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नैकेनापि समं गता वसुमती – Class 12 Sanskrit Chapter 6 Notes & NCERT PDF

Class 12SanskritChapter 6NCERT book: भास्वती भाग 2 (Bhaswati) - Sanskrit Class 12

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पाठ 6: नैकेनापि समं गता वसुमती

परिचय

षष्ठः पाठः — नैकेनापि समं गता वसुमती बल्लालसेन द्वारा रचित भोजप्रबन्ध के "भोजराजस्य राज्यप्राप्तिप्रबन्ध" अंश का सम्पादित एवं संक्षिप्त रूपान्तरण है। पाठ-प्रवेश के अनुसार इस कथा का केन्द्रीय सन्देश है — जब मनुष्य के मन में लोभ छा जाता है, तब वह निष्ठुर होकर घृणित से घृणित कार्य करने से भी नहीं हिचकता। परन्तु एक सच्चा, नश्वरता-बोधक वचन पत्थर-हृदय को भी पिघला सकता है। पाठ का शीर्षक उसी प्रसिद्ध श्लोक का अन्तिम चरण है जिसे बालक भोज ने मृत्यु के सामने अपने चाचा मुञ्ज के लिए सन्देश रूप में भेजा था — "नैकेनापि समं गता वसुमती" (पृथ्वी किसी एक के साथ भी नहीं गई)।

पाठ सरल गद्य-संस्कृत में है, अतः यह ल्यप्, क्त्वा, क्तवतु, तव्यत् जैसे कृदन्त प्रत्ययों तथा सन्धि के अभ्यास के लिए आदर्श है।

पाठ का सार

1. सिन्धुल की दुविधा: प्राचीन काल में धारा राज्य में सिन्धुल नामक राजा ने दीर्घकाल तक प्रजा का पालन किया। वृद्धावस्था में उनके पुत्र भोज उत्पन्न हुए। जब भोज पाँच वर्ष के थे, तब राजा ने अपनी जरा (बुढ़ापा) जानकर सोचा — यदि राज्य-भार उठाने में समर्थ सहोदर मुञ्ज को छोड़कर पुत्र को राज्य दूँ तो लोकापवाद होगा; और यदि मुञ्ज राज्य-लोभ से बालक को विष आदि से मार देगा तो दिया हुआ राज्य भी व्यर्थ होगा — "पुत्रहानिर्वंशोच्छेदश्च"। अतः उन्होंने राज्य मुञ्ज को देकर भोज को उसकी गोद (उत्सङ्ग) में सौंप दिया।

2. मुञ्ज का राज्य और भविष्यवाणी: राजा के दिवंगत होने पर राज्य-सम्पत्ति पाकर मुञ्ज ने मुख्यमन्त्री बुद्धिसागर को पद से हटा दिया और दूसरे को नियुक्त किया। एक दिन सभा में ज्योतिषशास्त्र में पारङ्गत एक ब्राह्मण आया और बोला कि लोग मुझे सर्वज्ञ कहते हैं। मुञ्ज ने भोज की जन्मपत्रिका बनवाई। ब्राह्मण ने कहा —

पञ्चाशत्पञ्चवर्षाणि सप्तमासदिनत्रयम्।
भोजराजेन भोक्तव्यः सगौडो दक्षिणापथः॥

अर्थात् भोजराज पचपन वर्ष, सात मास और तीन दिन तक गौड देश सहित दक्षिणापथ का भोग (शासन) करेंगे। यह सुनकर मुञ्ज का मुख कान्तिहीन (विच्छायवदन) हो गया। रात में उसने सोचा — "यदि राजलक्ष्मी भोजकुमार के पास जाएगी तो मैं जीवित रहते हुए भी मृत हूँ।"

3. वध का षड्यन्त्र: बिना भोजन किए मुञ्ज ने बङ्गदेशाधीश्वर वत्सराज को बुलाया और निर्जन महल में आदेश दिया कि भोज को भुवनेश्वरी-विपिन में रात को मार कर उसका कटा सिर अन्तःपुर में लाया जाए। वत्सराज ने विनम्रता से कहा — "देव! पुत्रवधो न कदापि हिताय भवति" (पुत्र-वध कभी हितकारी नहीं होता)। कुपित राजा ने कहा — "तुम मेरे सेवक हो, जो कहा जाए वही करो।" राजाज्ञा पालनीय है, यह मानकर वत्सराज चुप हो गया।

4. भोज का सन्देश और वत्सराज का हृदय-परिवर्तन: अनिच्छा से वत्सराज भोज को रथ में बिठाकर रात में वन ले गया। अपनी वध-योजना जानकर भोज ने उससे कुछ कहा, जिसके वचनों से वैराग्य पाकर वत्सराज ने उसे नहीं मारा, बल्कि घर लाकर भूमि के भीतर (गुप्त स्थान में) छिपाकर रक्षा की। फिर कृत्रिम सिर बनवाकर राजा से कहा कि आज्ञा पूरी हुई। मुञ्ज ने पूछा — खड्ग-प्रहार के समय उसने क्या कहा? तब वत्सराज ने भोज का अन्तिम सन्देश-रूप श्लोक सौंपा।

5. मुञ्ज का पश्चात्ताप और भोज का "पुनर्जीवन": श्लोक पढ़कर शोक-सन्तप्त मुञ्ज ने प्रायश्चित्त के लिए अग्नि-प्रवेश का निश्चय किया। तब वत्सराज ने बुद्धिसागर से धीरे से कहा कि भोज सुरक्षित है। बुद्धिसागर ने उसके कान में कुछ कहा। अग्नि-प्रवेश के समय एक कापालिक सभा में आया; मुञ्ज ने दण्डवत् प्रणाम कर पुत्र के प्राणदान की याचना की। कापालिक ने कहा — "मा भैषीः, शिवप्रसाद से वह जीवित होगा।" योजनानुसार भोज श्मशान में लाया गया और "योगिना भोजो जीवितः" की कथा लोक में फैल गई। हाथी पर चढ़कर भोज राजभवन आया। सन्तुष्ट मुञ्ज ने उसे अपने सिंहासन पर बिठाया और पटरानियों सहित तपोवन जाकर तप किया। भोज ने चिरकाल तक प्रजा-पालन किया।

प्रमुख श्लोक और अर्थ

मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालङ्कारभूतो गतः
सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यान्तकः।
अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते
नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति॥

अर्थ: सत्ययुग के आभूषण-स्वरूप राजा मान्धाता चले गए; जिसने महासागर पर सेतु बनाया, वह रावण का संहारक (राम) कहाँ है? युधिष्ठिर आदि अन्य राजा भी स्वर्ग चले गए। हे राजन्! यह पृथ्वी किसी एक के साथ भी नहीं गई — निश्चय ही (अब) तुम्हारे साथ जाएगी! (व्यंग्य: कोई भी पृथ्वी को साथ नहीं ले जा सकता, तुम भी नहीं।) पाठ-प्रवेश के अनुसार यह श्लोक संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में प्रसिद्ध है। इसमें तीनों युगों के आदर्श राजाओं (कृतयुग – मान्धाता, त्रेता – राम, द्वापर – युधिष्ठिर) के उदाहरण से संसार की नश्वरता दिखाई गई है।

प्रमुख वाक्य: "पुत्रवधो न कदापि हिताय भवति", "यदि राजलक्ष्मीर्भोजकुमारं गमिष्यति, तदाहं जीवन्नपि मृतः", "राजाज्ञा पालनीयैव"।

व्याकरण बिंदु

सन्धि-विच्छेद (पाठ से): पञ्चवार्षिकस्तदा = पञ्चवार्षिकः + तदा; ह्यात्मनो = हि + आत्मनः; मुख्यामात्यानाहूयानुजम् = मुख्य + अमात्यान् + आहूय + अनुजम्; विच्छायवदनोऽभूत् = विच्छायवदनः + अभूत्; जीवन्नपि = जीवन् + अपि; प्रणिपत्योपविष्टः = प्रणिपत्य + उपविष्टः; पालनीयैवेति = पालनीया + एव + इति; सेतुर्येन = सेतुः + येन; दशास्यान्तकः = दश + आस्य + अन्तकः; नैकेनापि = न + एकेन + अपि; तपस्तेपे = तपः + तेपे।

प्रकृति-प्रत्यय: आलोक्य = आ + लोक् + ल्यप्; संवीक्ष्य = सम् + वि + ईक्ष् + ल्यप्; अपहाय = अप + हा + ल्यप्; दत्तम् = दा + क्त; निशम्य = नि + शम् + ल्यप्; समागम्य = सम् + आ + गम् + ल्यप्; विधाय = वि + धा + ल्यप्; भोक्तव्यः = भुज् + तव्यत्; हन्तव्यः = हन् + तव्यत्; आनेतव्यम् = आ + नी + तव्यत्; नत्वा = नम् + क्त्वा; मत्वा = मन् + क्त्वा; नीतवान् = नी + क्तवतु; हतवान् = हन् + क्तवतु; आदिष्टम् = आ + दिश् + क्त।

धातु-रूप परिचय: पर्यपालयत् = परि + पाल्, लङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन; प्रयच्छामि = प्र + यम् (यच्छ्), लट्, उत्तम पुरुष, एकवचन; व्यचिन्तयत् = वि + चिन्त्, लङ्, प्र.पु., ए.व.; यास्यति = या, लृट्, प्र.पु., ए.व.; असि = अस्, लट्, मध्यम पुरुष, ए.व.

शब्द-रूप: पुत्राय (पुत्र, पुं., चतुर्थी); भूमौ (भूमि, स्त्री., सप्तमी); श्रीमता (श्रीमत्, पुं., तृतीया); महोदधौ (महोदधि, पुं., सप्तमी); वह्नौ (वह्नि, पुं., सप्तमी)।

शब्दार्थ

समजनि – उत्पन्न हुआ; जराम् – बुढ़ापे को; अपहाय – छोड़कर; वृथा – व्यर्थ; उत्सङ्गे – गोद में; दिवङ्गते – मृत्यु होने पर; विच्छायवदनः – कान्तिहीन मुख वाला; निशीथे – आधी रात में; प्रणिपत्य – प्रणाम करके; सौधम् – महल; विपिने – वन में; मत्पार्श्वे – मेरे पास; अधीत्य – पढ़कर; मा भैषीः – मत डरो; प्रसृता – फैल गई; दशास्यान्तकः – रावण का नाश करने वाला (राम)।

बोर्ड परीक्षा फोकस

  • प्रश्न: सिन्धुलः किं विचारयामास? — उत्तर-रूपरेखा: सिन्धुलः अचिन्तयत् यत् यदि समर्थं सहोदरं मुञ्जम् अपहाय बालाय पुत्राय राज्यं ददामि तदा लोकापवादः; मुञ्जः राज्यलोभात् पुत्रं मारयिष्यति चेत् दत्तमपि राज्यं वृथा, पुत्रहानिः वंशोच्छेदश्च भविष्यति। अतः सः राज्यं मुञ्जाय दत्त्वा भोजं तस्य उत्सङ्गे मुमोच।
  • प्रश्न: मुञ्जः किम् अचिन्तयत्? — "यदि राजलक्ष्मीः भोजकुमारं गमिष्यति, तदा अहं जीवन् अपि मृतः।"
  • प्रश्न: श्लोक की व्याख्या/भावार्थ — मान्धाता, राम, युधिष्ठिर के उदाहरण; नश्वरता; व्यंग्यार्थ "त्वया यास्यति"; श्लोक का प्रभाव — वत्सराज व मुञ्ज दोनों का हृदय-परिवर्तन।
  • अन्य: एकपद उत्तर (धाराराज्ये सिन्धुलः; मुञ्जः बुद्धिसागरं दूरीकृतवान्; वत्सराजः भोजं वनं नीतवान्; महोदधौ सेतुः रामेण रचितः), रेखाङ्कित पद पर प्रश्न-निर्माण, अव्यय से रिक्त-स्थान (पुरा, चिरम्, तदा, किमर्थम्, एव, तु)।

    सामान्य भूलें

  • मुञ्ज को भोज का भाई लिखना — मुञ्ज भोज का चाचा (सिन्धुल का अनुज) है।
  • बुद्धिसागर को वध का आदेश पाने वाला समझना — आदेश वत्सराज को मिला था; बुद्धिसागर पदच्युत मुख्यमन्त्री था जिसने अन्त में योजना बनाई।
  • श्लोक का अन्तिम चरण "त्वया यास्यति" का सीधा अर्थ लेना — यह व्यंग्य है।
  • "दशास्यान्तकः" को रावण समझना — इसका अर्थ है रावण का अन्तक (राम)।
  • ल्यप् और क्त्वा में भ्रम — उपसर्ग होने पर ल्यप् (आलोक्य, निशम्य), बिना उपसर्ग क्त्वा (नत्वा, ज्ञात्वा)।
  • पृथ्वी के पर्यायवाची "वसुमती" को धनवती स्त्री समझना — यहाँ इसका अर्थ पृथ्वी है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पाठ बल्लालसेन-कृत भोजप्रबन्ध के 'भोजराजस्य राज्यप्राप्तिप्रबन्ध' का संक्षिप्त रूपान्तरण है; विषय है लोभ का दुष्परिणाम और नश्वरता का बोध।
    • ✓सिन्धुल ने लोकापवाद और पुत्र-हानि दोनों से बचने हेतु राज्य अनुज मुञ्ज को देकर पाँच वर्ष के भोज को उसकी गोद में सौंपा।
    • ✓ज्योतिषी की भविष्यवाणी (55 वर्ष 7 मास 3 दिन तक भोज का राज्य) से लोभग्रस्त मुञ्ज ने वत्सराज को भोज-वध का आदेश दिया।
    • ✓'मान्धाता च महीपतिः...' श्लोक ने वत्सराज और मुञ्ज दोनों का हृदय बदला; 'नैकेनापि समं गता वसुमती' संसार की नश्वरता का सूत्र है।
    • ✓पाठ ल्यप्, क्त्वा, तव्यत्, क्तवतु प्रत्ययों, लकार-परिचय और सन्धि-विच्छेद के अभ्यास का मुख्य आधार है।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कथा को पाँच दृश्यों (सिन्धुल की दुविधा, भविष्यवाणी, षड्यन्त्र, श्लोक, पुनर्जीवन) में बाँटकर कक्षा में लघु नाट्य-पाठ कराएँ।
    • →पात्र-चार्ट बोर्ड पर बनाएँ: सिन्धुल, भोज, मुञ्ज, बुद्धिसागर, ज्योतिषी, वत्सराज, कापालिक — प्रत्येक की भूमिका एक वाक्य में।
    • →मुख्य श्लोक का अन्वय कराएँ और तीन युगों के राजाओं (मान्धाता, राम, युधिष्ठिर) को समय-रेखा पर दिखाएँ।
    • →'त्वया यास्यति' का व्यंग्य समझाने के लिए छात्रों से पूछें — यदि किसी के साथ नहीं गई तो मुञ्ज के साथ कैसे जाएगी?
    • →पाठ से सभी ल्यप्/क्त्वा रूप छाँटने की प्रतियोगिता कराएँ; उपसर्ग के नियम को स्वयं खोजने दें।
    • →अभ्यास के 'उचितार्थ मेलन' को फ़्लैशकार्ड खेल में बदलें (निशीथे-रात्रौ, विपिने-वने, अधीत्य-पठित्वा)।
    • →नैतिक चर्चा: राजाज्ञा बनाम अन्तरात्मा — वत्सराज ने क्या सही किया? संस्कृत में दो वाक्य लिखवाएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. एकपद/पूर्णवाक्य प्रश्न: कौन, किसे, कहाँ (सिन्धुल, मुञ्ज, वत्सराज, भुवनेश्वरी-विपिन) — तथ्य-सटीकता जाँचें।
    2. 'मान्धाता च महीपतिः' श्लोक का अन्वय, हिन्दी अर्थ और व्यंग्यार्थ लिखवाएँ।
    3. दस पदों में प्रकृति-प्रत्यय विभाग तथा प्रकृति + प्रत्यय से पद-निर्माण (नम् + क्त्वा = नत्वा आदि)।
    4. लकार-पुरुष-वचन तथा शब्द-लिङ्ग-विभक्ति परिचय वाली तालिका पूर्ण कराएँ।
    5. रेखाङ्कित पदों पर प्रश्न-निर्माण और मञ्जूषा के अव्ययों से अनुच्छेद पूर्ति।

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