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वीरः सर्वदमनः – Class 11 Sanskrit Chapter 4 Notes & NCERT PDF

Class 11SanskritChapter 4NCERT book: भास्वती भाग 1 (Bhaswati) - Sanskrit Class 11

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पाठ 4: वीरः सर्वदमनः (अभिज्ञानशाकुन्तलम् से — वीर बालक सर्वदमन)

पाठ-परिचय

वीरः सर्वदमनः पाठ कविकुलगुरु महाकवि कालिदास की जगत्प्रसिद्ध कृति "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" नाटक के सप्तम अङ्क से लिया गया है। नाटक की मूल कथा महाभारत के शकुन्तलोपाख्यान से ली गई है।

कथा-सूत्र: राजा दुष्यन्त शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करते हैं, पर दुर्वासा ऋषि के शाप से उसे भूल जाते हैं। ठुकराई गई शकुन्तला अपने पुत्र सर्वदमन के साथ महर्षि मरीचि के आश्रम में रहती है। देवासुर-संग्राम में विजय पाकर लौटते हुए दुष्यन्त विश्राम हेतु मरीचि के आश्रम में आते हैं और वहीं उन्हें पुत्र और शकुन्तला की प्राप्ति होती है। रक्त का सम्बन्ध दुष्यन्त और सर्वदमन को मिलाता है। इस अंश में बालक सर्वदमन का शौर्यपूर्ण बचपन चित्रित है।

पाठ-सार

शुभ शकुन (श्लोक 1)

दुष्यन्त की दाहिनी भुजा फड़कती है (शुभ-सूचक निमित्त)। वे कहते हैं —

मनोरथाय नाशंसे किं बाहो स्पन्दसे वृथा।
पूर्वावधीरितं श्रेयो दुःखाय परिवर्तते॥

हे बाहु! मैं अब किसी मनोरथ की आशा नहीं करता, तुम व्यर्थ क्यों फड़कती हो? पहले ठुकराया गया कल्याण (शकुन्तला) अब दुःख में बदल गया है।

सिंह-शावक से खेलता बालक (श्लोक 2)

नेपथ्य से तापसी की आवाज़ आती है — "चञ्चलता मत करो!" दुष्यन्त सोचते हैं कि यह स्थान तो अविनय का नहीं है; देखते हैं कि दो तपस्विनियों द्वारा रोका जाता हुआ एक अबालसत्त्व (जिसका पराक्रम बच्चों जैसा न होकर बड़ों जैसा है) बालक —

अर्धपीतस्तनं मातुरामर्दक्लिष्टकेसरम्।
प्रक्रीडितुं सिंहशिशुं बलात्कारेण कर्षति॥

— माँ का आधा दूध पिए हुए, खींचतान से अस्त-व्यस्त अयालों वाले सिंह-शावक को खेलने के लिए ज़बरदस्ती खींच रहा है।

बालक का साहस

बालक सिंह-शिशु से कहता है — "जृम्भस्व सिंह! दन्तांस्ते गणयिष्ये" (हे सिंह! मुँह खोलो, मैं तुम्हारे दाँत गिनूँगा)। तापसी डाँटती है कि वह आश्रम के संतान-तुल्य प्राणियों को क्यों सताता है; ऋषियों ने ठीक ही इसका नाम 'सर्वदमन' (सबका दमन करने वाला) रखा है। दुष्यन्त के मन में उस बालक के प्रति अपने पुत्र जैसा स्नेह उमड़ता है — वे सोचते हैं, शायद निःसन्तान होना ही उन्हें वत्सल बना रहा है।

तापसी डराती है कि सिंहनी उस पर झपटेगी; बालक मुस्कुराकर कहता है — "अरे, मैं तो बहुत डर गया!" और होंठ बिचकाता है। दूसरी तापसी खिलौना देने का वादा करती है; बालक हाथ फैलाकर माँगता है — "कहाँ है, दो!" पहली तापसी उसे अपनी कुटिया से मिट्टी का मोर (मृत्तिकामयूर) लाने भेजती है।

स्पर्श का सुख (श्लोक 3)

तापसी दुष्यन्त से बालक को छुड़ाने को कहती है। बालक को छूते ही दुष्यन्त सोचते हैं —

अनेन कस्यापि कुलाङ्कुरेण स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममैवम्।
कां निर्वृतिं चेतसि तस्य कुर्याद् यस्यायमङ्कात् कृतिनः प्ररूढः॥

किसी के भी कुल के इस अंकुर के स्पर्श से मेरे अंगों में ऐसा सुख है, तो जिस भाग्यशाली की गोद से यह उत्पन्न हुआ है, उसके मन में यह कितना आनन्द देता होगा!

पहचान के संकेत

  • दुष्यन्त पूछते हैं — "इसका वंश?" तापसी — "पुरुवंशः"। दुष्यन्त मन में — "क्या यह मेरे ही वंश का है?"
  • तापसी मिट्टी का मोर लाकर कहती है — "शकुन्तलावण्यं प्रेक्षस्व" (पक्षी की सुन्दरता देखो)। बालक 'शकुन्त' सुनकर पूछता है — "कहाँ है मेरी माँ?" दुष्यन्त सोचते हैं — क्या इसकी माँ का नाम शकुन्तला है?
  • बालक कहता है — "मुझे यह मोर अच्छा लगता है" और खिलौना ले लेता है।
  • शब्दार्थ

  • नाशंसे — आशा नहीं करता
  • स्पन्दसे — फड़कती हो
  • पूर्वावधीरितम् — पहले त्यागा हुआ
  • अबालसत्त्वः — बड़ों जैसे पराक्रम वाला
  • आमर्दक्लिष्टकेसरम् — खींचतान से अस्त-व्यस्त अयाल वाला
  • जृम्भस्व — जम्हाई लो / मुँह खोलो
  • अपत्यनिर्विशेषाणि — सन्तान के समान
  • संरम्भः — हठ, क्रोध
  • औरसः — अपना (आत्मीय) पुत्र
  • अनपत्यता — निःसन्तानता
  • वत्सलयति — स्नेहयुक्त बनाती है
  • क्रीडनकम् — खिलौना
  • उटजे — कुटिया में
  • कुलाङ्कुरेण — कुल के अंकुर (वंशज) द्वारा
  • निर्वृतिम् — आनन्द
  • व्यपदेशः — वंश, परिचय
  • एकान्वयः — एक ही वंश वाला
  • व्याकरण-बिन्दु

    समास

  • पूर्वावधीरितम् — पूर्वम् अवधीरितम् (कर्मधारय)
  • अबालसत्त्वः — न बालसत्त्वः (नञ्; मूल बालसत्त्व बहुव्रीहि)
  • अनपत्यता — अविद्यमानम् अपत्यं यस्य सः अनपत्यः, तस्य भावः (बहुव्रीहि + तल्)
  • आकारसदृशम् — आकारेण सदृशम् (तृतीया तत्पुरुष)
  • एकान्वयः — एक एव अन्वयः यस्य सः (बहुव्रीहि)
  • शकुन्तलावण्यम् — शकुन्तस्य लावण्यम् (षष्ठी तत्पुरुष)
  • मृत्तिकामयूरः — मृत्तिकायाः मयूरः
  • प्रत्यय

  • प्रकृतिम् — प्र + कृ + क्तिन्
  • अनुबध्यमानः — अनु + बन्ध् + कर्मवाच्य + शानच्
  • कृतिनः — कृत + इनि (षष्ठी ए० व०)
  • प्ररूढः — प्र + रुह् + क्त
  • सूचयित्वा — सूच् + णिच् + क्त्वा; अवलोक्य — अव + लोक् + ल्यप्
  • सन्धि

  • गत एवात्मनः = गतः + एव + आत्मनः
  • दन्तांस्ते = दन्तान् + ते
  • शकुन्तलेत्यस्य = शकुन्तला + इति + अस्य
  • भीतोऽस्मि = भीतः + अस्मि
  • ममाम्बा = मम + अम्बा
  • नाट्य-पारिभाषिक शब्द (योग्यताविस्तार)

  • अङ्क — नाटक का वह भाग जिसमें कथा का एक अंश पूर्ण होता है; संस्कृत नाटकों में 5 से 10 अङ्क होते हैं।
  • नेपथ्य — वह स्थान जहाँ अभिनेता वेश धारण करते हैं; वहीं से बोले गए संवाद।
  • आत्मगतम्/स्वगतम् — मन ही मन कहा गया, जिसे अन्य पात्र न सुनें।
  • परीक्षा हेतु

  • पाठ का स्रोत: कालिदासस्य अभिज्ञानशाकुन्तलस्य सप्तमाङ्कात्।
  • बालक किसे खींच रहा था? — अर्धपीतस्तनं, आमर्दक्लिष्टकेसरं सिंहशिशुम्।
  • तापसी ने क्या दिया? — मृत्तिकामयूरम् (मिट्टी का मोर)।
  • माता का नाम: शकुन्तला। बालक को क्या रुचता है? — मयूरः।
  • श्लोक 1 और 3 की सप्रसङ्ग व्याख्या तथा 'किं न खलु बालेऽस्मिन्…' का आशय।
  • सामान्य भूलें

  • यह लिखना कि दुष्यन्त शकुन्तला को जानबूझकर भूले — भूलने का कारण दुर्वासा का शाप है।
  • आश्रम को कण्व का मानना — यह मरीचि ऋषि का आश्रम है।
  • 'शकुन्तलावण्यम्' को 'शकुन्तला + वण्यम्' समझना — यह शकुन्त (पक्षी) + लावण्यम् है; इसी शब्द-भ्रम से बालक माँ को पुकारता है।
  • 'अबालसत्त्वः' का अर्थ 'कमज़ोर बालक' लेना — अर्थ है बड़ों जैसा पराक्रमी।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पाठ कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सप्तम अङ्क से है; मूल कथा महाभारत के शकुन्तलोपाख्यान से।
    • ✓मरीचि के आश्रम में बालक सर्वदमन सिंह-शावक को खींचकर उसके दाँत गिनना चाहता है — उसका शौर्य दिखता है।
    • ✓बालक को देखकर दुष्यन्त के मन में औरस पुत्र जैसा स्नेह जगता है और स्पर्श से अपार सुख मिलता है।
    • ✓'पुरुवंश' और 'शकुन्त-लावण्य' (शकुन्तला) के संकेतों से दुष्यन्त को पुत्र-पहचान की आशा होती है।
    • ✓नाट्य-शब्द अङ्क, नेपथ्य, आत्मगत तथा बहुव्रीहि-तत्पुरुष समास व शानच्-क्त प्रत्यय पाठ के मुख्य बिन्दु हैं।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पाठ को लघु नाटक के रूप में मंचित कराएँ — दुष्यन्त, बालक, दो तापसियाँ — ताकि 'आत्मगतम्' व 'नेपथ्ये' की अवधारणा स्पष्ट हो।
    • →नाटक की पूरी कथा (गान्धर्व विवाह, दुर्वासा-शाप, अँगूठी) संक्षेप में सुनाकर सातवें अङ्क का प्रसङ्ग बनाएँ।
    • →'शकुन्तलावण्यम्' के श्लेष-जैसे शब्द-भ्रम पर चर्चा करें — भाषा से कथा कैसे आगे बढ़ती है।
    • →सन्धि-विच्छेद अभ्यास के 16 पदों को समूहों में बाँटकर प्रतियोगिता कराएँ।
    • →श्लोक 3 'अनेन कस्यापि कुलाङ्कुरेण…' पर पिता-पुत्र के स्नेह और रक्त-सम्बन्ध की भावना पर चर्चा करें।
    • →महाभारत के भरत (सर्वदमन) और 'भारत' नाम के सम्बन्ध का उल्लेख कर राष्ट्र-नाम से जोड़ें।

    📋 Assessment Questions

    1. यह पाठ किस कवि के किस ग्रन्थ से लिया गया है?
    2. बालक कैसे सिंह-शिशु को खींच रहा था? श्लोक लिखिए।
    3. तापसी ने बालक को खेलने के लिए क्या दिया?
    4. दुष्यन्त को बालक के वंश और माता के बारे में कौन-से संकेत मिले?
    5. अबालसत्त्वः, अनपत्यता, एकान्वयः — विग्रह करके समास का नाम लिखिए।

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