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विचित्रः साक्षी – Class 10 Sanskrit Chapter 7 Notes & NCERT PDF

Class 10SanskritChapter 7NCERT book: शेमुषी भाग 2 (Shemushi) - Sanskrit Class 10

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पाठ 7: विचित्रः साक्षी (अनोखा गवाह)

पाठ-परिचय

विचित्रः साक्षी (अनोखा गवाह) श्री ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का सम्पादित अंश है। यह कथा बाँग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए एक निर्णय पर आधारित है। न्यायाधीश सत्य-असत्य के निर्णय हेतु कभी-कभी ऐसी युक्तियों का प्रयोग करते हैं, जिनसे प्रमाण के अभाव में भी न्याय हो सके।

पाठ-सार

1. निर्धन पिता की यात्रा

एक निर्धन व्यक्ति ने बहुत परिश्रम (भूरि परिभ्रम्य) से कुछ धन कमाया और उससे अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाया। पुत्र छात्रावास में रहकर पढ़ने लगा। एक दिन पुत्र की बीमारी सुनकर पिता व्याकुल होकर उसे देखने चल पड़ा। धन के अभाव (अर्थकार्श्येन) के कारण उसने बस छोड़कर पैदल ही यात्रा की।

सन्ध्या तक भी वह गन्तव्य से दूर था। उसने सोचा — "निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा" (रात का अँधेरा फैलने पर सुनसान स्थान में पैदल यात्रा कल्याणकारी नहीं)। अतः वह पास के गाँव में एक गृहस्थ के पास गया; दयालु गृहस्थ ने उसे आश्रय दिया।

2. चोरी और झूठा आरोप

"विचित्रा दैवगतिः" — उसी रात उस घर में एक चोर घुसा और एक मञ्जूषा (सन्दूक) लेकर भागा। चोर के पैरों की आहट से अतिथि जाग गया, उसने चोर का पीछा करके उसे पकड़ लिया। तभी विचित्र बात हुई — चोर ही ज़ोर से चिल्लाने लगा "चौरोऽयम्, चौरोऽयम्" (यह चोर है)। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर ग्रामवासी आए और बेचारे अतिथि को ही चोर समझकर डाँटने लगे। वास्तव में गाँव का आरक्षी (रक्षापुरुष/सिपाही) ही चोर था। उसने तुरन्त अतिथि को चोर घोषित करके कारागृह में डाल दिया।

3. न्यायालय में न्यायाधीश बंकिमचन्द्र

अगले दिन आरक्षी उसे चोरी के आरोप में न्यायालय ले गया। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने दोनों के विवरण अलग-अलग सुने। उन्होंने अतिथि को निर्दोष और आरक्षी को दोषी माना, परन्तु प्रमाण के अभाव में निर्णय नहीं दे सके। उन्होंने दोनों को अगले दिन उपस्थित होने को कहा।

अगले दिन एक कर्मचारी ने सूचना दी कि दो कोस की दूरी (क्रोशद्वयान्तराले) पर किसी ने एक व्यक्ति को मार दिया है, उसका शव राजमार्ग के पास पड़ा है। न्यायाधीश ने आरक्षी और अभियुक्त दोनों को वह शव न्यायालय में लाने का आदेश दिया।

4. मार्ग की बात और 'विचित्र साक्षी'

दोनों लकड़ी के तख्ते पर कपड़े से ढँका शव कन्धों पर उठाकर चले। आरक्षी हृष्ट-पुष्ट था, अभियुक्त अत्यन्त दुबला (कृशकाय)। भारी शव ढोना उसके लिए कठिन था, वह भार की पीड़ा से रोने लगा। उसका रोना सुनकर प्रसन्न आरक्षी बोला —

"अरे दुष्ट! उस दिन तुमने मुझे चुराई गई मञ्जूषा लेने से रोका था। अब अपने किए का फल भोगो। इस चोरी के मामले में तुम्हें तीन वर्ष का कारावास मिलेगा" — और ज़ोर से हँसा।

शव को एक चौराहे (चत्वरे) पर रखा गया। न्यायाधीश के कहने पर जब आरक्षी अपना पक्ष रख रहा था, तभी आश्चर्य हुआ — शव ने ओढ़ा हुआ वस्त्र हटाया, न्यायाधीश को प्रणाम किया और मार्ग में आरक्षी द्वारा कही गई बात ज्यों-की-त्यों सुना दी। वास्तव में न्यायाधीश ने प्रमाण पाने के लिए एक व्यक्ति को शव बनाकर नियुक्त किया था — यही 'विचित्रः साक्षी' है।

न्यायाधीश ने आरक्षी को कारावास का दण्ड दिया और उस व्यक्ति को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया।

दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः।
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥

अर्थ: बुद्धि-वैभव से सम्पन्न लोग कठिन कार्यों को भी नीति और युक्ति का सहारा लेकर खेल-खेल में ही कर लेते हैं।

शब्दार्थ

  • भूरि — पर्याप्तम् — अत्यधिक
  • उपार्जितवान् — अर्जितवान् — कमाया
  • अर्थकार्श्येन — धनस्य अभावेन — धन के अभाव से
  • पदातिः — पादाभ्याम् — पैदल
  • विजने प्रदेशे — एकान्त प्रदेश में
  • शुभावहा — कल्याणप्रदा — कल्याणकारी
  • अन्वधावत् — अनु + अधावत् — पीछे-पीछे दौड़ा
  • क्रोशितुम् — चीत्कर्तुम् — ज़ोर से चिल्लाने
  • अभर्त्सयन् — भला-बुरा कहा
  • क्रोशद्वयान्तराले — दो कोस के बीच
  • कृशकायः — दुबले शरीर वाला
  • निशम्य — श्रुत्वा — सुनकर
  • भुङ्क्ष्व — भोगो
  • चत्वरे — चौराहे पर
  • प्रावारकम् — ओढ़ा हुआ वस्त्र
  • लीलयैव — लीलया + एव — खेल-खेल में
  • व्याकरण-बिन्दु

    प्रत्यय (पाठ के अभ्यास से):

  • ल्यप्: परिभ्रम्य, विहाय, आदाय, समागत्य
  • क्त: प्रस्थितः, प्रविष्टः, नियुक्तः, मुदितः
  • क्तवतु: उपार्जितवान्, पृष्टवान्, नीतवान्, आदिष्टवान्
  • तुमुन्: दापयितुम्, द्रष्टुम्, क्रोशितुम्, निर्णेतुम्
  • उपार्जितवान् = उप + अर्ज् + क्तवतु; दापयितुम् = दा + णिच् + तुमुन्
  • सन्धि:

  • पदातिरेव = पदातिः + एव
  • निशान्धकारे = निशा + अन्धकारे
  • भोजनान्ते = भोजन + अन्ते
  • चौरोऽयम् = चौरः + अयम्
  • गृहाभ्यन्तरे = गृह + अभ्यन्तरे
  • लीलयैव = लीलया + एव
  • यदुक्तम् = यत् + उक्तम्
  • प्रबुद्धोऽतिथिः = प्रबुद्धः + अतिथिः
  • शब्दरूप (पाठ में दिए):

  • अदस् (पुंलिङ्ग): प्रथमा — असौ, अमू, अमी; द्वितीया — अमुम्, अमू, अमून्; तृतीया — अमुना, अमूभ्याम्, अमीभिः; षष्ठी — अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम्; सप्तमी — अमुष्मिन्, अमुयोः, अमीषु
  • अध्वन् (मार्ग, नकारान्त पुंलिङ्ग): प्रथमा — अध्वा, अध्वानौ, अध्वानः; द्वितीया — अध्वानम्, अध्वानौ, अध्वनः; तृतीया — अध्वना, अध्वभ्याम्, अध्वभिः; सप्तमी — अध्वनि, अध्वनोः, अध्वसु
  • अभ्यास-संकेत

  • विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा; अतिथिः चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धः; अभियुक्तः कृशकायः आसीत्; न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डम् आदिष्टवान्; राजमार्गं निकषा मृतशरीरम् आसीत्।
  • 'मार्ग' अर्थ में प्रयुक्त पद — अध्वनि; 'दुष्कराण्यपि कर्माणि' में विशेष्य — कर्माणि।
  • विभक्ति-प्रयोग: गृहात् (पंचमी), अतिथये (चतुर्थी), न्यायाधिकारिणम् (द्वितीया), अस्मिन् (सप्तमी), पादध्वनिना (तृतीया)।
  • बोर्ड परीक्षा हेतु

  • घटनाओं का सही क्रम (घटनाक्रम-संयोजन) और "कः कं प्रति कथयति" प्रकार के प्रश्न।
  • प्रत्यय-विभाग (ल्यप्/क्त/क्तवतु/तुमुन्) — लगभग निश्चित प्रश्न।
  • अन्तिम श्लोक का अर्थ और पाठ का सन्देश: बुद्धि-कौशल से प्रमाण के अभाव में भी न्याय।
  • सामान्य भूलें

  • चोर कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, गाँव का आरक्षी ही था।
  • शव वास्तविक मृत व्यक्ति नहीं, न्यायाधीश द्वारा नियुक्त साक्षी था।
  • पिता पैदल इसलिए गया क्योंकि धन का अभाव था, कोई और कारण नहीं।
  • 'नीतवान्' क्तवतु है, 'नियुक्तः' क्त — दोनों में भ्रम न करें।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓कथा का घटनाक्रम: निर्धन पिता की यात्रा, चोरी, झूठा आरोप, न्यायालय, विचित्र साक्षी।
    • ✓न्यायाधीश बंकिमचन्द्र की बुद्धि-युक्ति से प्रमाण के अभाव में भी न्याय।
    • ✓ल्यप्, क्त, क्तवतु, तुमुन् प्रत्ययों की पहचान।
    • ✓दीर्घ, गुण, वृद्धि और विसर्ग सन्धि के पाठगत उदाहरण।
    • ✓अदस् और अध्वन् शब्दों के रूप।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कथा को चार दृश्यों (यात्रा, चोरी, न्यायालय, शव-प्रसंग) में बाँटकर चित्र-पट्टिका बनवाएँ।
    • →विद्यार्थियों से न्यायालय-दृश्य का लघु नाट्य-रूपान्तरण कराएँ।
    • →प्रत्ययों के चार स्तम्भ (ल्यप्/क्त/क्तवतु/तुमुन्) बनाकर पाठ के 16 पद छँटवाएँ।
    • →घटनाक्रम-संयोजन के लिए वाक्य-पट्टियाँ मिलाकर सही क्रम लगवाएँ।
    • →चर्चा: 'प्रमाण के बिना न्याय' — क्या यह युक्ति उचित थी? तर्क सहित।
    • →अन्तिम श्लोक कण्ठस्थ कराकर अपने जीवन से एक 'युक्ति' का उदाहरण पूछें।

    📋 Assessment Questions

    1. आरक्षी ने अतिथि को चोर कैसे सिद्ध किया?
    2. न्यायाधीश ने सत्य जानने के लिए क्या युक्ति अपनाई?
    3. पाँच पदों को सही प्रत्यय-स्तम्भ में लिखिए।
    4. 'मतिवैभवशालिनः' श्लोक का अर्थ लिखिए।

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