वस्त्रविक्रयः – Class 11 Sanskrit Chapter 8 Notes & NCERT PDF
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पाठ 8: वस्त्रविक्रयः (वस्त्रों की बिक्री)
पाठ-परिचय
वस्त्रविक्रयः पाठ महामहोपाध्याय पं. मथुराप्रसाद दीक्षित द्वारा रचित नाटक "भारतविजयनाटकम्" के प्रथम अङ्क से संकलित है। यह एक नाट्यांश (संवाद) है। पाठ की पृष्ठभूमि पाठ-परिचय में इस प्रकार दी गई है — आग से जली हुई शाहजहाँ की पुत्री की औषधि-चिकित्सा करने के बाद एक विदेशी (अंग्रेज़) भारत-सम्राट् (शाहजहाँ) से बंगाल में रहने के लिए भूमि तथा वस्त्रों के क्रय-विक्रय के लिए राजमुद्रा से अंकित प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेता है। इसी प्रमाणपत्र के बल पर वह भारतीय जुलाहों (तन्तुवायों) का शोषण करता है।
पाठ हमें दिखाता है कि कैसे विदेशी व्यापार-सत्ता ने भारत के कुटीर-उद्योग (हथकरघा-वस्त्र) को नष्ट किया — कम मूल्य देकर, डराकर, बेंत से पीटकर।
पात्र
पाठ-सार (दृश्य-क्रम से)
1. उचित मोल-भाव
बाज़ार में तन्तुवाय और दो श्रेष्ठी हैं। श्रेष्ठी पूछता है — "तन्तुवाय! किमस्य पटस्य मूल्यम्?" तन्तुवाय कहता है — "विंशत्यधिकं शतम्" (एक सौ बीस)। श्रेष्ठी कहता है — "नहि नहि, किञ्चिदधिकमेतत्। शतं मूल्यं गृह्णीष्व" (सौ लो)। यह सामान्य, न्यायपूर्ण व्यापार है।
2. गौराङ्ग का प्रवेश और प्रमाणपत्र का आतंक
तभी अनुचर सहित वैदेशिक गौराङ्ग प्रवेश करता है और राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र दिखाकर श्रेष्ठी तथा तन्तुवाय दोनों को डाँटता है — "न त्वं विक्रेतुं प्रभुः" (तू बेचने का अधिकारी नहीं है)। वह कहता है — यह वस्त्र मुझे दो, मैं ही बेचूँगा; लो पचास मुद्राएँ (पञ्चाशन्मुद्राः)।
तन्तुवाय आश्चर्य से कहता है — इससे मेरे कुटुम्ब का भरण-पोषण कैसे होगा? यह वस्त्र मैंने छह महीनों तक दिन-रात (षड्भिर्मासैः … रात्रिन्दिवम्) घूम-घूमकर बनाया है। गौराङ्ग का उत्तर है —
युष्मत्कुटुम्बरक्षायै न प्रतिज्ञा कृता मया।
कथं रक्षा भवेदेतत् त्वं जानीहि व्रजाधुना॥
अर्थ: तुम्हारे परिवार की रक्षा का मैंने कोई वचन नहीं लिया है। रक्षा कैसे होगी, यह तुम जानो, अब जाओ। — तन्तुवाय मुद्राएँ नहीं लेता।
3. दूसरा तन्तुवाय और "न्याय"
दूसरा तन्तुवाय श्रेष्ठी को वस्त्र देना चाहता है, पर श्रेष्ठी भौंहों के इशारे से कहता है — "अयं क्रेष्यति, नाहं क्रेतुं शक्नोमि" — क्योंकि इसके पास राजा का प्रमाणपत्र है, यही खरीदेगा, दूसरा नहीं। गौराङ्ग वस्त्र लेकर चालीस मुद्राएँ देता है। तन्तुवाय पूछता है — "किमयमेव न्यायः?" गौराङ्ग कहता है —
यन्मया निश्चीयते दीयते च तदेव मूल्यम्।
(जो मैं तय करूँ और दूँ, वही मूल्य है।) दोनों तन्तुवाय दिया हुआ मूल्य लेकर कहते हैं — "नातः परं पटं निर्मास्यावः" (इसके बाद हम वस्त्र नहीं बनाएँगे)।
4. गौराङ्ग का षड्यन्त्र
अनुचर से गौराङ्ग कहता है — इन वस्त्रों से बहुत मुद्राएँ कमाऊँगा; इनका सौन्दर्य अनिर्वचनीय है; यह वस्त्र इतना महीन है कि पाँच-छह परतों में लपेटने पर भी शरीर नंगा-सा ही दिखता है (पञ्चषैः पटलैः परिवेष्टितमप्यपटमेव प्रतीयतेऽङ्गम्)। फिर वह सोचता है — इनके सामने हमारे देश के वस्त्र कैसे बिकेंगे? हमारा व्यापार तो नष्ट हो जाएगा। अतः वह निश्चय करता है —
एतत्सूक्ष्मपटस्य निर्मितिविधेरुन्मूलनेऽहं क्षमो
निर्मातॄनिह दण्डताडनपरस्तान् मोचयिष्याम्यतः।
कौशल्यं ह्रियतामधस्तदधिकं वाणिज्यमत्युन्नतं
देशस्यास्य समुन्नतिर्जनकथामात्रे समाधीयताम्॥
भावार्थ: मैं इस महीन वस्त्र की निर्माण-विधि को जड़ से मिटाने में समर्थ हूँ। दण्ड और मार-पीट में लगा रहकर मैं इसके बनाने वालों से यह (कला) छुड़वा दूँगा। (इनका) कौशल नीचे गिरे, (हमारा) व्यापार बहुत ऊँचा उठे और इस देश की उन्नति केवल लोगों की कहानियों में रह जाए।
5. बलपूर्वक शोषण
दौवारिक तीन-चार तन्तुवायों को लाता है। गौराङ्ग कहता है — बने हुए वस्त्र मुझे दो। वे कहते हैं — "न वयमयोग्यमूल्यत्वात् पटं निर्मामः" (अनुचित मूल्य के कारण हम वस्त्र नहीं बनाते)। वह पन्द्रह मुद्राएँ उनके वस्त्र में बलपूर्वक (हठात्) बाँधकर गला पकड़कर निकाल देता है। वे कहते हैं — हम सौ के मूल्य का वस्त्र पन्द्रह मुद्राओं में नहीं बनाएँगे; तब वह उन्हें कोड़े (कशया) से पीटता है। फिर चार और तन्तुवायों से रेशमी वस्त्र (कौशेयपटान्) माँगता है, उन्हें झूठा कहकर कोड़े से मारने की धमकी देता है; वे हाथ जोड़कर काँपते हुए कहते हैं — "न वयं निर्मामः।"
शब्दार्थ
व्याकरण-बिन्दु
सन्धि-विच्छेद (अभ्यास से)
प्रकृति-प्रत्यय
अन्य उपयोगी रूप
योग्यता-विस्तार (पाठ के अनुसार)
पुस्तक बताती है कि अग्नि से जली शाहजहाँ-कुमारी की चिकित्सा गेब्रियल बाउटन ने की (कुछ इतिहासकारों के अनुसार किसी अन्य ने); फिर बंगाल के शाहज़ादा शुजा की पत्नी की चिकित्सा भी उसी ने की; और बाद में सम्राट् फ़र्रुख़सियर को सर्जन विलियम हैमिल्टन द्वारा आरोग्य मिला। इन्हीं उपकारों के बदले अंग्रेज़ों को व्यापारिक सुविधाएँ मिलीं।
परीक्षा हेतु
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓पाठ पं. मथुराप्रसाद दीक्षित के 'भारतविजयनाटकम्' के प्रथम अङ्क से लिया गया नाट्यांश है।
- ✓राजमुद्राङ्कित प्रमाणपत्र के बल पर विदेशी गौराङ्ग ने भारतीय तन्तुवायों से अत्यल्प मूल्य (50, 40, 15 मुद्राएँ) में वस्त्र छीने।
- ✓'यन्मया निश्चीयते दीयते च तदेव मूल्यम्' — यह औपनिवेशिक मनमानी का प्रतीक वाक्य है।
- ✓'एतत्सूक्ष्मपटस्य…' श्लोक में भारतीय वस्त्र-कौशल को नष्ट करने के षड्यन्त्र का स्पष्ट चित्रण है।
- ✓पाठ से सन्धि (यण्, दीर्घ, वृद्धि, विसर्ग) और ल्यप्/तुमुन्/अनीयर् प्रत्यय का अभ्यास होता है।
👨🏫 Teaching Tips
- →कक्षा में पाठ का नाट्य-रूपान्तरण कराएँ — तन्तुवाय, श्रेष्ठी, गौराङ्ग, दौवारिक की भूमिकाएँ बाँटें।
- →मूल्य-परिवर्तन (120 → 100 → 50 → 40 → 15) को श्यामपट पर क्रम से लिखकर शोषण की तीव्रता दिखाएँ।
- →ढाका की मलमल और भारतीय हथकरघा-उद्योग के पतन पर इतिहास से जोड़कर चर्चा करें।
- →'एतत्सूक्ष्मपटस्य' श्लोक का पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ चरणबद्ध कराएँ।
- →अभ्यास के सन्धि-विच्छेद और प्रकृति-प्रत्यय को तालिका के बजाय सूची-रूप में लिखवाएँ।
- →'यूयं निर्मितान् पटान् मह्यं दत्त' जैसे वाक्यों से 'कः कं प्रति कथयति' प्रश्न बनवाएँ।
- →आत्मनिर्भरता और स्वदेशी के वर्तमान सन्दर्भ पर संक्षिप्त संस्कृत-वाक्य लिखवाएँ।
📋 Assessment Questions
- पाठ के ग्रन्थ और रचनाकार का नाम संस्कृत में बताइए।
- गौराङ्ग ने किस आधार पर तन्तुवायों को वस्त्र बेचने से रोका?
- 'एतत्सूक्ष्मपटस्य…' श्लोक का हिन्दी अनुवाद कीजिए।
- विधेरुन्मूलनम्, मोचयिष्याम्यतः, मिथ्यैतत् का सन्धि-विच्छेद कीजिए।
- विक्रेतुम्, विचिन्त्य, निर्माय में धातु और प्रत्यय अलग कीजिए।
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