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सौहार्दं प्रकृतेः शोभा – Class 10 Sanskrit Chapter 6 Notes & NCERT PDF

Class 10SanskritChapter 6NCERT book: शेमुषी भाग 2 (Shemushi) - Sanskrit Class 10

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पाठ 6: सौहार्दं प्रकृतेः शोभा (मित्रता ही प्रकृति की शोभा है)

पाठ-परिचय

सौहार्दं प्रकृतेः शोभा (मित्रता ही प्रकृति की शोभा है) एक संवादात्मक नाटक है। आज समाज में लोग आत्माभिमानी होकर एक-दूसरे का तिरस्कार करते हैं और स्वार्थ-पूर्ति में लगे रहते हैं — मानो उनका सिद्धान्त हो:

"नीचैरनीचैरतिनीचनीचैः सर्वैः उपायैः फलमेव साध्यम्"
(नीच, अनीच, अति नीच — सभी उपायों से बस फल ही साधना है।)

इसी प्रवृत्ति के विरोध में इस पाठ में पशु-पक्षियों के माध्यम से आत्माभिमान दिखाया गया है और अन्त में प्रकृतिमाता के द्वारा निष्कर्ष स्थापित किया गया है कि समय के अनुसार सबका महत्त्व है, सब एक-दूसरे पर आश्रित हैं, अतः हमें स्नेह और मैत्रीपूर्ण व्यवहार से रहना चाहिए।

पाठ-सार (कथा-क्रम)

1. सिंह की दुर्दशा

वन में नदी के पास एक सिंह सुख से विश्राम कर रहा है। एक वानर आकर उसकी पूँछ हिला देता है, दूसरा उसके कान खींचकर पेड़ पर चढ़ जाता है। क्रुद्ध सिंह इधर-उधर दौड़ता, गरजता है पर कुछ नहीं कर पाता। पक्षी यह देखकर प्रसन्नता से कलरव करते हैं। सिंह पूछता है — "मैं वनराज हूँ, क्या तुम्हें भय नहीं? क्यों सब मिलकर मुझे तंग करते हो?"

वानर उत्तर देता है — राजा रक्षक होता है, पर तुम तो भक्षक हो; अपनी रक्षा में भी समर्थ नहीं, तो हमारी रक्षा कैसे करोगे? वह पञ्चतन्त्र की उक्ति सुनाता है:

यो न रक्षति वित्रस्तान् पीड्यमानान् परैः सदा।
जन्तून् पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः॥

अर्थ: जो राजा दूसरों द्वारा सताए गए, डरे हुए प्राणियों की रक्षा नहीं करता, वह राजा के रूप में निःसन्देह यमराज (कृतान्त) है।

2. काक और पिक का विवाद

काक कहता है कि वनराज बनने योग्य तो वही है। पिक (कोयल) उपहास करती है — तुम "का-का" के कर्कश स्वर से वातावरण व्याकुल करते हो; न रूप है, न ध्वनि; काले रंग के, मेध्यामेध्यभक्षक (पवित्र-अपवित्र सब खाने वाले) को हम वनराज कैसे मानें? काक उत्तर देता है — तुम भी तो काली हो! मेरी सत्यप्रियता प्रसिद्ध है ("अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्"), हमारा परिश्रम और एकता विश्वविख्यात है, और काकचेष्टः विद्यार्थी ही आदर्श छात्र माना जाता है। कोयल कहती है:

काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥

अर्थ: कौआ भी काला है, कोयल भी काली; दोनों में क्या भेद? वसन्त आने पर (मधुर स्वर से पता चलता है कि) कौआ कौआ है और कोयल कोयल। काक उलटकर कहता है — हे परभृत् (दूसरों द्वारा पाली जाने वाली)! यदि मैं तुम्हारी सन्तान न पालूँ तो कोयलें कहाँ होंगी?

3. गज, बक और मयूर

  • गज कहता है — मैं विशालकाय, बलशाली, पराक्रमी हूँ; प्राणियों को तंग करने वाले को सूँड से पटककर मार दूँगा। तभी एक वानर उसकी भी पूँछ खींचकर पेड़ पर चढ़ जाता है; गज पेड़-पेड़ दौड़ता है और सिंह हँसता है। वानर कहता है — हम सिंह और गज दोनों को हराने में समर्थ हैं, अतः हम ही योग्य।
  • बक (बगुला) कहता है — मैं शीतल जल में बहुत देर स्थितप्रज्ञ की तरह ध्यानमग्न रहकर रक्षा के उपाय सोचूँगा। वानर उसकी पोल खोलता है — 'स्थितप्रज्ञ' के बहाने तुम बेचारी मछलियों को छल से पकड़कर खाते हो। वह श्लोक कहता है:
  • यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा।
    अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव॥

    अर्थ: यदि राजा उचित नेता न हो तो प्रजा बिना कर्णधार (नाविक) वाली नौका की तरह समुद्र में डूब जाती है।

  • मयूर कहता है — विधाता ने मेरे सिर पर राजमुकुट-सी शिखा रखकर मुझे पक्षिराज बनाया है; मेरा नृत्य प्रकृति की आराधना है; आक्रमणकारी को मैं अपने सौन्दर्य और नृत्य से आकर्षित कर वन से बाहर कर दूँगा। वानर उसे अहिभुक् (साँप खाने वाला) कहकर चिढ़ाता है।
  • व्याघ्र और चित्रक (बाघ और चीता) भी आकर स्वयं को योग्य बताते हैं; सिंह कहता है — तुम भी मेरी तरह भक्षक हो, रक्षक नहीं।
  • 4. उलूक का चयन और काक का विरोध

    सब पक्षी तय करते हैं कि कोई खग (पक्षी) ही वनराज बने। पर हर पक्षी स्वयं को ही योग्य मानता है। तब गहरी नींद में सोते उलूक को देखकर वे सोचते हैं — यह आत्मश्लाघा से रहित, पद-निर्लिप्त है, यही राजा बने। अभिषेक की तैयारी होती है, तभी काक अट्टहास करके विरोध करता है — मयूर, हंस, कोकिल आदि श्रेष्ठ पक्षियों के रहते इस दिवान्ध (दिन में अंधे), करालवक्त्र (भयंकर मुख वाले) का अभिषेक! जो दिन भर सोता है, वह रक्षा कैसे करेगा?

    स्वभावरौद्रमत्युग्रं क्रूरमप्रियवादिनम्।
    उलूकं नृपतिं कृत्वा का नु सिद्धिर्भविष्यति॥

    अर्थ: स्वभाव से रौद्र, अत्यन्त उग्र, क्रूर और अप्रिय बोलने वाले उल्लू को राजा बनाकर कौन-सी सिद्धि होगी?

    5. प्रकृतिमाता का सन्देश

    तभी प्रकृतिमाता आती हैं — "तुम सब मेरी सन्तान हो, आपस में क्यों लड़ते हो? सभी वन्यजीव अन्योन्याश्रित हैं।"

    ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति।
    भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥

    अर्थ: देना, लेना, रहस्य बताना, पूछना, खाना और खिलाना — ये प्रेम (मित्रता) के छह लक्षण हैं।

    प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
    नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥

    अर्थ: प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित; राजा के लिए अपना प्रिय हितकर नहीं, प्रजा का प्रिय ही हितकर है।

    अगाधजलसञ्चारी न गर्वं याति रोहितः।
    अङ्गुष्ठोदकमात्रेण शफरी फुर्फुरायते॥

    अर्थ: अथाह जल में घूमने वाली रोहित (रोहू) बड़ी मछली घमण्ड नहीं करती, पर अँगूठे भर जल में शफरी (छोटी मछली) फुदकती (इतराती) है।

    अतः सब लोग शफरी की तरह केवल अपने गुणों की चर्चा छोड़कर, मिलकर प्रकृति-सौन्दर्य और वन-रक्षा का प्रयत्न करें। सब प्रणाम करके संकल्प लेते हैं:

    प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः।
    अन्योन्यसहयोगेन लाभस्तेषां प्रजायते॥

    अर्थ: आपसी विवाद से प्राणियों की हानि होती है, परस्पर सहयोग से उनका लाभ होता है।

    शब्दार्थ

  • धुनाति — गृहीत्वा आन्दोलयति — पकड़कर हिलाता है
  • तुदन्ति — अवसादयन्ति — तंग करते हैं
  • कलरवम् — पक्षिणां कूजनम् — चहचहाहट
  • वित्रस्तान् — विशेषेण भीतान् — विशेष रूप से डरे हुओं को
  • कृतान्तः — यमराज, जीवन का अन्त करने वाला
  • अनृतम् — असत्य
  • अतिविकत्थनम् — आत्मश्लाघा — डींग मारना
  • पोथयित्वा — पटककर, पीड़ा देकर
  • विप्लवेत इह — यहाँ डूब जाए
  • संशीतिलेशस्य — ज़रा से भी सन्देह का
  • करालवक्त्रस्य — भयंकर मुख वाले का
  • गुह्यम् आख्याति — रहस्य कहता है
  • मोदध्वम् — प्रसन्न रहो
  • रोहितः — रोहू नामक बड़ी मछली
  • शफरी — छोटी मछली
  • व्याकरण-बिन्दु

    समास (पाठ के अभ्यास से):

  • तुच्छजीवैः — तुच्छाः च ते जीवाः (कर्मधारय), तैः
  • वृक्षोपरि — वृक्षस्य उपरि (षष्ठी तत्पुरुष)
  • पक्षिसम्राट् — पक्षिणां सम्राट् (षष्ठी तत्पुरुष)
  • स्थितप्रज्ञः — स्थिता प्रज्ञा यस्य सः (बहुव्रीहि)
  • अपूर्वम् — न पूर्वम् (नञ् तत्पुरुष)
  • व्याघ्रचित्रकौ — व्याघ्रः च चित्रकः च (द्वन्द्व)
  • वाच्य-परिवर्तन (कर्तृवाच्य → कर्मवाच्य):

  • उदाहरण: क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति गर्जति च → क्रुद्धेन सिंहेन इतस्ततः धाव्यते गर्ज्यते च।
  • नियम: कर्ता तृतीया में, कर्म प्रथमा में, क्रिया कर्म के अनुसार (कर्मवाच्य लकार/क्त प्रत्यय)।
  • सन्धि-उदाहरण: सन्नपि = सन् + अपि; शृण्वन्नेवाहम् = शृण्वन् + एव + अहम्; कर्णमाकृष्य = कर्णम् + आकृष्य; नौरिव = नौः + इव।

    अभ्यास-संकेत

  • एकपद-उत्तर: वनराजः वानरैः (तुच्छजीवैः) दुरवस्थां प्राप्तः; काकः कर्कशध्वनिना वातावरणम् आकुलीकरोति; काकचेष्टः विद्यार्थी आदर्शच्छात्रः मन्यते; गजः स्वं बलशालिनं कथयति; बकः वराकान् मीनान् भक्षयति।
  • आम्/न: काकपिकयोः वर्णः कृष्णः (आम्); अन्योन्यसहयोगेन लाभः (आम्); "का-का" बकस्य ध्वनिः (न — काकस्य)।
  • रिक्तस्थान: काकः मेध्यामेध्यभक्षकः; पिकः परभृत्; बकः स्थितप्रज्ञ इव; मयूरः अहिभुक्; उलूकः आत्मश्लाघाहीनः पदनिर्लिप्तः; सर्वेषां महत्त्वं यथासमयम्।
  • बोर्ड परीक्षा हेतु

  • पात्र-पहचान (किसने किससे कहा) और श्लोकों के भावार्थ प्रायः पूछे जाते हैं।
  • वाच्य-परिवर्तन, समास-विग्रह, प्रश्न-निर्माण पर विशेष अभ्यास करें।
  • पाठ का सन्देश एक वाक्य में: परस्पर-सहयोग से लाभ, विवाद से हानि।
  • सामान्य भूलें

  • "का-का" ध्वनि काक की है, बक की नहीं।
  • परभृत् = कोयल (जिसकी सन्तान काक पालता है); अहिभुक् = मयूर।
  • 'स्थितप्रज्ञ' बक केवल दिखावे के लिए कहता है — यह प्रशंसा नहीं, व्यंग्य है।
  • अन्त में उलूक राजा नहीं बनता — काक विरोध करता है और प्रकृतिमाता सबको सहयोग का सन्देश देती हैं।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पशु-पक्षियों के संवाद से आत्माभिमान और स्वार्थ की निरर्थकता समझना।
    • ✓राजा का धर्म रक्षा है, भक्षण नहीं — 'यो न रक्षति...' श्लोक का भाव।
    • ✓प्रकृतिमाता का सन्देश: सब अन्योन्याश्रित हैं, समयानुसार सबका महत्त्व है।
    • ✓प्रीति के छह लक्षण और परस्पर-सहयोग से लाभ का सिद्धान्त।
    • ✓वाच्य-परिवर्तन, समास-विग्रह और सन्धि का अभ्यास।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कक्षा में पात्र बाँटकर (सिंह, वानर, काक, पिक, गज, बक, मयूर, उलूक, प्रकृतिमाता) नाट्य-वाचन कराएँ।
    • →हर पात्र के 'दावे' और उसके 'खण्डन' की दो-स्तम्भ सूची बोर्ड पर बनवाएँ।
    • →सभी श्लोकों का अन्वय पहले बोलकर, फिर लिखवाकर अर्थ स्पष्ट करें।
    • →'काकचेष्टः बकध्यानी...' जैसे पूरक श्लोक सुनाकर पाठ को विद्यार्थी-जीवन से जोड़ें।
    • →वाच्य-परिवर्तन के लिए पाठ का उदाहरण (क्रुद्धः सिंहः...) आधार बनाकर 5 वाक्य बदलवाएँ।
    • →कक्षा-चर्चा: विद्यालय या समाज में 'सौहार्द' क्यों आवश्यक है — एक-एक उदाहरण।
    • →रोहित-शफरी की तुलना से विनम्रता पर लघु निबन्ध (संस्कृत/हिन्दी) लिखवाएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. वनराज की दुर्दशा किसने की और क्यों? (पूर्ण वाक्य में)
    2. बक और मयूर के दावों का खण्डन किस प्रकार हुआ?
    3. प्रीति के छह लक्षण वाला श्लोक लिखकर अर्थ बताइए।
    4. तीन वाक्यों का वाच्य-परिवर्तन कीजिए।
    5. पाठ का सन्देश अपने शब्दों में लिखिए।

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