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ऋतुचर्या – Class 11 Sanskrit Chapter 3 Notes & NCERT PDF

Class 11SanskritChapter 3NCERT book: भास्वती भाग 1 (Bhaswati) - Sanskrit Class 11

Notes and a simple summary of Chapter 3 of the NCERT Class 11 Sanskrit book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

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पाठ 3: ऋतुचर्या (चरकसंहिता — छह ऋतुओं में आहार-विहार)

पाठ-परिचय

ऋतुचर्या (ऋतुओं के अनुसार आहार-विहार) पाठ महर्षि अग्निवेश द्वारा मूल रूप में लिखित तथा महर्षि चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत आयुर्वेद-ग्रन्थ चरकसंहिता (सूत्रस्थान, छठा अध्याय) से संकलित है। इसमें हेमन्त, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शरद् — छह ऋतुओं में मनुष्य का भोजन और दिनचर्या कैसी हो, इसका विवेचन है। दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन करके व्यक्ति दीर्घायु और स्वस्थ जीवन पा सकता है।

पाठ-सार (ऋतु-अनुसार)

हेमन्त (श्लोक 1–2)

गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम्।
हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चायुर्न हीयते॥

हेमन्त में गोरस (दूध-दही-छाछ), गन्ने के विकार (गुड़ आदि), वसा (घी/चर्बी), तेल, नया चावल और गरम पानी का सेवन करने वाले की आयु क्षीण नहीं होती। हिम-ऋतु में वातकारक और हल्के अन्न-पान, तेज़ हवा, कम आहार और उदमन्थ (जौ के सत्तू का पेय) छोड़ देने चाहिए।

शिशिर (श्लोक 3–5)

  • हेमन्त और शिशिर समान हैं; शिशिर में थोड़ा अन्तर है — आदान-काल से उत्पन्न रूखापन तथा बादल, हवा और वर्षा से उत्पन्न ठण्ड।
  • इसलिए हेमन्त की सारी विधि शिशिर में भी अपनाई जाए; वायुरहित और अधिक गरम घर में रहना चाहिए।
  • कटु, तिक्त, कषाय रस वाले, वातकारक, हल्के और शीतल अन्न-पान छोड़ दें।
  • वसन्त (श्लोक 6–7)

    वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः।
    कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्॥

    शीत में जमा हुआ कफ वसन्त में सूर्य की किरणों से पिघलकर जठराग्नि को मन्द करता है और अनेक रोग उत्पन्न करता है। इसलिए वसन्त में वमन आदि शोधन-कर्म कराने चाहिए और गुरु (भारी), अम्ल, स्निग्ध, मधुर भोजन तथा दिन में सोना छोड़ना चाहिए।

    ग्रीष्म (श्लोक 8–9)

    मयूखैर्जगतः स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः।
    स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्॥

    ग्रीष्म में सूर्य अपनी किरणों से संसार की स्निग्धता (नमी) को बार-बार पीता रहता है, अतः मधुर, शीतल, तरल और स्निग्ध अन्न-पान हितकर है। घी, दूध और शालि-चावल खाने वाला ग्रीष्म में कष्ट नहीं पाता। लवण, अम्ल, कटु, उष्ण पदार्थ और व्यायाम छोड़ देने चाहिए।

    वर्षा (श्लोक 10–11)

  • भूमि की भाप, बादलों के बरसने और जल के अम्ल-पाक से जठराग्नि क्षीण होती है और वात आदि दोष कुपित होते हैं।
  • हवा-वर्षा से व्याकुल दिन में और विशेष ठण्ड में स्पष्ट अम्ल, लवण और स्नेह (चिकनाई) युक्त भोजन करना चाहिए — वात की शान्ति के लिए।
  • शरद् (श्लोक 12–14)

  • वर्षा की ठण्ड के अभ्यस्त अङ्ग अचानक सूर्य की किरणों से तपते हैं, तो वर्षा में संचित पित्त शरद् में प्रायः कुपित हो जाता है।
  • तब मधुर, हल्का, शीतल और तिक्त-युक्त अन्न-पान, पित्त को शान्त करने वाला, उचित मात्रा में सेवन करना चाहिए।
  • शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च।
    शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः॥

    शरद् ऋतु में शरद् के फूलों की मालाएँ, स्वच्छ वस्त्र और रात्रि के आरम्भ में चन्द्रमा की किरणें प्रशंसनीय (हितकर) हैं।

    शब्दार्थ

  • गोरसान् — गाय का दूध, दही, छाछ
  • इक्षुविकृतीः — गन्ने से बने पदार्थ (गुड़, शक्कर)
  • नवौदनम् — नया चावल
  • वातलानि — वात बढ़ाने वाले
  • प्रवातम् — तेज़/ताज़ी हवा
  • उदमन्थम् — जौ के सत्तू से बना पेय
  • रौक्ष्यम् — रूखापन
  • निवातम् — वायुरहित
  • निचितः — जमा हुआ
  • श्लेष्मा — कफ
  • कायाग्निम् — जठराग्नि
  • मयूखैः — किरणों से
  • पेपीयते — बार-बार पीता है (पा + यङ्, लट्)
  • सशाल्यन्नम् — शालि-चावल सहित अन्न
  • प्रदोषे — रात्रि के आरम्भ में
  • इन्दुरश्मयः — चन्द्रमा की किरणें
  • व्याकरण-बिन्दु

    समास

  • अन्नानि च पानानि च = अन्नपानानि (द्वन्द्व)
  • हेमन्तः च शिशिरः च = हेमन्तशिशिरौ (द्वन्द्व)
  • हिमस्य आगमे = हिमागमे (षष्ठी तत्पुरुष)
  • कायस्य अग्निम् = कायाग्निम् (षष्ठी तत्पुरुष)
  • अर्कस्य रश्मिभिः = अर्करश्मिभिः (षष्ठी तत्पुरुष)
  • नवम् ओदनम् = नवौदनम् (कर्मधारय)
  • वमनम् आदिः येषां तानि = वमनादीनि (बहुव्रीहि)
  • प्रत्यय

  • हैमन्तिकः — हेमन्त + ठक्
  • स्निग्धम् — स्निह् + क्त
  • भोक्तव्यम् — भुज् + तव्यत्
  • सेव्यम् — सेव् + यत्
  • शारदम् — शरद् + अण्
  • रौक्ष्यम् — रूक्ष + ष्यञ्
  • सन्धि

  • नवौदनम् = नव + ओदनम् (वृद्धि)
  • चायुर्न = च + आयुः + न
  • शिशिरेऽल्पम् = शिशिरे + अल्पम्
  • विधिरिष्यते = विधिः + इष्यते
  • भाभिरीरितः = भाभिः + ईरितः
  • चेन्दुरश्मयः = च + इन्दुरश्मयः
  • परीक्षा हेतु

  • ऋतुएँ कितनी? — षड् ऋतवः: हेमन्तः, शिशिरः, वसन्तः, ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्।
  • प्रश्न-संकेत: शिशिर में कटु-तिक्त-कषाय, वातल, लघु और शीतल अन्न-पान वर्जित; वसन्त में कायाग्नि को कफ बाधित करता है; ग्रीष्म में स्वादु, शीत, द्रव, स्निग्ध हितकर; वर्षा में पवनादि कुपित होते हैं; शरद् में पित्तप्रशमन हेतु मधुर-लघु-शीत-सतिक्त अन्न।
  • व्यायाम कब छोड़ें? — ग्रीष्म में।
  • इन्दुरश्मयः कब प्रशस्त? — शरत्काल में, प्रदोष (रात्रि आरम्भ) में।
  • हर ऋतु में क्या करें/क्या न करें — तालिका के स्थान पर ऊपर के क्रम से सूची लिखें।
  • सामान्य भूलें

  • ऋतुओं का क्रम गलत लिखना — पाठ हेमन्त से आरम्भ होता है।
  • वसन्त में 'कफ' के स्थान पर 'पित्त' लिख देना; शरद् में पित्त कुपित होता है, वसन्त में कफ (श्लेष्मा)।
  • 'पेपीयते' को सामान्य 'पीता है' समझना — यङ् प्रत्यय से बार-बार/अधिक पीना अर्थ है।
  • ग्रीष्म में व्यायाम वर्जित है — इसे भूल जाना।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पाठ अग्निवेश-रचित, चरक-प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता से है और छह ऋतुओं की भोजनचर्या बताता है।
    • ✓हेमन्त-शिशिर में गोरस, गुड़, वसा, तेल, नया चावल और गरम जल हितकर; वातल-लघु-शीत अन्न वर्जित।
    • ✓वसन्त में संचित कफ जठराग्नि को बाधित करता है — वमन आदि कर्म और भारी-मधुर भोजन व दिवास्वप्न का त्याग।
    • ✓ग्रीष्म में स्वादु-शीत-द्रव-स्निग्ध भोजन, घी-दूध-शालि; व्यायाम व लवण-अम्ल-कटु-उष्ण त्याज्य।
    • ✓वर्षा में वात-शान्ति हेतु अम्ल-लवण-स्नेहयुक्त भोजन; शरद् में पित्त-प्रशमन हेतु मधुर-लघु-शीत-तिक्त अन्न।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →छह ऋतुओं का कैलेण्डर-चार्ट बनवाएँ और हर ऋतु के साथ 'सेवनीय' और 'वर्जनीय' सूची लिखवाएँ।
    • →कफ-पित्त-वात की सरल अवधारणा बताकर दिखाएँ कि कौन-सा दोष किस ऋतु में कुपित होता है।
    • →छात्रों से अपने घर की ऋतु-अनुसार भोजन-परम्पराएँ (गर्मी में छाछ, सर्दी में गुड़) पूछें और पाठ से मिलाएँ।
    • →समास-विग्रह व प्रत्यय (ठक्, तव्यत्, यत्, अण्) के उदाहरण बोर्ड पर पाठ के शब्दों से ही दें।
    • →श्लोक 8 'मयूखैर्जगतः स्नेहं…' का सस्वर पाठ कराकर 'पेपीयते' के यङ् अर्थ पर ध्यान दिलाएँ।
    • →योग्यताविस्तार के गीता-श्लोक 'युक्ताहारविहारस्य…' पर चर्चा करके संतुलित आहार का महत्त्व समझाएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. ऋतुएँ कितनी हैं? उनके नाम संस्कृत में लिखिए।
    2. ग्रीष्म ऋतु में कैसा अन्न-पान हितकर है और क्या त्याज्य है?
    3. वसन्त में कफ क्या हानि करता है और उसके लिए क्या उपाय बताया गया है?
    4. शरद् ऋतु में क्या-क्या प्रशस्त माना गया है?
    5. हैमन्तिकः, भोक्तव्यम्, सेव्यम् — प्रकृति-प्रत्यय लिखिए।

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