सूक्ति-सौरभम् – Class 12 Sanskrit Chapter 5 Notes & NCERT PDF
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पाठ 5: सूक्ति-सौरभम्
पाठ-परिचय
सूक्ति-सौरभम् (सूक्तियों की सुगन्ध) में प्राचीन और अर्वाचीन (आधुनिक) दोनों प्रकार के कवियों की चुनी हुई बारह सूक्तियाँ हैं।
पाठ-प्रवेश के अनुसार किसी भाषा की सूक्तियाँ उस समाज के मनीषियों के शताब्दियों के अनुभव प्रकट करती हैं। ये आकार में छोटी होती हैं, पर इनमें विशाल भाव-गाम्भीर्य होता है। इन्हीं से भाषा की समृद्धि झलकती है। चाणक्य, भर्तृहरि और विष्णुशर्मा के सुभाषित चिरकाल से प्रसिद्ध हैं, और आधुनिक लेखक भी इसमें पीछे नहीं रहे।
विद्यार्थियों को ये सूक्तियाँ कण्ठस्थ करनी चाहिए। वाद-विवाद, भाषण-प्रतियोगिता और दैनिक व्यवहार में ये बहुत प्रभावी होती हैं।
सूक्तियाँ: मूल, अर्थ और भाव
1. मौन: अज्ञानी का आभूषण (भर्तृहरि)
स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥
विधाता ने अज्ञान को ढकने के लिए एक ऐसा आवरण बनाया है जो अपने ही अधीन है और पूर्णतः गुणकारी है। वह आवरण है मौन। विशेषकर सर्वज्ञ विद्वानों की सभा में मौन ही मूर्खों का आभूषण है।
2. विद्या ही सच्चा रूप (मङ्गलदेव शास्त्री)
रूपं प्रसिद्धं न बुधास्तदाहुर्विद्यावतां वस्तुत एव रूपम्।
अपेक्षया रूपवतां हि विद्या मानं लभन्तेऽतितरां जगत्याम्॥
विद्वान प्रसिद्ध (बाहरी) रूप को सच्चा रूप नहीं कहते। विद्यावानों की विद्या ही वास्तविक रूप है। संसार में रूपवानों की अपेक्षा विद्यावान अधिक सम्मान पाते हैं।
3. दुर्जन का स्वभाव नहीं बदलता
न दुर्जनः सज्जनतामुपैति शठः सहस्रैरपि शिक्ष्यमाणः।
चिरं निमग्नोऽपि सुधासमुद्रे न मन्दरो मार्दवमभ्युपैति॥
हज़ारों बार सिखाने पर भी दुष्ट सज्जन नहीं बनता। अमृत-समुद्र (समुद्र-मन्थन) में बहुत समय तक डूबे रहने पर भी मन्दराचल कोमल नहीं हुआ।
4. खल केवल दोष देखता है (महाकवि बिल्हण)
कर्णामृतं सूक्तिरसं विमुच्य दोषेषु यत्नः सुमहान् खलानाम्।
निरीक्षते केलिवनं प्रविश्य क्रमेलकः कण्टकजालमेव॥
कानों के लिए अमृत जैसे सूक्ति-रस को छोड़कर दुष्टों का बड़ा प्रयत्न दोष ढूँढने में होता है। जैसे ऊँट (क्रमेलक) सुन्दर क्रीड़ा-वन में घुसकर भी काँटों का झुरमुट ही खोजता है।
5. लक्ष्मी किसके पास जाती है (विष्णुशर्मा)
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः॥
लक्ष्मी ऐसे व्यक्ति के पास स्वयं रहने के लिए जाती है:
6. बनाना कठिन, नष्ट करना सरल (सूक्तिमुक्तावली)
दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तु निमेषमात्रेण भजेद् विनाशम्।
कर्तुं कुलालस्य तु वर्षमेकं भेत्तुं हि दण्डस्य मुहूर्तमात्रम्॥
लम्बे प्रयत्न से बनी वस्तु पल-भर में नष्ट हो सकती है। कुम्हार को (घड़ा) बनाने में एक वर्ष लगता है, पर डण्डे को तोड़ने में क्षण-भर।
7. बार-बार प्रयत्न (अज्ञात कवि)
आरभेत हि कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः।
कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते॥
थक-थककर भी बार-बार काम आरम्भ करना चाहिए। कर्म आरम्भ करने वाले पुरुष की ही श्री (लक्ष्मी/सफलता) सेवा करती है।
8. एक सुपुत्र (चाणक्यनीति)
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥
विद्वान और सज्जन एक सुपुत्र से भी पूरा कुल आनन्दित होता है, जैसे चन्द्रमा से रात्रि। (उपमा अलंकार)
9. गुणी ही गुण पहचानता है (चाणक्यनीति)
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥
10. जल के गुण (वैद्यकीय सुभाषित संग्रह)
अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषापहम्॥
11. शास्त्र: सबका नेत्र (हितोपदेश)
अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः॥
शास्त्र:
जिसके पास शास्त्र नहीं, वह अन्धा ही है।
12. अल्पज्ञ बकता है, विद्वान मितभाषी
अल्पज्ञ एव पुरुषः प्रलपत्यजस्रं पाण्डित्यसम्भृतमतिस्तु मितप्रभाषी।
कांस्यं यथा हि कुरुतेऽतितरां निनादं तद्वत् सुवर्णमिह नैव करोति नादम्॥
अल्पज्ञ ही निरन्तर बकता है, पर पाण्डित्य से भरी बुद्धि वाला कम बोलता है। जैसे काँसा बहुत आवाज़ करता है, पर सोना आवाज़ नहीं करता।
भावविस्तार (योग्यताविस्तार से)
व्याकरण-बिंदु
सन्धि-विच्छेद (पाठ से)
प्रकृति-प्रत्यय
पर्याय (पाठ के अनुसार)
विलोम
शब्दार्थ
बोर्ड परीक्षा फोकस
- कः कण्टकजालं पश्यति? क्रमेलकः
- शर्वरी केन भाति? चन्द्रेण
- अजीर्णे किं भेषजम्? वारि
- सर्वस्य लोचनं किम्? शास्त्रम्
- कः निरन्तरं प्रलपति? अल्पज्ञः
- सर्वविदां समाजे अपण्डितानां मौनं विभूषणम् (अस्ति)।
- एकेन अपि विद्यायुक्तेन साधुना सुपुत्रेण कुलं विभाति (आह्लादितं भवति)।
- सिंहः बलेन विभाति।
- गुणी: गुणेन
- शर्वरी: चन्द्रेण
- विद्वान्: विद्यया
- सिंहः: बलेन
- कुलम्: सुपुत्रेण
- अभ्यास के प्रश्न 'के सर्वलोकस्य दासाः सन्ति?' और विलोम 'आशायाः' छपी सूक्तियों में नहीं हैं। ये प्रसिद्ध सूक्ति "आशाया ये दासास्ते दासाः सर्वलोकस्य" से हैं। उत्तर: जो आशा (तृष्णा) के दास हैं, वे सारे संसार के दास हैं।
- 'भोजनान्ते किं विषम्?' प्रचलित पाठभेद 'भोजनान्ते विषप्रदम्' पर आधारित है (उत्तर: वारि)। पुस्तक के छपे श्लोक में 'विषापहम्' है।
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓पाठ में प्राचीन (भर्तृहरि, विष्णुशर्मा, चाणक्य, बिल्हण, हितोपदेश) और आधुनिक (मङ्गलदेव शास्त्री आदि) कवियों की बारह सूक्तियाँ हैं, जो कण्ठस्थ करने और भाषण में प्रयोग के लिए हैं।
- ✓विद्या और शास्त्र की महिमा: विद्या ही सच्चा रूप है, शास्त्र सबका नेत्र है, विद्वान मितभाषी होता है (काँसा बनाम सोना)।
- ✓परिश्रम और चरित्र: लक्ष्मी उत्साही, अदीर्घसूत्री और कृतज्ञ के पास स्वयं जाती है; थककर भी बार-बार कर्म आरम्भ करना चाहिए; बनाना कठिन, नष्ट करना सरल है।
- ✓दुर्जन और खल का स्वभाव नहीं बदलता (मन्दराचल, ऊँट के दृष्टान्त); गुणी ही गुण पहचानता है; एक सुपुत्र से कुल वैसे प्रकाशित होता है जैसे चन्द्र से रात्रि।
- ✓व्याकरण: मतुप्, क्त, ल्यप्, तुमुन्, शानच् प्रत्यय; यण्, पूर्वरूप, विसर्ग सन्धियाँ; पर्याय, विलोम और विशेषण-विशेष्य मेलन।
👨🏫 Teaching Tips
- →हर दिन कक्षा की शुरुआत एक सूक्ति से करें। बारह दिनों में पूरा पाठ कण्ठस्थ हो जाएगा। सस्वर पाठ और लय पर ध्यान दें।
- →सूक्ति-अन्त्याक्षरी और 'भाषण में सूक्ति' प्रतियोगिता कराएँ: विद्यार्थी किसी विषय (परिश्रम, विद्या, मित्रता) पर एक मिनट बोलें और उचित सूक्ति उद्धृत करें।
- →दृष्टान्त-पहचान अभ्यास: हर सूक्ति में उपमेय (मनुष्य) और उपमान (मन्दर, ऊँट, कुम्हार, कोयल, काँसा) अलग-अलग लिखवाएँ।
- →सूक्ति 5 के सात गुणों से 'सफल व्यक्ति' का पोस्टर बनवाएँ। 'दीर्घसूत्री' (टालमटोल) शब्द को आधुनिक procrastination से जोड़ें।
- →सूक्ति 10 पर विज्ञान-शिक्षक के साथ चर्चा कराएँ, पर स्पष्ट करें कि यह पारम्परिक वैद्यक सुभाषित है।
- →पर्याय और विलोम के लिए फ़्लैश-कार्ड जोड़े बनवाएँ (क्रमेलकः-उष्ट्रः, कृतज्ञम्-अकृतज्ञम्) और जोड़ी-मिलान खेल कराएँ।
- →अभ्यास में छपे श्लोकों से बाहर के प्रश्नों ('सर्वलोकस्य दासाः', 'भोजनान्ते विषम्') पर पहले से ध्यान दिलाएँ और सन्दर्भ समझा दें।
📋 Assessment Questions
- एकपद उत्तर: कण्टकजाल कौन देखता है, शर्वरी किससे शोभित, अजीर्ण में औषधि, सबका लोचन, कौन निरन्तर बकता है।
- पूर्णवाक्य उत्तर और 'कः केन विभाति' मेलन (गुणी-गुणेन, शर्वरी-चन्द्रेण, कुलम्-सुपुत्रेण, सिंहः-बलेन, विद्वान्-विद्यया)।
- रेखाङ्कित पदों पर प्रश्न-निर्माण और रिक्त-स्थान पूर्ति (सूक्ति 5, 8)।
- प्रकृति-प्रत्यय, पर्याय और विलोम मेलन; विशेषण-विशेष्य (एकेन-सुपुत्रेण, अल्पज्ञः-पुरुषः, सुमहान्-यत्नः)।
- किसी दो सूक्तियों का भावार्थ, दृष्टान्त और जीवन में उपयोग सहित।
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