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न्याय की कुर्सी – Class 5 Hindi Chapter 2 Notes & NCERT PDF

Class 5HindiChapter 2NCERT book: वीणा (Veena) - Hindi Class 5

Notes and a simple summary of Chapter 2 of the NCERT Class 5 Hindi book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

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पाठ 2: न्याय की कुर्सी (कहानी)

पाठ-परिचय

'न्याय की कुर्सी' एक रोचक कहानी है जिसकी लेखिका लीलावती भागवत हैं (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की पुस्तक 'स्वर्ग की सैर तथा अन्य कहानियाँ' से)। यह कहानी हमारे देश की सैकड़ों वर्ष पुरानी पुस्तक 'सिंहासन बत्तीसी' पर आधारित है। कहानी बताती है कि सच्चा न्याय वही कर सकता है जिसका मन साफ़ (कलुष-रहित) हो — धन, बल या पद से कोई न्यायी नहीं बनता।

पाठ-सार

1. टीले वाला राजा

उज्जैन नगरी के बाहर एक बड़ा मैदान था जिसमें टीले थे। खेलते हुए एक लड़का टीले पर ठोकर खाकर गिरा। उसे एक बड़ा चिकना पत्थर दिखा। वह उस पर बैठकर बोला:

"यह सिंहासन है मेरा। मैं राजा हूँ और तुम सब मेरे दरबारी।"

बच्चे फरियाद लाते, गवाह बुलाए जाते, और 'राजा' लड़का फैसला सुनाता। लोग उसकी न्याय-बुद्धि की चर्चा करने लगे। दो किसानों का ज़मीन का झगड़ा भी उसने ऐसा सुलझाया कि वे दंग रह गए। अब सब लोग राजा के दरबार की जगह वहीं जाने लगे।

2. राजा का क्रोध और खोज

राजा को क्रोध आया — "उस छोकरे की यह मजाल...!" वह स्वयं देखने आया और लड़के की बुद्धि पर स्तंभित रह गया। तभी पता चला कि आज बैठा लड़का रोज़ वाला नहीं है (वह बीमार था)। राजा समझ गया कि चमत्कार पत्थर की कुर्सी में है। खुदाई हुई तो निकला एक सुंदर सिंहासन — पायों पर चार देवदूतों की मूर्तियाँ। पंडितों ने बताया कि यह राजा विक्रमादित्य का सिंहासन है, जो न्याय और विवेक के लिए प्रसिद्ध थे।

3. चार मूर्तियाँ, चार प्रश्न

राजा जब भी बैठने बढ़ा, एक मूर्ति ने रोका:

  • पहली मूर्ति: "क्या तुमने कभी चोरी नहीं की?" — राजा ने एक दरबारी की ज़मीन पर कब्ज़ा किया था।
  • दूसरी मूर्ति: "क्या तुमने कभी झूठ नहीं बोला?" — राजा ने मुसीबत से बचने को कई बार झूठ बोला था।
  • तीसरी मूर्ति: "क्या तुमने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई?" — राजा पीछे हट गया।
  • चौथी मूर्ति: "जो लड़के इस पर बैठते थे, वे भोले-भाले थे। उनके मन में कलुष* नहीं था।"*
  • हर बार मूर्ति पंख फैलाकर उड़ गई और राजा ने तीन दिन उपवास और प्रायश्चित किया।

    4. अंत — घमंड की हार

    राजा ने सोचा — "मुझसे ज़्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान भला कौन होगा?" वह दृढ़ कदमों से बढ़ा, पर चौथी मूर्ति सिंहासन समेत आकाश में उड़ गई। राजा का अहंकार ही उसकी सबसे बड़ी कमी सिद्ध हुआ।

    पात्र

  • टीले वाले लड़के — भोले, निष्कपट, न्यायप्रिय
  • राजा — ईर्ष्यालु, घमंडी; प्रायश्चित करता है पर घमंड नहीं छोड़ पाता
  • चार मूर्तियाँ (देवदूत) — सच्चाई की परीक्षा लेने वाली
  • दो किसान, मंत्री, पंडित
  • शब्दार्थ

  • फरियाद – शिकायत, प्रार्थना
  • गवाह / गवाही – जिसने घटना देखी हो / उसका बयान
  • दरबारी – राजा के दरबार के सदस्य
  • न्याय-बुद्धि – सही फैसला करने की समझ
  • स्तंभित – हैरान, चकित होकर रुक जाना
  • मजाल – हिम्मत, साहस
  • लाव-लश्कर – सेना और साथ के लोग
  • प्रायश्चित – गलती का पछतावा करके उसे सुधारना
  • कलुष – मन का मैल, बुराई
  • सकपकाया – घबरा गया
  • दृढ़ – पक्का, मज़बूत
  • शिला – बड़ा पत्थर
  • भाषा-बिन्दु

    1. विराम चिह्न

    बिना चिह्नों के वाक्य समझना कठिन होता है। पाठ का उदाहरण:

    "यह तो और भी आश्चर्य की बात है! हो न हो, पत्थर की इस कुर्सी में ही कोई चमत्कार है। मैं इसकी जाँच करूँगा।"
  • । पूर्ण विराम • , अल्प विराम • ! विस्मयादिबोधक • " " उद्धरण चिह्न • ? प्रश्नवाचक
  • 2. संज्ञा और विशेषण

    "तीसरी मूर्ति भी उड़ गई।" — संज्ञा: मूर्ति; विशेषण: तीसरी।

    पाठ के विशेषण: एक झुंड, प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी, लंबा-चौड़ा मैदान, छोटी उम्र, सुंदर सिंहासन, अच्छी खासी भीड़।

    3. पहेलियाँ (बूझो तो जानें)

    भारत की अलग-अलग बोलियों की पहेलियाँ — उत्तर: गोंड – छाया, निमाड़ी – तरबूज, मालवी – मोर, बुंदेली – गन्ना, बघेली – सूर्य।

    सीख

  • सच्चा न्याय निष्कपट और साफ़ मन से होता है, पद या धन से नहीं।
  • चोरी, झूठ, दूसरों को चोट और घमंड — ये गुण न्याय के योग्य नहीं बनने देते।
  • गलती मानकर प्रायश्चित करना अच्छा है, पर अहंकार छोड़े बिना सुधार अधूरा है।
  • अभ्यास-संकेत

  • किसान राजा के पास न जाकर लड़के के पास गए क्योंकि लड़के के फैसलों से सबको संतोष होता था।
  • राजा को सबसे ज़्यादा आश्चर्य तब हुआ जब पता चला कि सिंहासन में ही चमत्कारी शक्ति है।
  • 'सिंहासन बत्तीसी' में राजा भोज को विक्रमादित्य का सिंहासन मिलता है जिसमें 32 मूर्तियाँ हैं।
  • सामान्य भूलें

  • यह सोचना कि राजा प्रायश्चित के बाद भी योग्य था — अंत में उसका घमंड ही बाधा बना।
  • 'चौथी मूर्ति' ने कोई नया अपराध नहीं पूछा; उसने मन की पवित्रता की बात कही।
  • लिखते समय उद्धरण चिह्न (" ") भूल जाना।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓कहानी के घटनाक्रम (टीले का खेल → राजा की खोज → चार मूर्तियाँ → सिंहासन का उड़ना) को क्रम से बताना
    • ✓राजा और टीले वाले लड़कों के गुणों की तुलना करके न्याय के लिए ज़रूरी गुण समझना
    • ✓विराम चिह्न (। , ! ? " ") का सही प्रयोग करना
    • ✓संज्ञा और विशेषण को वाक्यों में पहचानना
    • ✓सिंहासन बत्तीसी जैसी भारतीय पारंपरिक कथाओं से परिचित होना

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कक्षा में 'न्याय-सभा' का खेल करवाएँ — एक बच्चा न्यायाधीश, बाकी फरियादी और गवाह (पाठ की 'मेरा न्याय' गतिविधि)
    • →चार मूर्तियों के प्रश्नों का एक चार्ट बनवाएँ: प्रश्न – राजा का उत्तर – सीख
    • →बिना विराम चिह्न वाला अनुच्छेद श्यामपट्ट पर लिखकर बच्चों से चिह्न लगवाएँ
    • →कहानी को पाँच दृश्यों में बाँटकर समूहों से नाटक-मंचन करवाएँ
    • →पूछें: 'राजा को सिंहासन मिलना चाहिए था या नहीं?' — पक्ष-विपक्ष की छोटी चर्चा
    • →भारत की अलग-अलग बोलियों की पहेलियाँ बच्चों के घर से मँगवाकर कक्षा में बूझें
    • →पुस्तकालय से सिंहासन बत्तीसी/पंचतंत्र की एक कहानी पढ़कर सुनाने का कार्य दें

    📋 Assessment Questions

    1. राजा को लड़के के न्याय के बारे में कैसे पता चला?
    2. पहली, दूसरी और तीसरी मूर्ति ने राजा से क्या-क्या पूछा?
    3. चौथी मूर्ति सिंहासन समेत आकाश में क्यों उड़ गई?
    4. 'तीसरी मूर्ति भी उड़ गई।' — इसमें संज्ञा और विशेषण बताइए।
    5. दिए गए वाक्य में उचित विराम चिह्न लगाइए: 'चौथी मूर्ति ने कहा ठहरो'

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