मातुराज्ञा गरीयसी – Class 12 Sanskrit Chapter 2 Notes & NCERT PDF
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पाठ 2: मातुराज्ञा गरीयसी
पाठ-परिचय
मातुराज्ञा गरीयसी (माता की आज्ञा श्रेष्ठ है) महाकवि भास के प्रतिमानाटकम् से लिया गया है। पाठ-प्रवेश बताता है कि भारतीय संस्कृति माता-पिता और गुरु को देवतुल्य मानती है। उपनिषत् काल से ही इनकी महत्ता कही गई है। महाभारत के यक्षोपाख्यान में भी माता को भूमि से भी गुरुतर कहा गया है।
इस पाठ में भास ने दिखाया है कि राम की कैकेयी के प्रति निष्ठा और आदर-भावना इतिहास में अद्वितीय है। राम का अभिषेक रुकवाने और उन्हें वनवास दिलाने का कारण कैकेयी हैं। यह जानकर भी राम माता कैकेयी की आज्ञा को हितकारिणी ही मानते हैं।
पात्र: राम, लक्ष्मण, सीता और काञ्चुकीय (अन्तःपुर का वृद्ध सेवक)।
कवि और नाटक (योग्यताविस्तार से)
पाठ-सार
1. काञ्चुकीय का समाचार
काञ्चुकीय घबराकर आता है: "परित्रायतां परित्रायतां कुमारः" (कुमार, रक्षा कीजिए)। राम पूछते हैं कि किसकी रक्षा करनी है। उत्तर मिलता है: महाराज की। राम कहते हैं कि यों कहना चाहिए कि एक शरीर में सिमटी पृथ्वी (एकशरीरसंक्षिप्ता पृथिवी) की रक्षा करनी है, क्योंकि राजा ही पूरी पृथ्वी है। दोष कहाँ से उत्पन्न हुआ? "स्वजनात्" (अपने ही व्यक्ति से)।
शरीरेऽरिः प्रहरति हृदये स्वजनस्तथा।
कस्य स्वजनशब्दो मे लज्जामुत्पादयिष्यति॥1॥
शत्रु शरीर पर प्रहार करता है, पर स्वजन हृदय पर। राम सोचते हैं: किस स्वजन का नाम मुझे लज्जित करेगा?
2. कैकेयी के प्रति राम का विश्वास
नाम कैकेयी का आता है। राम कहते हैं: "किमम्बायाः, तेन हि उदर्केण गुणेनात्र भवितव्यम्"। यदि माता ने किया है, तो इसका परिणाम अवश्य गुणकारी होगा।
यस्याः शक्रसमो भर्ता मया पुत्रवती च या।
फले कस्मिन् स्पृहा तस्या येनाकार्यं करिष्यति॥2॥
जिसका पति इन्द्र के समान है और जो मुझ जैसे पुत्र से पुत्रवती है, उसे किस फल की इच्छा होगी जिसके लिए वह अनुचित कार्य करे?
काञ्चुकीय कहता है कि उन्हीं के कहने से आपका अभिषेक रुका है। राम उसमें भी गुण देखते हैं:
वनगमननिवृत्तिः पार्थिवस्यैव तावन्मम पितृपरवत्ता बालभावः स एव।
नवनृपतिविमर्शे नास्ति शङ्का प्रजानामथ च न परिभोगैर्वञ्चिता भ्रातरो मे॥3॥
राम चार लाभ गिनाते हैं:
भरत के अभिषेक की माँग पर भी राम कहते हैं:
शुल्के विपणितं राज्यं पुत्रार्थे यदि याच्यते।
तस्या लोभोऽत्र नास्माकं भ्रातृराज्यापहारिणाम्॥4॥
विवाह के समय शुल्क के रूप में दिया गया राज्य यदि पुत्र के लिए माँगा जा रहा है, तो इसमें लोभ उनका नहीं है। लोभ तो हमारा होता, यदि हम भाई का राज्य लेते। फिर राम कहते हैं: "अतः परं न मातुः परिवादं श्रोतुमिच्छामि" (अब माता की निन्दा नहीं सुनना चाहता)।
3. दशरथ का मोह और लक्ष्मण का क्रोध
शोक के कारण राजा ने बिना बोले हाथ के इशारे से ही काञ्चुकीय को विदा किया और मूर्च्छित हो गए (श्लोक 5)। यह सुनकर लक्ष्मण क्रोध में धनुष-बाण लेकर आते हैं। राम कहते हैं: धैर्य का सागर, अक्षोभ्य लक्ष्मण किसने क्षुब्ध कर दिया? (श्लोक 6)
लक्ष्मण कहते हैं: "यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दयाम्"। यदि राजा की मूर्च्छा सहन नहीं कर सकते, तो धनुष छुओ, दया नहीं। अपने लोगों के प्रति विनम्र व्यक्ति ऐसे ही तिरस्कृत होता है। वे युवतियों से रहित लोक बनाने का निश्चय करते हैं, क्योंकि हम छले गए हैं (श्लोक 7)। वे कहते हैं: क्रम से प्राप्त राज्य छिन गया और राजा भूमि पर शोचनीय आसन पर पड़े हैं, फिर भी सन्देह? यह क्षमा नहीं, निस्तेजता है (श्लोक 8)।
राम समझाते हैं:
भरतो वा भवेद् राजा वयं वा ननु तत् समम्।
यदि तेऽस्ति धनुःश्लाघा स राजा परिपाल्यताम्॥9॥
भरत राजा हों या हम, दोनों बराबर हैं। यदि तुम्हें धनुष पर गर्व है, तो उसी राजा (भरत) की रक्षा करो।
रोष में लक्ष्मण की भौंह ऐसी लगती है मानो तीनों लोकों को जलाना चाहती हो (श्लोक 10)। तब राम तीन पातक (पाप) गिनाकर पूछते हैं:
ताते धनुर्न मयि सत्यमवेक्ष्यमाणे मुञ्चानि मातरि शरं स्वधनं हरन्त्याम्।
दोषेषु बाह्यमनुजं भरतं हनानि किं रोषणाय रुचिरं त्रिषु पातकेषु॥11॥
इन तीन पापों में से क्रोध के लिए कौन-सा अच्छा है?
लक्ष्मण आँसू भरकर कहते हैं कि आप बिना जाने उलाहना देते हैं। मेरा क्रोध राज्य के लिए नहीं है। मेरा दुःख यह है कि आपको चौदह वर्ष वन में रहना होगा (श्लोक 12)।
4. सीता का निश्चय
राम सीता से मङ्गल के लिए दिए गए वल्कल (छाल के वस्त्र) मँगवाते हैं। सीता कहती हैं: "ननु सहधर्मचारिणी खल्वहम्" (मैं तो आपकी सहधर्मचारिणी हूँ)। राम कहते हैं कि मुझे अकेले जाना है। सीता कहती हैं: इसीलिए पीछे चलूँगी। राम कहते हैं कि वन में रहना होगा। सीता कहती हैं: "तत् खलु मे प्रासादः" (वही मेरा महल है)। सास-ससुर की सेवा की बात पर सीता कहती हैं कि उनके लिए देवताओं को प्रणाम है। राम लक्ष्मण से उन्हें रोकने को कहते हैं। लक्ष्मण उत्तर देते हैं: "नोत्सहे श्लाघनीये काले वारयितुमत्रभवतीम्" (इस प्रशंसनीय समय में आदरणीया को रोकने का साहस नहीं)।
चरित्र-वैशिष्ट्य
व्याकरण-बिंदु
सन्धि-विच्छेद
प्रकृति-प्रत्यय
अव्यय: ननु, तत्र, खलु, इति, अथ, तावत्, किल, अपि, एव, हन्त, कथम्।
शब्दार्थ
बोर्ड परीक्षा फोकस
रूपरेखा: कैकेय्याः वचनात् रामस्य अभिषेकः निवृत्तः। सा भरतस्य राज्याभिषेकम् अयाचत।
रूपरेखा: सत्यपालके पितरि धनुर्ग्रहणम्, स्वधनं हरन्त्यां मातरि शरमोचनम्, निर्दोषस्य अनुजस्य भरतस्य हननम्। एतानि त्रीणि पातकानि।
रूपरेखा: शत्रु का आघात शरीर तक सीमित है, पर अपनों का आघात मन को घायल करता है। इसलिए स्वजन का दोष अधिक पीड़ा देता है।
- 'एकशरीरसंक्षिप्ता पृथिवी रक्षितव्या': राम काञ्चुकीय से।
- 'अलमुपहतासु स्त्रीबुद्धिषु…': काञ्चुकीय राम से।
- 'रोदितव्ये काले सौमित्रिणा धनुर्गृहीतम्': सीता राम से।
- 'न शक्नोमि रोषं धारयितुम्': लक्ष्मण राम से।
- 'एनामुद्दिश्य देवतानां प्रणामः क्रियते': सीता राम से।
- 'यत्कृते महति क्लेशे…': लक्ष्मण राम से।
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓पाठ महाकवि भास के सात अङ्कों वाले प्रतिमानाटकम् से है। भरत दशरथ की प्रतिमा देखकर पिता की मृत्यु जानते हैं, इसी से नाटक का नाम पड़ा।
- ✓राम कैकेयी को दोषी नहीं मानते। वे अभिषेक रुकने में भी चार लाभ देखते हैं और माता की निन्दा सुनने से मना करते हैं।
- ✓लक्ष्मण क्रोध में धनुष उठाते हैं। राम तीन पातकों (पिता, माता, भाई पर प्रहार) का प्रश्न रखकर उन्हें शान्त करते हैं। 'भरतो वा भवेद् राजा वयं वा ननु तत् समम्'।
- ✓सीता सहधर्मचारिणी के रूप में वन जाने का निश्चय करती हैं: 'तत् खलु मे प्रासादः'।
- ✓व्याकरण: तव्यत्, तुमुन्, क्त, णिच्, मतुप् प्रत्यय; पूर्वरूप, यण्, वृद्धि, गुण सन्धियाँ; ननु, खलु, किल आदि अव्यय।
👨🏫 Teaching Tips
- →पाठ को तीन दृश्यों में बाँटकर नाट्य-पाठ कराएँ: काञ्चुकीय-राम, राम-लक्ष्मण, राम-सीता। हर दल अपने श्लोकों का अर्थ प्रस्तुत करे।
- →'कः कं प्रति कथयति' के लिए संवाद-कार्ड बनवाएँ। एक ओर वाक्य, दूसरी ओर वक्ता और श्रोता।
- →श्लोक 3 के चार लाभ और श्लोक 11 के तीन पातक श्यामपट पर क्रमांकित सूची में लिखवाएँ। ये सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
- →वाल्मीकि-रामायण के प्रसंग से तुलना कराएँ: भास ने राम को कैकेयी के प्रति और अधिक उदार क्यों दिखाया? इससे नाटककार की मौलिकता समझ आएगी।
- →'यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दयाम्' पर वाद-विवाद कराएँ: क्रोध उचित या क्षमा? राम के उत्तर से निष्कर्ष निकलवाएँ।
- →तव्यत्-प्रत्यय वाले पद (परित्रातव्यः, वक्तव्यम्, रक्षितव्या, भवितव्यम्, वस्तव्यम्, गन्तव्यम्) पाठ से खोजने की प्रतियोगिता कराएँ।
- →भास के तेरह नाटकों की सूची के लिए स्मृति-सूत्र बनवाएँ और प्रतिमानाटकम् के नामकरण की कथा अवश्य सुनाएँ।
📋 Assessment Questions
- एकपद उत्तर: शरीरे कः प्रहरति? (अरिः), कैकेय्याः भर्ता केन समः? (शक्रेण), प्रतिमानाटकस्य रचयिता? (भासः)।
- पूर्णवाक्य उत्तर: अभिषेक-निवृत्ति का कारण, लक्ष्मण का निश्चय, राम के तीन पातक।
- कः कं प्रति कथयति और रेखाङ्कित पदों पर प्रश्न-निर्माण।
- भावार्थ (श्लोक 1, 3, 7, 12) और राम-लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण।
- सन्धि-विच्छेद और प्रकृति-प्रत्यय (परित्रातव्यः, पुत्रवती, श्रोतुम्, विसर्जितः, क्षोभितः)।
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