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कार्याकार्यव्यवस्थितिः – Class 12 Sanskrit Chapter 9 Notes & NCERT PDF

Class 12SanskritChapter 9NCERT book: भास्वती भाग 2 (Bhaswati) - Sanskrit Class 12

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पाठ 9: कार्याकार्यव्यवस्थितिः

परिचय

नवमः पाठः — कार्याकार्यव्यवस्थितिः (करने योग्य और न करने योग्य कर्मों की व्यवस्था) श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय (दैवासुरसम्पद्विभागयोग) से संकलित है। पाठ-प्रवेश के अनुसार मोहग्रस्त अर्जुन से कहे गए ये वचन देश-काल से परे हैं, अर्थात् सार्वजनीन, सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं। अतः आज भी हम सबके लिए उतने ही ग्राह्य हैं जितने उस समय अर्जुन के लिए थे। इन श्लोकों में दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद् का भेद दिखाया गया है। स्वस्थ, संयमित जीवन और मृत्यु के पश्चात् सद्गति के लिए कार्य-अकार्य का विवेचन भी किया गया है।

शिक्षक-टिप्पणी: पाठ के 16 श्लोक गीता 16.1–5, 16.7, 16.9 और 16.13–21 हैं; बीच के कुछ श्लोक छोड़े गए हैं। नीचे श्लोक गीता के मानक पाठ में दिए गए हैं।

पाठ का सार

1. दैवी सम्पद् (श्लोक 1–3): श्रीभगवान् कहते हैं कि दैवी सम्पद् लेकर जन्मे व्यक्ति में ये गुण होते हैं: अभय, सत्त्वसंशुद्धि (अन्तःकरण की निर्मलता), ज्ञानयोग में स्थिति, दान, दम (इन्द्रिय-संयम), यज्ञ, स्वाध्याय, तप, आर्जव (सरलता), अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, अपैशुन (चुगली न करना), प्राणियों पर दया, अलोलुपता, मार्दव (कोमलता), ह्री (लोक-लज्जा), अचापल, तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और नातिमानिता (अत्यधिक मान न चाहना)।

2. आसुरी सम्पद् (श्लोक 4): दम्भ (पाखण्ड), दर्प (घमण्ड), अभिमान, क्रोध, पारुष्य (कठोर वाणी) और अज्ञान — ये आसुरी सम्पद् लेकर जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं।

3. फल (श्लोक 5): दैवी सम्पद् मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पद् बन्धन के लिए मानी गई है। भगवान् अर्जुन को आश्वस्त करते हैं — "मा शुचः", अर्थात् शोक मत करो, हे पाण्डव! तुम दैवी सम्पद् लेकर जन्मे हो।

4. आसुरी स्वभाव वालों का चित्र (श्लोक 6–12): आसुरी लोग प्रवृत्ति (करने योग्य) और निवृत्ति (न करने योग्य) को नहीं जानते; उनमें न शौच होता है, न आचार, न सत्य। ऐसी दृष्टि अपनाकर नष्ट-आत्मा, अल्पबुद्धि और उग्रकर्मा लोग जगत् के विनाश के लिए उत्पन्न होते हैं। उनका अहंकारी चिन्तन होता है: "आज मैंने यह पाया, कल वह मनोरथ पाऊँगा; यह धन मेरा है, वह भी मेरा होगा; इस शत्रु को मैंने मारा, दूसरों को भी मारूँगा; मैं ईश्वर हूँ, भोगी हूँ, सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ; मैं धनवान् और कुलीन हूँ, मेरे समान कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द करूँगा।" अज्ञान से मोहित, अनेक चित्तों में भ्रमित, मोह-जाल में घिरे और कामभोगों में आसक्त ऐसे लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं। स्वयं को ही पूज्य मानने वाले, अकड़े हुए, धन-मान के मद में डूबे लोग दम्भपूर्वक, शास्त्रविधि के बिना, नाममात्र के यज्ञ करते हैं।

5. परिणाम (श्लोक 13–15): अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध का आश्रय लेकर ये अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित परमात्मा से द्वेष करते हैं। ऐसे द्वेषी, क्रूर, अधम और अशुभ मनुष्यों को भगवान् बार-बार आसुरी योनियों में डालते हैं। वे मूढ़ जन्म-जन्म में भगवान् को न पाकर और भी अधम गति को जाते हैं।

6. निष्कर्ष (श्लोक 16): काम, क्रोध और लोभ — ये नरक के तीन द्वार हैं और आत्मा का नाश करने वाले हैं; इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

प्रमुख श्लोक और अर्थ

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥1॥

अर्थ: निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता (दैवी सम्पद् के लक्षण हैं)।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥5॥

अर्थ: दैवी सम्पद् मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पद् बन्धन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव! शोक मत करो, तुम दैवी सम्पद् लेकर जन्मे हो।

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥9॥

अन्वय: मया असौ शत्रुः हतः, अपरान् अपि च हनिष्ये, अहम् ईश्वरः, अहं भोगी, अहं सिद्धः बलवान् सुखी (च अस्मि)।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥16॥

अर्थ: काम, क्रोध और लोभ — ये तीन प्रकार के नरक-द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

व्याकरण बिंदु

सन्धि: दमश्च = दमः + च; ह्रीरचापलम् = ह्रीः + अचापलम्; दर्पोऽभिमानश्च = दर्पः + अभिमानः + च; निबन्धायासुरी = निबन्धाय + आसुरी; चापरानपि = च + अपरान् + अपि; आढ्योऽभिजनवानस्मि = आढ्यः + अभिजनवान् + अस्मि; क्षिपाम्यजस्रम् = क्षिपामि + अजस्रम्; तस्मादेतत्त्रयम् = तस्मात् + एतत् + त्रयम्।

समास: सत्त्वसंशुद्धिः = सत्त्वस्य संशुद्धिः (षष्ठी तत्पुरुष); अज्ञानम् = न ज्ञानम् (नञ् तत्पुरुष); उग्रकर्माणः = उग्राणि कर्माणि येषां ते (बहुव्रीहि); मनोरथम् = मनसः रथः (षष्ठी तत्पुरुष); नराधमान् = नरेषु अधमाः (सप्तमी तत्पुरुष); अल्पबुद्धयः = अल्पा बुद्धिः येषां ते (बहुव्रीहि)।

प्रकृति-प्रत्यय: प्रवृत्तिः = प्र + वृत् + क्तिन्; अवष्टभ्य = अव + स्तम्भ् + ल्यप्; अलोलुपत्वम् = अलोलुप + त्व; प्रद्विषन्तः = प्र + द्विष् + शतृ; विमोहिताः = वि + मुह् + णिच् + क्त; प्रसक्ताः = प्र + सञ्ज् + क्त।

वाच्य-परिवर्तन: इदमद्य मया लब्धम् → इदमद्य अहं लब्धवान्/लब्धवती; असौ मया हतः → अहम् अमुं हतवान्; अहं तान् आसुरीषु योनिषु क्षिपामि → मया ते आसुरीषु योनिषु क्षिप्यन्ते।

शब्दार्थ

सत्त्वसंशुद्धिः – अन्तःकरण की निर्मलता; दमः – इन्द्रिय-संयम; आर्जवम् – सरलता; अपैशुनम् – चुगली का अभाव; अलोलुपत्वम् – विषय मिलने पर भी इन्द्रियों में विकार न होना; मार्दवम् – कोमलता; ह्रीः – अकार्य से रोकने वाली लोक-लज्जा; अचापलम् – व्यर्थ चेष्टा का अभाव; धृतिः – धैर्य; शौचम् – आन्तरिक-बाह्य शुद्धि; नातिमानिता – पूज्यों के प्रति नम्रता; दम्भः – पाखण्ड; पारुष्यम् – कठोर वाणी; निबन्धाय – संसार-बन्धन के लिए; स्तब्धाः – नम्रता-रहित; अभ्यसूयकाः – दोष देखने वाले; अजस्रम् – निरन्तर।

बोर्ड परीक्षा फोकस

  • मनुष्यः किं त्यजेत्? — उत्तर-रूपरेखा: कामः, क्रोधः, लोभः च इति त्रिविधं नरकस्य द्वारम् आत्मनः नाशनं च अस्ति; अतः मनुष्यः एतत् त्रयं त्यजेत्।
  • अज्ञानविमोहिताः जनाः किं विचारयन्ति? — "इदम् अद्य मया लब्धम्, इमं मनोरथं प्राप्स्ये… आढ्यः अभिजनवान् अस्मि, कः अन्यः मया सदृशः अस्ति? यक्ष्ये, दास्यामि, मोदिष्ये" इति।
  • आम्/न (सत्य-असत्य): नरकस्य द्वारं पञ्चविधम् — न (त्रिविधम्); आसुराः दम्भेनाविधिपूर्वकं यजन्ते — आम्; तेजः क्षमा धृतिः आसुरीसम्पदः अङ्गानि — न (दैवी); दम्भः दर्पः अभिमानः दैवीसम्पदः अङ्गानि — न (आसुरी)।
  • एकपद: दैवी सम्पद् विमोक्षाय मता; कामभोगेषु प्रसक्ताः नरके पतन्ति; ईश्वरः नराधमान् आसुरीषु योनिषु क्षिपति; त्रिविधं नरकस्य द्वारम्।

    सामान्य भूलें

  • दैवी और आसुरी गुणों को मिला देना — तेज, क्षमा, धृति दैवी हैं; दम्भ, दर्प, अभिमान, पारुष्य आसुरी हैं।
  • नरक के द्वार में "मोह" या "मद" लिख देना — पाठ में केवल काम, क्रोध, लोभ हैं।
  • "निबन्धाय" का अर्थ "निबन्ध लिखने के लिए" लेना — अर्थ है संसार-बन्धन के लिए।
  • "ह्रीः" को ह्रस्व-दीर्घ में गलत लिखना और उसका अर्थ भूलना — ह्री = लज्जा।
  • "आढ्यः" (धनवान्) को "आद्यः" (प्रथम) समझना — शब्दार्थ में अर्थ धनवान और कुलीन है।
  • श्लोकों को अर्जुन का वचन मानना — ये श्रीभगवान् (श्रीकृष्ण) के वचन हैं।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पाठ गीता के 16वें अध्याय (दैवासुरसम्पद्विभागयोग) से है; इसके उपदेश सार्वजनीन, सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं।
    • ✓दैवी सम्पद् (अभय, सत्त्वसंशुद्धि, दान, दम, अहिंसा, सत्य, क्षमा, धृति आदि) मोक्ष देती है; आसुरी सम्पद् (दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, पारुष्य, अज्ञान) बन्धन।
    • ✓आसुरी व्यक्ति प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं जानता; वह अहंकार से 'मैं ईश्वर हूँ, मेरे समान कौन है' सोचता है और दम्भपूर्वक नाममात्र के यज्ञ करता है।
    • ✓ऐसे द्वेषी और क्रूर लोग बार-बार आसुरी योनियों में गिरकर अधम गति पाते हैं।
    • ✓काम, क्रोध, लोभ नरक के तीन द्वार हैं, अतः 'तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्'।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →बोर्ड पर दो स्तम्भ बनाएँ — दैवी सम्पद् और आसुरी सम्पद् — और श्लोक 1–4 से गुण छाँटकर भरवाएँ।
    • →प्रत्येक दैवी गुण का आज के विद्यार्थी-जीवन से एक उदाहरण पूछें (जैसे अपैशुन = किसी की चुगली न करना)।
    • →श्लोक 8–10 के 'मैं-मैं' वाले कथनों का अभिनय कराकर अहंकार की मनोवृत्ति समझाएँ।
    • →अनुष्टुप् छन्द में सस्वर पाठ कराएँ; श्लोक 1, 5 और 16 कण्ठस्थ करवाएँ।
    • →अन्वय-पूर्ति और भावार्थ-पूर्ति के अभ्यास को जोड़ी में हल करवाएँ।
    • →वाच्य-परिवर्तन (कर्मवाच्य ↔ कर्तृवाच्य) पर पाँच वाक्यों का अभ्यास कराएँ।
    • →योग्यताविस्तार के सुभाषित (षड्दोषाः, अष्टौ गुणाः) से तुलनात्मक चर्चा करें।

    📋 Assessment Questions

    1. एकपद/पूर्णवाक्य प्रश्न: दैवी सम्पद् कस्मै मता? जगतः क्षयाय के प्रभवन्ति? मनुष्यः किं त्यजेत्?
    2. आम्/न (सत्य-असत्य) कथन — दैवी और आसुरी गुणों का भेद जाँचें।
    3. श्लोक 5 और 9 की अन्वय-पूर्ति तथा श्लोक 8 और 16 की भावार्थ-पूर्ति।
    4. समास-विग्रह (अज्ञानम्, उग्रकर्माणः, मनोरथम्, नराधमान्, त्रिविधम्) और प्रकृति-प्रत्यय।
    5. वाच्य-परिवर्तन के पाँच वाक्य।

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