संगच्छध्वं संवदध्वम् – Class 8 Sanskrit Chapter 1 Notes & NCERT PDF
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पाठ 1: संगच्छध्वं संवदध्वम् (मिलकर चलो, मिलकर बोलो)
पाठ-परिचय
यह पाठ ऋग्वेद के अन्तिम (दशम) मण्डल के अन्तिम सूक्त (१०.१९१) पर आधारित है, जो 'संज्ञान-सूक्तम्' या 'संघटन-सूक्तम्' नाम से प्रसिद्ध है। पाठ की शुरुआत एक संवाद से होती है — छात्र आचार्य को बताते हैं कि विद्यालय के क्रीडोत्सव में पादकन्दुक-क्रीडा (फुटबॉल) में उनकी टीम जीत गई। आचार्य पूछते हैं कि विरोधी टीम क्यों हारी? छात्र उत्तर देते हैं — उस दल के खिलाड़ियों में मनोभेदः द्वेषभावः च (मन-मुटाव और द्वेष) था, वे आपस में सहयोग नहीं करते थे। आचार्य समझाते हैं कि विजय के लिए मिलित्वा कार्यकरणम्, एकता, परस्परं सामञ्जस्यम् आवश्यक है — और यही सन्देश वेद में 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' द्वारा दिया गया है।
पाठ-सार
आचार्य बताते हैं कि भारतीय ज्ञान-परम्परा में वेद को पवित्रतम दैवी वाणी माना जाता है। वेदों की चार संहिताएँ हैं — ऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदः। फिर सब छात्र प्रणामाञ्जलि करके, आँखें मूँदकर, एकाग्र मन से समवेत स्वर में तीन मन्त्र पढ़ते हैं।
मन्त्र १
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १ ॥
अन्वयः – (यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं, वः मनांसि संजानताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते।
भावार्थ – हे मनुष्यो! परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में मिलकर आगे बढ़ो, एक स्वर में बोलो, और एक-दूसरे के मन के भावों को भली-भाँति जानो; आपस में मन-भेद न हो। जैसे सृष्टि के आरम्भ में अग्नि, वायु, आदित्य आदि ब्रह्माण्डीय शक्तियों (देवाः) ने अपना-अपना कर्तव्य स्वीकार करके उत्तम समन्वय से अपना काम निभाया, वैसे ही तुम भी वैमनस्य छोड़कर एकता से जियो।
मन्त्र २
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
भावार्थ – एक काम में लगे हुए इन लोगों का चिन्तन (मन्त्रः) समान और सौहार्दपूर्ण हो, इनका लक्ष्य (समितिः) समान हो, मन समान हो और चित्त (बुद्धि से उत्पन्न ज्ञान) एक हो। ऋषि कहते हैं — मैं तुम्हारे समान संकल्प को दिव्य भाव से जोड़कर प्रकट करता हूँ और तुम्हारी सामूहिक प्रार्थना (हविषा) से ज्ञान-यज्ञ करता हूँ।
मन्त्र ३
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
भावार्थ – तुम्हारा संकल्प (आकूतिः) समान हो, तुम्हारे हृदय समरसता से भरे हों, और तुम्हारा मन एक जैसा हो, जिससे तुम्हारा संगठन सुन्दर और उत्तम बने (सुसहासति)। इससे परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में सुख, शान्ति और मैत्री-भाव बना रहता है।
पाठ के अनुसार इन मन्त्रों से प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आयु, आरोग्य, विजय, समृद्धि, धर्म, ज्ञान-प्राप्ति और आत्मतृप्ति मिलती है।
शब्दार्थ
व्याकरण-बिन्दु
सम् + गम् → आत्मनेपद
लोट्-लकार (आज्ञा/प्रार्थना) — 'गम्' परस्मैपद
लोट्-लकार — 'सम् + गम्' आत्मनेपद
लोट्-लकार के प्रयोग
अस्मद्/युष्मद् के वैकल्पिक रूप
योग्यता-विस्तर (पाठ से)
अभ्यास-संकेत
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त (१०.१९१) के तीन मन्त्रों को शुद्ध उच्चारण और अर्थ सहित जानना
- ✓एकता, सहयोग और सामञ्जस्य को सफलता का आधार समझना — जैसे फुटबॉल टीम की जीत
- ✓सम् + गम् से बनने वाले आत्मनेपद लोट्-रूप (संगच्छध्वम्) पहचानना
- ✓लोट्-लकार के तीन प्रयोग — आज्ञा, आमन्त्रण, आशीर्वाद
- ✓अस्मद्-युष्मद् के वैकल्पिक रूप (मे, ते, मा, त्वा) पहचानना
👨🏫 Teaching Tips
- →कक्षा की शुरुआत टीम-खेल के अनुभव से करें — किस टीम में सहयोग था, कौन हारी और क्यों
- →तीनों मन्त्रों का समवेत स्वर में सस्वर पाठ करवाएँ, फिर पदच्छेद बोर्ड पर लिखें
- →प्रत्येक मन्त्र का अन्वय छात्रों से शब्द-कार्ड जोड़कर बनवाएँ
- →लोट्-लकार की तालिका को 'आदेश-खेल' से सिखाएँ — एक छात्र आदेश दे (उत्तिष्ठत, उपविशत), बाकी पालन करें
- →गम् (परस्मैपद) और संगम् (आत्मनेपद) के रूप दो रंगों में लिखकर तुलना करवाएँ
- →समूह-परियोजना: विद्यालय में एकता बढ़ाने के उपायों पर संस्कृत में ३-४ वाक्य
- →योग्यता-विस्तर से वेद, उपवेद, वेदाङ्ग पर प्रश्नोत्तरी खेल करवाएँ
📋 Assessment Questions
- क्या छात्र तीनों मन्त्र शुद्ध उच्चारण से बोल सकते हैं?
- क्या वे 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' का अभिप्राय अपने शब्दों में बता सकते हैं?
- क्या वे लट्-लकार के वाक्यों को लोट्-लकार में बदल सकते हैं (वयं पठामः → वयं पठाम)?
- क्या वे अस्मद्/युष्मद् के वैकल्पिक रूप पहचान सकते हैं?
- क्या वे बता सकते हैं कि यह सूक्त ऋग्वेद के किस मण्डल का है?
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- 15. परिशिष्टम् २: शब्दरूपाणि
- 16. परिशिष्टम् ३: धातुरूपाणि