मेपन को अमीरी समझा जाता है; मलूकदास का दोहा—"अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम"—आलस्य का प्रमाण बन गया है। मर्दुमशुमारी (जनगणना) दिखाती है कि मनुष्य बढ़ रहे हैं और रुपया घट रहा है; रुपया बिना बुद्धि बढ़े नहीं बढ़ेगा।

    पृथ्वीराज और "अबकी चढ़ी कमान"

    चंद कवि के दोहे—"अबकी चढ़ी कमान, को जानै फिर कब चढ़ै"—के प्रसंग से भारतेंदु कहते हैं कि यही अवसर है; सुधार सब क्षेत्रों में होना चाहिए—धर्म, घर-बाहर के काम, रोज़गार, शिष्टाचार, शरीर-बल, मन-बल, बालक-युवा-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब।

    अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः। स्वकार्य्यं साधयेत् धीमान् कार्य्यध्वंसो हि मूर्खता॥

    (अर्थ: बुद्धिमान अपमान की परवाह न कर, मान को पीछे रखकर अपना काम साधे; काम बिगाड़ देना मूर्खता है।)

    उन्नति के उपाय

  • धर्म और समाज-धर्म का भेद: "वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म हैं जो देशकाल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं।" मेला, एकादशी, दीवाली, होली जैसे पर्वों के पीछे सामाजिक-स्वास्थ्य संबंधी हिकमत है—"यही तिहवार ही तुम्हारी मानो म्युनिसिपालिटी हैं।"
  • सामाजिक सुधार: जहाज़ की यात्रा, विधवा-विवाह चलाएँ; बाल-विवाह, कुलीन-प्रथा, बहु-विवाह दूर करें; लड़कियों को पढ़ाएँ।
  • एकता: वैष्णव-शाक्त आदि आपसी बैर छोड़ें; हिंदू, जैन, मुसलमान सब मिलें; छोटी जाति का तिरस्कार न करें। मुसलमान भाई हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ें, बच्चों को अच्छी तालीम और रोज़गार सिखाएँ—"घर में आग लगे तब जिठानी-द्यौरानी को आपस का डाह छोड़कर... आग बुझानी चाहिए।"
  • स्वदेशी: धन हज़ार धाराओं से विदेश जा रहा है—अमेरिका की मारकीन की धोती, इंग्लैंड का लंकिलाट, फ्रांस की कंघी, जर्मनी की चरबी की बत्ती, दियासलाई तक विदेशी। "घर की तो मूछें ही मूछें हैं।"
  • "परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।"

    शब्दार्थ

  • महसूल — कर, टैक्स
  • चुंगी की कतवार — म्युनिसिपालिटी का कचरा
  • रंगमहल — भोग-विलास का स्थान
  • कमबख्ती — अभागापन
  • मर्दुमशुमारी — जनगणना
  • तिफ़्ली — बचपन से संबंधित
  • प्रतिछिन — प्रतिक्षण
  • हिकमत — युक्ति, चतुराई
  • मुसाहबी — अमीरों की चापलूसी करने वाला काम
  • मयस्सर — प्राप्त, उपलब्ध
  • पिनशिन — पेंशन
  • कंटक — काँटा, बाधा
  • भाषा-शैली और भाषण की विशेषताएँ

  • भाषण-शैली: श्रोताओं को सीधा संबोधन—"भाइयो", "भाई हिंदुओ!", "यारो!"; प्रश्न और उत्तर शैली—"अब यह प्रश्न होगा कि...".
  • उदाहरण और दृष्टांत: रेल-इंजन, तीन मेंढक, घुड़दौड़, पृथ्वीराज-चंद कवि, मँगनी के कपड़े वाला बेफ़िकरा।
  • व्यंग्य और हास्य: "काठ के उल्लू", "पिंजड़े के गंगाराम", "घर की तो मूछें ही मूछें हैं"।
  • उद्धरण: संस्कृत श्लोक, भागवत, मलूकदास और चंद कवि के दोहे, तुलसी की पंक्ति "फिर कब राम जनकपुर ऐहैं"।
  • भाषा: भारतेंदु-युग की खड़ी बोली—बोलचाल के शब्द और पुराने रूप (करैं, बनावैं, चलैगा), उर्दू-अंग्रेज़ी शब्दों (हाकिम, महसूल, फर्स्ट क्लास) का सहज मिश्रण; ओजपूर्ण और प्रेरक।
  • केन्द्रीय भाव / संदेश

    देश की उन्नति किसी राजा-महाराजा या सरकार के भरोसे नहीं, जनता के स्वयं के प्रयत्न से होगी—"तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो।" आलस्य त्यागकर परिश्रम, शिक्षा, सामाजिक सुधार, सांप्रदायिक एकता, स्वदेशी उद्योग और अपनी भाषा के माध्यम से सर्वांगीण उन्नति ही भारत का मार्ग है।

    परीक्षा हेतु (प्रश्न-अभ्यास पर आधारित)

  • "इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है" क्यों? — देश में इतना आलस्य है कि बड़े नगरों में भी कुछ नहीं होता; ऐसे में बलिया जैसे छोटे नगर में इतना उत्साह ही बड़ी बात है।
  • रेल-इंजन की उपमा — भारतीयों में क्षमता है, पर उन्हें चलाने/प्रेरित करने वाला नेतृत्व चाहिए।
  • उन्नति के चार उपाय — आलस्य छोड़कर समय का सदुपयोग; बाल-विवाह आदि रूढ़ियाँ छोड़ना और लड़कियों की शिक्षा; मत-मतांतर छोड़कर एकता; स्वदेशी कारीगरी और अपनी भाषा।
  • भाषण की विशेषताएँ — श्रोताओं को संबोधन, उदाहरण-दृष्टांत, व्यंग्य, उद्धरण, प्रेरक आह्वान; इसलिए यह पाठ एक भाषण है।
  • "अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो" — ज्ञान, शिक्षा और व्यवहार अपनी भाषा में हो, विदेशी वस्तु-भाषा पर निर्भरता न रहे; आज आत्मनिर्भरता और मातृभाषा में शिक्षा के संदर्भ में भी प्रासंगिक।
  • सामान्य भूलें

  • पाठ को निबंध या कहानी लिखना—यह बलिया (ददरी मेला) में दिया गया भाषण है।
  • यह मान लेना कि भारतेंदु केवल अंग्रेज़ों की प्रशंसा करते हैं—वे उनके परिश्रम का आदर करते हुए ब्रिटिश शासन और भारतीयों की निष्क्रियता दोनों पर व्यंग्य करते हैं।
  • "वास्तविक धर्म" और "समाज धर्म" का भेद न समझाना।
  • भारतेंदु की पत्रिकाओं और नाटकों को आपस में मिला देना (जैसे भारत दुर्दशा नाटक है, पत्रिका नहीं)।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी पुनर्जागरण, हिंदी नाटक और निबंध के प्रवर्तक के रूप में पहचानना
    • ✓बलिया के ददरी मेले में दिए गए भाषण के मुख्य तर्क—आलस्य-त्याग, अवसर का उपयोग और सर्वांगीण उन्नति—समझना
    • ✓'वास्तविक धर्म' और 'समाज धर्म' के अंतर तथा सामाजिक सुधारों (बाल-विवाह-निषेध, स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह) को जानना
    • ✓सांप्रदायिक एकता, स्वदेशी और 'अपनी भाषा में उन्नति' के संदेश की आज के संदर्भ में प्रासंगिकता समझना
    • ✓भाषण-शैली की विशेषताएँ—संबोधन, दृष्टांत, व्यंग्य, उद्धरण—पहचानना

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पाठ को भाषण की तरह कक्षा में ओजपूर्ण ढंग से पढ़वाएँ ताकि संबोधन-शैली का अनुभव हो
    • →भाषण में प्रयुक्त सभी दृष्टांतों (रेल-इंजन, तीन मेंढक, घुड़दौड़, पृथ्वीराज, मँगनी के कपड़े) की तालिका-सूची बनवाएँ और उनका संदेश लिखवाएँ
    • →1884 के भारत और आज के भारत की तुलना पर समूह-चर्चा कराएँ—कौन-सी समस्याएँ सुलझीं, कौन-सी बनी हुई हैं
    • →'स्वदेशी' प्रसंग पर विद्यार्थियों से अपने घर की विदेशी और देशी वस्तुओं की सूची बनवाएँ
    • →बोलचाल के पुराने शब्द-रूपों (करैं, बनावैं, चलैगा) को आधुनिक हिंदी में बदलवाने की गतिविधि कराएँ
    • →भारतेंदु की पत्रिकाओं और नाटकों पर एक संक्षिप्त प्रस्तुति (प्रोजेक्ट) दें
    • →विद्यार्थियों से 'देश की उन्नति कैसे हो' विषय पर दो मिनट का भाषण तैयार करवाएँ

    📋 Assessment Questions

    1. क्या विद्यार्थी बता सकते हैं कि लेखक ने देश को 'अभागा आलसी' क्यों कहा?
    2. क्या वे रेल-इंजन की उपमा का अर्थ स्पष्ट कर सकते हैं?
    3. क्या वे भारतेंदु द्वारा बताए गए उन्नति के कम-से-कम चार उपाय उदाहरण सहित लिख सकते हैं?
    4. क्या वे उदाहरण देकर सिद्ध कर सकते हैं कि यह पाठ एक भाषण है?
    5. क्या वे 'वास्तविक धर्म' और 'समाज धर्म' का अंतर समझा सकते हैं?

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    All chapters in अंतरा भाग 1 (Antra) - Hindi Class 11

    1. 1. ईदगाह
    2. 2. दोपहर का भोजन
    3. 3. टॉर्च बेचनेवाले
    4. 4. गूँगे
    5. 5. ज्योतिबा फुले
    6. 6. खानाबदोश
    7. 7. उसकी माँ
    8. 8. भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
    9. 9. कबीर — अरे इन दोहुन राह न पाई; बालम, आवो हमारे गेह रे
    10. 10. सूरदास — खेलन में को काको गुसैयाँ; मुरली तऊ गुपालहिं भावति
    11. 11. देव — हँसी की चोट; सपना; दरबार
    12. 12. सुमित्रानंदन पंत — संध्या के बाद
    13. 13. महादेवी वर्मा — जाग तुझको दूर जाना
    14. 14. नागार्जुन — बादल को घिरते देखा है
    15. 15. श्रीकांत वर्मा — हस्तक्षेप
    16. 16. सुदामा पांडेय 'धूमिल' — घर में वापसी