पद – Class 9 Hindi Chapter 8 Notes & NCERT PDF
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पाठ 8: पद (रैदास)
पाठ-परिचय
संत रैदास (रविदास) का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। वे निर्गुण संत कवि थे, जिन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को सच्चा धर्म माना। उनकी भाषा सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्द भी मिलते हैं। उनकी रचनाएँ 'रैदास बानी' में संकलित हैं और कुछ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं।
पाठ में रैदास के दो पद हैं— पहले में अनन्य भक्ति और समर्पण, दूसरे में अटूट निष्ठा और अडिग भक्ति का भाव है।
पाठ-सार
पद 1
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।
भावार्थ— रैदास कहते हैं कि अब राम-नाम की रट लग गई है, यह छूट नहीं सकती। हे प्रभु! तुम चंदन हो और मैं पानी— चंदन की सुगंध पानी के अंग-अंग में समा जाती है। तुम वन के बादल (घन) हो और मैं मोर, जो बादल देखकर नाचता है; जैसे चकोर चंद्रमा को एकटक देखता रहता है। तुम दीपक हो, मैं बाती, जिसकी ज्योति दिन-रात जलती है। तुम मोती हो, मैं धागा; हमारा मेल वैसा है जैसे सोने में सुहागा मिलकर उसकी चमक बढ़ा देता है। तुम स्वामी हो, मैं दास— रैदास ऐसी ही भक्ति करता है।
पद 2
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव और नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
भावार्थ— हे राम! यदि तुम मुझसे नाता तोड़ भी दो, तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा; तुमसे तोड़कर किससे जोड़ूँगा? मुझे तीर्थ और व्रत की कोई चिंता (अंदेसा) नहीं, मुझे केवल तुम्हारे चरण-कमलों का भरोसा है। जहाँ-जहाँ जाता हूँ, तुम्हारी ही पूजा होती है (सर्वव्यापक ईश्वर); तुम जैसा कोई दूसरा देव नहीं। मैंने अपना मन हरि से जोड़ लिया है और हरि से जोड़कर सबसे (सांसारिक मोह से) तोड़ लिया है। रैदास मन, कर्म और वचन से कहता है कि हर पहर मुझे तुम्हारी ही आशा है।
साथ-साथ पढ़ें— संत नामदेव
पाठ में महाराष्ट्र के निर्गुण संत कवि नामदेव (13वीं–14वीं शताब्दी) के दो पद भी हैं। वे भी आडंबरों का विरोध कर प्रेम और निराकार भक्ति की बात करते हैं— जैसे "बछरा बिनु गाइ अकेली", "पानी बिनु ज्यूं मीन तलफै, ऐसे रामनाम बिनु नामा कलपै।"
शब्दार्थ
काव्य-सौन्दर्य / भाषा-बिन्दु
अभ्यास-संकेत ('मेरे उत्तर मेरे तर्क')
केन्द्रीय भाव
भक्त और भगवान का संबंध अटूट और एकाकार है। सच्ची भक्ति तीर्थ-व्रत जैसे बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि मन, कर्म और वचन से आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण में है।
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓रैदास निर्गुण संत कवि हैं जिन्होंने आडंबरों का खंडन कर आंतरिक भक्ति को सच्चा धर्म माना
- ✓पहले पद में चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा जैसे उपमानों से भक्त-आराध्य की एकाकारता प्रकट हुई है
- ✓दूसरे पद में तीर्थ-व्रत के स्थान पर प्रभु के चरणों में अटूट निष्ठा और सर्वव्यापक ईश्वर का भाव है
- ✓पदों में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार तथा सरल लोकधर्मी ब्रजभाषा की पहचान
- ✓रैदास और नामदेव की निर्गुण भक्ति-परंपरा की समानताओं को समझना
👨🏫 Teaching Tips
- →दोनों पदों का सस्वर गायन कराएँ ताकि विद्यार्थी उनकी लय और गेयता अनुभव करें
- →बोर्ड पर 'आराध्य' और 'भक्त' के दो स्तंभ बनाकर पद से उपमान-जोड़े (चंदन-पानी आदि) भरवाएँ
- →सुहागा (बोरेक्स) का वैज्ञानिक उपयोग विज्ञान शिक्षक के सहयोग से समझाएँ ताकि उपमा का अर्थ स्पष्ट हो
- →अनुप्रास, उपमा, रूपक के उदाहरण पाठ से ढूँढ़वाकर अन्य कविताओं से भी मिलान कराएँ
- →'जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ' के आधार पर अटूट मित्रता पर लघुकथा लिखवाएँ
- →रैदास और नामदेव के पदों की समानता-अंतर पर समूह-चर्चा कराएँ
- →भक्ति-काल की सामाजिक पृष्ठभूमि (आडंबर-विरोध) पर सामाजिक विज्ञान शिक्षक से संक्षिप्त चर्चा कराएँ
📋 Assessment Questions
- पहले पद में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन उपमानों से व्यक्त किया गया है?
- "तीरथ बरत न करूँ अंदेसा" पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
- "जैसे सोने मिलत सुहागा" में कौन-सा अलंकार है? कारण सहित बताइए।
- रैदास ने भक्ति का प्रमुख आधार किसे माना है?
- सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त हुई है?
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