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सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) – Class 8 Sanskrit Chapter 10 Notes & NCERT PDF

Class 8SanskritChapter 10NCERT book: दीपकम् (Deepakam) - Sanskrit Class 8

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पाठ 10: सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) (अच्छे उद्देश्य के लिए त्याग श्रेष्ठ – पहला भाग)

पाठ-परिचय

दशमः पाठः – सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) (अच्छे उद्देश्य के लिए त्याग श्रेष्ठ है – पहला भाग)। यह पाठ प्रसिद्ध कथाग्रन्थ ‘हितोपदेशः’ से लिया गया है। संस्कृत कथा-साहित्य मनोरञ्जन के साथ जीवन के उपदेश और प्रेरणा देता है। इसमें राजा शूद्रक की सेवा में नियुक्त कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र वीरवर की कथा है, जो राजा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण भी अर्पित करने को तैयार था। पाठ दो भागों में है; यह पहला भाग है।

पाठ-सार

वीरवर का आगमन

आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी ।

शोभावती नगरी में शूद्रक नाम का महापराक्रमी, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता और पवित्र चरित्र वाला राजा रहता था। एक दिन वीरवर नाम का राजपुत्र आजीविका (वृत्ति) के लिए राजद्वार पर आया। उसके साथ पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती थे।

द्वारपाल (प्रतिहार/दौवारिक) उसे राजा के पास ले गया। संवाद:

  • राजा – किं ते वर्तनम् ? (तुम्हारा वेतन क्या है?)
  • वीरवर – प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव ! (प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ)
  • राजा – का ते सामग्री ? (तुम्हारे साधन क्या हैं?)
  • वीरवर – इमौ बाहू, एष खड्गश्च । (ये दो भुजाएँ और यह तलवार)
  • राजा – नैतच्छक्यम् ! (यह सम्भव नहीं)
  • वीरवर प्रणाम करके चला गया। तब मन्त्री ने सलाह दी कि पहले चार दिन का वेतन देकर परीक्षा कर ली जाए कि यह वेतन उचित है या नहीं। मन्त्रियों के कहने पर राजा ने ताम्बूलदान (पान देकर) से वीरवर को नियुक्त किया।

    वीरवर का आचरण

  • प्रतिदिन वेतन का आधा भाग देवों (देवकार्य) को देता,
  • बचे हुए का आधा (अर्थात् वेतन का चौथाई) दरिद्रों को देता,
  • शेष (चौथाई) भोजन आदि के खर्च के लिए पत्नी के हाथ में रखता।
  • फिर हथियार लेकर दिन-रात (अहर्निशम्) राजद्वार पर सेवा करता और राजा के आदेश पर ही घर जाता।
  • कृष्णचतुर्दशी की रात

    एक बार कृष्णचतुर्दशी की आधी रात को राजा ने करुण रोने की आवाज़ सुनी।

  • राजा – कोऽत्र द्वारि तिष्ठति ?
  • वीरवर – सेवको वीरवरोऽत्र द्वारि वर्तते देव !
  • राजा – क्रन्दनमनुसर राजपुत्र ! (रोने की आवाज़ के पीछे जाओ)
  • राजा ने सोचा कि इस सूचीभेद्य (घने) अन्धकार में राजपुत्र को अकेले नहीं जाना चाहिए, इसलिए वह स्वयं तलवार लेकर छिपकर उसके पीछे गया। नगर के बाहर वीरवर ने दिव्य आभूषणों से सजी एक रोती हुई सुन्दरी देखी।

  • वीरवर – का त्वमम्ब ! किमर्थं विलपसि ?
  • वह बोली – मैं राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी हूँ। देव के अपराध से आज से तीसरे दिन राजा की मृत्यु हो जाएगी और मैं अनाथ हो जाऊँगी, इसलिए रो रही हूँ।
  • वीरवर ने साष्टाङ्ग प्रणाम करके उपाय पूछा। राजलक्ष्मी ने कहा – उपाय अत्यन्त दुःसाध्य है: यदि तुम अपनी सबसे प्रिय वस्तु हँसते हुए मुख से भगवती सर्वमङ्गला* को उपहार रूप में अर्पित करो, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष जीएँगे और मैं सुख से यहीं रहूँगी।*
  • इतना कहकर वह तुरन्त अदृश्य हो गई। (कथा दूसरे भाग में आगे बढ़ती है।)
  • शब्दार्थ

  • महीपतिः / भूपालः – राजा
  • वृत्त्यर्थम् – आजीविका पाने के लिए
  • प्रतिहारः / दौवारिकः – द्वारपाल
  • वर्तनम् – वेतन
  • सुवर्णशतचतुष्टयम् – चार सौ स्वर्णमुद्राएँ
  • उपपन्नम् – उचित, उपयुक्त
  • धृतायुधः – शस्त्रधारी
  • अहर्निशम् – दिन-रात
  • सूचीभेद्ये तिमिरे – घने अन्धकार में
  • खड्गपाणिः – हाथ में तलवार लिए हुए
  • विलपसि / क्रन्दामि – (तुम) रो रही हो / (मैं) रो रही हूँ
  • पञ्चत्वं याति – मृत्यु को प्राप्त होता है
  • दुःसाध्या – कठिनाई से पूरा होने वाली
  • सहासवदनेन – हँसते हुए मुख से
  • व्याकरण-बिन्दु

    (१) मुक्त पदविन्यास (वाक्यान्वय)

    संस्कृत में पदों का क्रम बदला जा सकता है, अर्थ वही रहता है – रामः वनम् अगच्छत् / अगच्छत् रामः वनम् / वनम् अगच्छत् रामः। साहित्य में क्रम बदलकर वाक्य सुन्दर बनाया जाता है।

  • सामान्य क्रम: शोभावती नाम काचन नगरी आसीत् ।
  • पाठ में: आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी ।
  • अन्वय करते समय पदों की विभक्ति देखकर क्रम लगाएँ।
  • (२) भूतकाल के चार तरीके

  • लङ् लकार – उपागच्छत् (उप+अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि+अचिन्तयत्)
  • लट् + स्म – प्रतिवसति स्म
  • क्तवतु प्रत्यय – श्रुतवान्
  • क्त प्रत्यय – निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता
  • (३) सन्धि-विच्छेद (पाठ से)

  • अथैकदा = अथ + एकदा
  • वृत्त्यर्थम् = वृत्ति + अर्थम्
  • कस्मादपि = कस्मात् + अपि
  • कोऽपि = कः + अपि
  • राजपुत्रोऽस्मि = राजपुत्रः + अस्मि
  • तदालोक्य = तत् + आलोक्य
  • ततोऽसौ = ततः + असौ
  • वेति = वा + इति
  • चार्द्धम् = च + अर्धम्
  • कापि = का + अपि
  • प्रत्युवाच = प्रति + उवाच
  • अस्त्यत्र = अस्ति + अत्र
  • अभ्यास-संकेत

  • ‘आम्/न’ प्रश्न ध्यान से: वीरवर राजपुत्र था – आम्; राजा ने देखते ही वृत्ति दी – न (मन्त्री की सलाह पर दी); वीरवर वेतन का चौथाई भाग पत्नी को देता था – आम्; रोने की आवाज़ दिन में सुनी – न (आधी रात को)।
  • अन्वय – आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी → शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
  • योग्यताविस्तर (संक्षेप)

  • जीमूतवाहन की कथा – विदेह के राजा शुद्धकेतु के पुत्र जीमूतवाहन ने नाग शङ्खचूड की रक्षा के लिए स्वयं को गरुड के सामने प्रस्तुत किया; उसका धैर्य देखकर गरुड ने नागों को न खाने की प्रतिज्ञा की।
  • परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
    परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥

    सामान्य भूलें

  • वेतन को ‘चार स्वर्णमुद्राएँ’ समझना – सुवर्णशतचतुष्टयम् = 4 × 100 = चार सौ।
  • वेतन-वितरण उलटा लिखना – आधा देवों को, चौथाई दरिद्रों को, चौथाई पत्नी को।
  • यह मानना कि राजा ने तुरन्त नियुक्त किया – पहले मना किया, फिर मन्त्री की सलाह पर नियुक्त किया।
  • रोने वाली स्त्री को साधारण स्त्री समझना – वह राजलक्ष्मी थी।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓हितोपदेश की वीरवर-कथा का पहला भाग – आगमन, नियुक्ति और राजलक्ष्मी से भेंट
    • ✓वीरवर की कर्तव्यनिष्ठा और वेतन का बँटवारा (आधा देवों को, चौथाई दरिद्रों को, चौथाई पत्नी को)
    • ✓संस्कृत का मुक्त पदविन्यास और अन्वय करने की विधि
    • ✓भूतकाल के चार प्रयोग – लङ्, लट्+स्म, क्तवतु, क्त
    • ✓पाठगत सन्धियों का विच्छेद – अथैकदा, कोऽपि, ततोऽसौ आदि

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →राजा-वीरवर संवाद (किं ते वर्तनम्? का ते सामग्री?) को कक्षा में नाटक रूप में करवाएँ
    • →400 स्वर्णमुद्राओं का बँटवारा बोर्ड पर भिन्न/चित्र से दिखाएँ (200, 100, 100)
    • →एक वाक्य के तीन-चार क्रम बनवाकर मुक्त पदविन्यास का खेल करवाएँ
    • →भूतकाल के चार प्रयोगों की रंगीन तालिका (सूची रूप) पाठ के उदाहरणों से बनवाएँ
    • →सन्धि-पत्तियाँ बनाकर समूहों में विच्छेद-प्रतियोगिता कराएँ
    • →कथा को दूसरे भाग से पहले रोककर विद्यार्थियों से अनुमान लगवाएँ कि वीरवर क्या करेगा
    • →जीमूतवाहन की कथा से ‘परोपकार’ पर चर्चा कराएँ

    📋 Assessment Questions

    1. राजा शूद्रक कैसा राजा था? पाठ के विशेषण लिखिए।
    2. वीरवर अपने वेतन का उपयोग कैसे करता था?
    3. ‘इमौ बाहू, एष खड्गश्च’ – यह किसने, किस प्रश्न के उत्तर में कहा?
    4. राजलक्ष्मी ने राजा की दीर्घायु का क्या उपाय बताया?
    5. लङ्, क्तवतु और क्त प्रत्यय का पाठ से एक-एक उदाहरण दीजिए।

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    1. 1. संगच्छध्वं संवदध्वम्
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    11. 11. सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
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    13. 13. वर्णोच्चारण-शिक्षा १
    14. 14. परिशिष्टम् १: व्याकरणम् (उपसर्गाः, प्रत्ययाः, विभक्तिः, सन्धिः)
    15. 15. परिशिष्टम् २: शब्दरूपाणि
    16. 16. परिशिष्टम् ३: धातुरूपाणि