कबीर — अरे इन दोहुन राह न पाई; बालम, आवो हमारे गेह रे – Class 11 Hindi Chapter 9 Notes & NCERT PDF
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पाठ 9: कबीर — अरे इन दोहुन राह न पाई; बालम, आवो हमारे गेह रे
कवि-परिचय
कबीर (सन् 1398–1518) का जन्म काशी में हुआ। कहा जाता है कि वे स्वामी रामानंद के शिष्य थे। उन्होंने स्वयं को जुलाहा और काशी का निवासी कहा है। जीवन के अंतिम समय में वे मगहर चले गए और वहीं शरीर त्यागा। कबीर ने विधिवत शिक्षा नहीं पाई थी —
मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।
फिर भी संतों और फ़कीरों की संगति से उनके पास उच्चकोटि का ज्ञान और मौलिक चिंतन था।
पाठ के दोनों पद पारसनाथ तिवारी द्वारा संपादित कबीर वाणी से लिए गए हैं।
पद 1 — अरे इन दोहुन राह न पाई
अरे इन दोहुन राह न पाई।
हिंदू अपनी करै बड़ाई गागर छुवन न देई।
बेस्या के पायन-तर सोवै यह देखो हिंदुआई।
मुसलमान के पीर-औलिया मुर्गी मुर्गा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहै घरहिं में करै सगाई।
...
हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई।
कहैं कबीर सुनौ भाई साधो कौन राह ह्वै जाई॥
भावार्थ: कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान — दोनों ही सच्चा मार्ग नहीं पा सके। हिंदू अपनी बड़ाई करता है, छुआछूत मानकर दूसरों को अपनी गागर तक छूने नहीं देता, पर वेश्या के पैरों तले सोने में उसे संकोच नहीं — यह कैसी हिंदुआई है! मुसलमानों के पीर-औलिया मुर्गा-मुर्गी खाते हैं और मौसी की बेटी से ब्याह कर घर में ही सगाई कर लेते हैं। कबीर ने दोनों धर्मों के पाखंड और दोहरे आचरण को देख लिया है और पूछते हैं — आखिर किस राह जाया जाए? सच्ची राह तो आडंबर-रहित, प्रेम और सदाचार की राह है।
पद 2 — बालम, आवो हमारे गेह रे
बालम, आवो हमारे गेह रे।
तुम बिन दुखिया देह रे।
सब कोई कहै तुम्हारी नारी, मोकों लगत लाज रे।
...
अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे।
कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे।
...
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे॥
भावार्थ: यहाँ कबीर स्वयं को विरहिणी स्त्री (आत्मा) और परमात्मा को प्रियतम (बालम) मानकर उसे घर लौट आने को पुकारते हैं। प्रिय के बिना शरीर दुखी है; सब उसे प्रिय की पत्नी कहते हैं, पर मिलन न होने से उसे लाज आती है — जब तक हृदय से नहीं लगाया, तब तक कैसा स्नेह? विरह में न अन्न अच्छा लगता है, न नींद आती है; घर-वन कहीं धैर्य नहीं। जैसे प्यासे को पानी प्यारा होता है, वैसे ही कामिनी को बालम। कोई परोपकारी मिले जो प्रिय तक संदेश पहुँचा दे — कबीर बेहाल हैं, प्रिय को देखे बिना प्राण निकल रहे हैं। दाम्पत्य प्रेम और घर की महत्ता इस पद के केंद्र में है।
शब्दार्थ
काव्य-सौन्दर्य
केन्द्रीय भाव
कबीर धर्म के बाहरी दिखावे को नकारकर सच्चे आचरण और प्रेम को ही धर्म मानते हैं। निर्गुण संत होते हुए भी दूसरे पद में वे प्रेम की अनुभूति के लिए दाम्पत्य प्रतीक अपनाते हैं — यही उनकी कविता की जीवंतता है।
परीक्षा हेतु
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓कबीर निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा के कवि हैं जिन्होंने धार्मिक आडंबरों का विरोध किया
- ✓पहले पद में हिंदू-मुसलमान दोनों के पाखंड पर तीखा व्यंग्य है
- ✓दूसरे पद में आत्मा विरहिणी और परमात्मा प्रियतम के रूप में है
- ✓विप्रलंभ शृंगार, रहस्यवाद और उपमा अलंकार का प्रयोग
- ✓कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है — सहज पर गहरी
👨🏫 Teaching Tips
- →दोनों पद कुमार गंधर्व या भारती बंधु के गायन के साथ सुनवाएँ
- →कक्षा में 'आज के आडंबर' पर चर्चा कराकर पद 1 को वर्तमान से जोड़ें
- →आत्मा-परमात्मा के दाम्पत्य रूपक को मीरा और सूफ़ी कवियों से तुलना कर समझाएँ
- →कठिन शब्दों (खाला, पीर, औलिया, गेह) की शब्द-दीवार बनवाएँ
- →कबीर की अन्य साखियों का संकलन कराएँ
- →'कौन राह ह्वै जाई' पर वाद-विवाद कराएँ
📋 Assessment Questions
- कबीर किन दो धर्मों के आडंबरों की आलोचना करते हैं और किस आधार पर?
- 'बालम आवो हमारे गेह रे' में आत्मा की विरह-दशा का वर्णन कीजिए
- 'कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे' का आशय स्पष्ट कीजिए
- निर्गुण कवि के साकार प्रेम-संकेत पर अपने विचार लिखिए
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