पाठ-परिचय
षष्ठः पाठः – भव्यः सत्याग्रहाश्रमः (भव्य सत्याग्रह-आश्रम)
यह पाठ आधुनिक संस्कृत कवयित्री श्रीमती क्षमाराव की रचना 'सत्याग्रहगीता' के चतुर्थ अध्याय से लिया गया है। इसमें साबरमती नदी के तट पर महात्मा गांधी द्वारा स्थापित सत्याग्रहाश्रम और वहाँ के आदर्श जीवन का वर्णन है। कवयित्री का उद्देश्य संस्कृत कविता को वर्तमान प्रसंगों से जोड़ना है। भूमिका में कहा गया है कि आज जब स्वार्थ-सिद्धि के लिए हिंसक और निर्दय मार्ग अपनाए जा रहे हैं, तब प्रत्येक व्यक्ति को अन्याय के विरोध में खड़ा होना है और सत्य, अहिंसा तथा सदाचार का मार्ग अपनाना है।
पाठ में कुल 20 श्लोक हैं, जो अनुष्टुप् छन्द में हैं।
पाठ-सार
1. आश्रम की स्थापना (श्लोक 1–2)
ततस्तीरे सबर्मत्या नाम्ना सत्याग्रहाश्रमः।
महात्मा स्थापयामास सदनं सानुयात्रिकः॥1॥
अर्थ – तब महात्मा ने अपने अनुयायियों के साथ साबरमती नदी के तट पर 'सत्याग्रहाश्रम' नामक निवास-स्थान स्थापित किया।
सत्यमेव प्रमाणं यन्मनोवाक्कायकर्मभिः।
तस्मिन् पुण्यनिवासे तद् यथार्थो हि स आश्रमः॥2॥
अर्थ – उस पवित्र निवास में मन, वाणी, शरीर और कर्म – सबमें सत्य ही प्रमाण था, इसलिए वह आश्रम सचमुच अपने नाम के अनुरूप (यथार्थ) था।
2. आश्रम के नौ व्रत (श्लोक 3–4)
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ।
स्वदेशवस्तुनिष्ठा च निर्भीतीरुचिसंयमः॥3॥
अन्त्यजानां समुद्धारो नवैतानि व्रतानि हि।
भारतोत्कर्षसिद्ध्यर्थमाश्रमस्य महात्मनः॥4॥
भारत के उत्कर्ष के लिए महात्मा के आश्रम के नौ व्रत थे –
अहिंसासत्यअस्तेय (चोरी न करना)ब्रह्मचर्यअपरिग्रह (धन-संचय न करना)स्वदेशवस्तुनिष्ठा (स्वदेशी वस्तुओं के प्रति निष्ठा)निर्भीति (निर्भयता)रुचिसंयम (स्वाद पर नियन्त्रण)अन्त्यजानां समुद्धारः (हरिजनों/वंचितों का उद्धार)3. महात्मा का व्यक्तित्व (श्लोक 5–7)
निर्ममो नित्यसत्त्वस्थो मिताशी सुस्मिताननः।
सुकलत्रः शिशुप्रेमी पितेवाश्रमवासिनाम्॥5॥
गांधीजी ममता-रहित, सदा सत्त्वगुण में स्थित, कम भोजन करने वाले (मिताशी), मुस्कुराते मुख वाले, उत्तम पत्नी वाले, बच्चों से प्रेम करने वाले और आश्रमवासियों के लिए पिता के समान थे।
अपने बन्धुओं के कष्टों का ध्यान करते हुए और उनके हित में ही लगे हुए वे वैसे ही सुशोभित थे जैसे बोधिवृक्ष के नीचे मुनि बुद्ध (श्लोक 6)। वे साक्षात् सत्य के दीपक थे, जो पूरे भारत में प्रकाशित होकर लोगों के हृदय से मोह से उत्पन्न अन्धकार दूर कर रहे थे (श्लोक 7)।
4. सत्य का बल (श्लोक 8–10)
बलं सर्वबलेभ्योऽपि सत्यमेवातिरिच्यते।
सत्यवानबलः श्रेयान् सबलात् सत्यवर्जितात्॥8॥
अर्थ – सत्य का बल सभी बलों से बढ़कर है। सत्य से युक्त निर्बल व्यक्ति, सत्य से रहित बलवान व्यक्ति से श्रेष्ठ है।
जो प्रजा या शासक धर्म से आचरण करते हैं, उनकी समृद्धि होती है; दूसरों का विनाश निश्चित है (श्लोक 9)। यही बात गांधीजी अपने सहवासियों और अनुयायियों को वाणी और लेखन से समझाते थे (श्लोक 10)।
5. भीरुता की निन्दा – महात्मा का कथन (श्लोक 11–15)
महात्मा ने कहा – जो अधर्म देखकर भी उसे रोकना नहीं चाहता, और जो सत्य होते हुए भी डर के कारण उसे स्वीकार नहीं करता – ये दोनों ही नपुंसक (क्लीब) हैं, उनका जीवन निष्फल है, क्योंकि स्वार्थ-नाश के भय से वे असत्य जीवन की रक्षा करते हैं (श्लोक 11–12)।
गांधीजी का विचार था कि अपनी रक्षा के लिए निन्दनीय पलायन करने से तो मृत्यु का सामना करना श्रेष्ठ है (श्लोक 13)। जो डरकर भागता है, वह मन में हिंसा करता है और मृत्यु-भय से आत्म-हिंसा करता है (श्लोक 14)। इसी कारण उन्होंने सत्य के अनुयायियों से युक्त अपने विनम्र निवास का नाम 'सत्याग्रहाश्रम' रखा (श्लोक 15)।
6. आत्म-शुद्धि और अनुयायी (श्लोक 16–20)
सत्य आदि धर्मों के अमोघ, अद्भुत बल का वर्णन करते हुए गुरु (गांधीजी) ने अनेक व्रत ग्रहण कराए।आश्रम में दूसरों द्वारा अपराध किए जाने पर भी वे सारा दोष अपने ऊपर लेकर उपवास से तप करते थे (श्लोक 17)।आश्रम के बाहर लोगों के झगड़े में भी वे स्वयं को कारण मानकर उस कलंक से दुखी होते थे (श्लोक 18)।सब प्राणियों को आत्मवत् देखने वाले उनके गुणों से वशीभूत होकर हज़ारों लोग उनके अनुयायी बने (श्लोक 19)।लोगों ने धैर्यपूर्वक निश्चय किया – "हम सदा सत्य आदि नौ व्रतों का आचरण करेंगे" (श्लोक 20)।शब्दार्थ
सबर्मत्याः – साबरमती नदी केसानुयात्रिकः – अनुयायियों के साथअस्तेयम् – चोरी न करनाअपरिग्रहः – धन-संचय न करने का स्वभावरुचिसंयमः – स्वाद पर नियन्त्रणअन्त्यजानां समुद्धारः – हरिजनों का उद्धारनित्यसत्त्वस्थः – सदा सत्त्वगुण में स्थितमिताशी – कम भोजन करने वालासुस्मिताननः – प्रसन्न मुख वालासुकलत्रः – उत्तम पत्नी वालाध्यायन् – ध्यान करते हुएश्रेयान् – अधिक कल्याणकारी, श्रेष्ठक्लीबः – नपुंसक, कायरपदानुगाः – पीछे चलने वाले, अनुयायीसधैर्यम् – धैर्य सहितव्याकरण-बिन्दु
समास (पाठ के अभ्यास से)
सत्याग्रहाश्रमः – सत्याग्रहस्य आश्रमः (षष्ठी तत्पुरुष)महात्मा – महान् आत्मा यस्य सः (बहुव्रीहि)ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ – ब्रह्मचर्यं च अपरिग्रहः च (द्वन्द्व)सुकलत्रः – शोभनं कलत्रं यस्य सः (बहुव्रीहि)निष्फलम् – निर्गतं फलं यस्मात् तत् (बहुव्रीहि)सुस्मिताननः – सुस्मितम् आननं यस्य सः (बहुव्रीहि)पदानुगाः – पदानि अनुगच्छन्ति ये (उपपद तत्पुरुष)सधैर्यम् – धैर्येण सह (अव्ययीभाव)प्रत्यय
ध्यायन् – ध्यै + शतृ (ध्यान करते हुए)श्रेयान् – प्रशस्य + ईयसुन् (अधिक श्रेष्ठ)दृष्ट्वा – दृश् + क्त्वा; मत्वा – मन् + क्त्वासमाश्रित्य – सम् + आ + श्रि + ल्यप्दत्तम् – दा + क्तप्रतिबन्द्धुम् – प्रति + बन्ध् + तुमुन्सन्धि-विच्छेद
नवैतानि = नव + एतानि (वृद्धि)मिताशी = मित + आशी (दीर्घ)मुनिर्बुद्धः = मुनिः + बुद्धः (विसर्ग)दीप्यतेऽखिलभारते = दीप्यते + अखिलभारते (पूर्वरूप)सत्यपि = सति + अपि (यण्)पितेव = पिता + इव (गुण)सर्वदाप्याचरिष्यामः = सर्वदा + अपि + आचरिष्यामःपरीक्षा हेतु
प्रश्नोत्तर (संस्कृत में): आश्रम किस नदी के तट पर था? → सबर्मत्याः तीरे। महात्मा की तुलना किससे की गई? → बोधिद्रुमतले स्थितेन मुनिना बुद्धेन। समृद्धि किनकी होती है? → ये धर्मेण चरन्ति तेषाम्।सान्वय अर्थ: श्लोक 3, 7 और 11 का अन्वय-सहित अर्थ बार-बार पूछा जाता है।लघु निबन्ध: 'सत्याग्रह का महत्त्व' पर दस वाक्य – नौ व्रत, सत्य का बल, भीरुता की निन्दा और आत्म-शुद्धि के बिन्दु उपयोग करें।सामान्य भूलें
व्रतों की संख्या नौ है, सात या आठ नहीं – अन्त्यजोद्धार को गिनना न भूलें।'सत्यवानबलः श्रेयान्' का अर्थ उलटा न करें – सत्ययुक्त निर्बल श्रेष्ठ है, सत्यरहित बलवान नहीं।'क्लीब' से यहाँ शारीरिक नहीं, नैतिक कायरता अभिप्रेत है।गांधीजी दूसरों के अपराधों के लिए भी स्वयं उपवास करते थे – यह आत्म-शुद्धि का भाव है, दण्ड नहीं।