प्रजानुरञ्जको नृपः – Class 12 Sanskrit Chapter 3 Notes & NCERT PDF
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पाठ 3: प्रजानुरञ्जको नृपः
पाठ-परिचय
प्रजानुरञ्जको नृपः (प्रजा को प्रसन्न रखने वाला राजा) महाकवि कालिदास के महाकाव्य रघुवंशम् के प्रथम सर्ग से लिया गया है। इन आरम्भिक श्लोकों में कालिदास रघुकुल के राजाओं के गुणों का वर्णन करते हैं। इसके माध्यम से वे संसार को बताते हैं कि शासक में कौन-कौन से गुण होने चाहिए।
पाठ-प्रवेश के अनुसार:
कालिदास भारत के ही नहीं, विश्व के शासकों के सामने यह अनुकरणीय आदर्श रखते हैं।
रघुवंश और महाकाव्य (योग्यताविस्तार से)
- दो महाकाव्य: रघुवंशम्, कुमारसम्भवम्
- तीन नाटक: मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्
- खण्डकाव्य: मेघदूतम्, ऋतुसंहारम्
पाठ-सार और प्रमुख श्लोक
रघुवंशियों के गुण (श्लोक 1–2)
त्यागाय सम्भृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम्।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम्॥1॥
रघुवंशी चार उद्देश्यों से चार काम करते थे:
हर कार्य का उद्देश्य उदात्त है।
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम्॥2॥
वे बचपन में विद्या पढ़ते थे, यौवन में विषय-सुख भोगते थे, बुढ़ापे में मुनियों जैसा जीवन जीते थे और अन्त में योग से शरीर छोड़ते थे। इस श्लोक में चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) का संकेत है।
कवि की विनम्रता (श्लोक 3)
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन्।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः॥3॥
कवि कहते हैं कि मेरा वाणी-वैभव थोड़ा है (तनुवाग्विभवः), फिर भी मैं रघुओं के वंश का वर्णन करूँगा। उनके गुण कानों तक पहुँचकर मुझे इस चपलता (दुस्साहस) के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
मनु और दिलीप (श्लोक 4–6)
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम्।
आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव॥4॥
विद्वानों में माननीय वैवस्वत मनु राजाओं में पहले थे, जैसे वेदों में प्रणव (ओङ्कार) पहला है।
तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव॥5॥
उस पवित्र वंश में उससे भी अधिक पवित्र, राजाओं में चन्द्रमा के समान दिलीप उत्पन्न हुए। यह वैसा ही था जैसे क्षीरसागर में चन्द्रमा।
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः।
आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः॥6॥
यहाँ गुणों की शृङ्खला है:
कर-नीति (श्लोक 7): पाठ का केन्द्रीय श्लोक
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।
सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः॥7॥
दिलीप प्रजा की ही भलाई के लिए उनसे बलि (कर/टैक्स) लेते थे। जैसे सूर्य हजार गुना बरसाने के लिए ही पृथ्वी से जल (रस) ग्रहण करता है। यह दृष्टान्त अलंकार का सुन्दर उदाहरण है। आधुनिक कल्याणकारी राज्य की कर-नीति का आदर्श भी यही है।
गुणों का सामञ्जस्य (श्लोक 8)
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः।
गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव॥8॥
उनके विरोधी-से दिखने वाले गुण भी साथ रहते थे, मानो सहोदर (सगे भाई) हों।
प्रजा के सच्चे पिता (श्लोक 9)
प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाद्भरणादपि।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः॥9॥
दिलीप प्रजा को विनय की शिक्षा देते थे, उनकी रक्षा करते थे और भरण-पोषण करते थे। इसलिए वही प्रजा के वास्तविक पिता थे। प्रजाओं के अपने पिता तो केवल जन्म के कारण थे।
न्याय-दृष्टि (श्लोक 10)
द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम्।
त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता॥10॥
यहाँ उपमा अलंकार है।
एकछत्र शासन (श्लोक 11)
स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम्।
अनन्यशासनामुर्वीं शशासैकपुरीमिव॥11॥
समुद्र-तट ही जिसका परकोटा था और समुद्र ही जिसकी खाई था, ऐसी पूरी पृथ्वी पर दिलीप ने, जहाँ किसी दूसरे का शासन नहीं था, एक नगरी की तरह शासन किया।
व्याकरण-बिंदु
समास (शब्दार्थ से)
प्रकृति-प्रत्यय
सन्धि
लकार: वक्ष्ये (वच्, लृट्, उ.पु. एकवचन); अग्रहीत् (ग्रह्, लुङ्); आदत्ते (आ + दा, लट्, आत्मनेपद); शशास (शास्, लिट्)।
शब्दार्थ
बोर्ड परीक्षा फोकस
उत्तर: रविः सहस्रगुणम् उत्स्रष्टुम् (वर्षितुम्) रसम् आदत्ते।
अन्वय (श्लोक 11): सः वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् अनन्यशासनाम् उर्वीम् एकपुरीम् इव शशास।
रूपरेखा: राजा का कर-ग्रहण स्वार्थ के लिए नहीं, प्रजा की उन्नति के लिए था। सूर्य-जल का दृष्टान्त दें। आज के कल्याणकारी राज्य से जोड़ें।
- महीक्षिताम् आद्यः? मनुः
- रघुवंशिनः अन्ते केन तनुं त्यजन्ति? योगेन
- कः प्रियः अपि त्याज्यः? दुष्टः
- दिलीपः किम् अग्रहीत्? बलिम्
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓पाठ कालिदास के रघुवंशम् (19 सर्ग) के प्रथम सर्ग से है। इसमें रघुवंशियों और दिलीप के माध्यम से आदर्श शासक के गुण बताए गए हैं।
- ✓रघुवंशी दान के लिए धन, सत्य के लिए मितभाषण, यश के लिए विजय और सन्तान के लिए विवाह करते थे। जीवन चार आश्रमों के क्रम में जीते थे।
- ✓दिलीप प्रजा की भलाई के लिए ही कर लेते थे, जैसे सूर्य हजार गुना बरसाने के लिए जल लेता है।
- ✓विनय-शिक्षा, रक्षण और भरण के कारण दिलीप प्रजा के सच्चे पिता थे। सज्जन शत्रु भी मान्य और दुष्ट प्रिय भी त्याज्य था।
- ✓व्याकरण: उपपद तत्पुरुष और बहुव्रीहि समास; ल्यप्, तुमुन्, क्त, ण्यत्, मतुप् प्रत्यय; उपमा और दृष्टान्त अलंकार।
👨🏫 Teaching Tips
- →पाठ की शुरुआत प्रश्न से करें: 'आज हम सरकार को कर क्यों देते हैं?' फिर श्लोक 7 से कालिदास का उत्तर दिखाएँ।
- →श्लोक 1-2 को 'उद्देश्य → कार्य' और 'आयु → जीवन-शैली' वाली दो सूचियों में लिखवाएँ। इससे चार आश्रम और चार उद्देश्य याद हो जाएँगे।
- →श्लोक 6 की शृङ्खला (आकार → प्रज्ञा → आगम → आरम्भ → उदय) को तीर-चिह्नों वाले प्रवाह-चित्र से समझाएँ।
- →अलंकार-पहचान अभ्यास कराएँ: श्लोक 4, 5 और 10 में उपमा, श्लोक 7 में दृष्टान्त। उपमान और उपमेय अलग-अलग लिखवाएँ।
- →अन्वय-लेखन का अभ्यास श्लोक 9 और 11 से कराएँ। पहले कर्ता और क्रिया ढूँढें, फिर विशेषण जोड़ें।
- →समास-विग्रह का खेल कराएँ: एक दल पद बोले, दूसरा विग्रह और समास का नाम बताए (तनुवाग्विभवः, अनन्यशासनाम्, राजेन्दुः)।
- →कालिदास की सात कृतियों को महाकाव्य, नाटक और खण्डकाव्य वर्गों में छाँटने का कार्ड-खेल कराएँ।
📋 Assessment Questions
- एकपद उत्तर: महीक्षिताम् आद्यः, तनुत्याग का साधन (योग), दिलीप ने क्या लिया (बलि), कौन प्रिय होकर भी त्याज्य (दुष्ट)।
- पूर्णवाक्य उत्तर: रवि रस क्यों लेता है; दिलीप के कार्यों का आरम्भ कैसा था; मनु कैसे थे।
- श्लोक 9 और 11 का अन्वय तथा 'प्रजानामेव भूत्यर्थम्…' का भावार्थ।
- विशेषण-विशेष्य और विपरीतार्थ मेलन; प्रकृति-प्रत्यय (आगत्य, उत्स्रष्टुम्, सम्मतः, त्याज्यः, शिष्टः)।
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