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अतिरिक्तम् अध्ययनम्: वर्णमात्रा-परिचयः – Class 7 Sanskrit Chapter 13 Notes & NCERT PDF

Class 7SanskritChapter 13NCERT book: दीपकम् (Deepakam) - Sanskrit Class 7

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अतिरिक्तम् अध्ययनम्: वर्णमात्रा-परिचयः (वर्णों की मात्राओं का परिचय)

परिचय

यह पाठ अतिरिक्तम् अध्ययनम् है — कक्षा 6 के "वयं वर्णमालां पठामः" पाठ को आगे बढ़ाता है। छात्रा श्रद्धा अध्यापक से पूछती है: कक्षा 6 में स्वरों की दो मात्राएँ (ह्रस्व, दीर्घ) पढ़ी थीं, पर पाठ के अन्त में तीसरी मात्रा "प्लुतः – त्रिमात्रः" भी दिखाई गई — यह क्या है? अध्यापक इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए मात्रा की पूरी व्यवस्था समझाते हैं।

स्वरों की तीन मात्राएँ

अन्य भारतीय भाषाओं में प्रायः स्वरों की दो ही मात्राएँ होती हैं, पर संस्कृत में हर स्वर का एक त्रिमात्र (प्लुत) उपभेद भी होता है।

  • ह्रस्वः – एकमात्रः (१)
  • दीर्घः – द्विमात्रः (२)
  • प्लुतः – त्रिमात्रः (३) — लिखते समय स्वर के बाद ३ लगाते हैं, जैसे अ३, इ३, ओ३
  • समानाक्षराणि

  • ह्रस्व: अ, इ, उ, ऋ, ऌ
  • दीर्घ: आ, ई, ऊ, ॠ (ऌ का दीर्घ नहीं होता)
  • प्लुत: अ३, इ३, उ३, ऋ३, ऌ३
  • सन्ध्यक्षराणि

  • दीर्घ: ए, ऐ, ओ, औ (इनके ह्रस्व नहीं होते)
  • प्लुत: ए३, ऐ३, ओ३, औ३
  • इस प्रकार संस्कृत में आहत्य (कुल) २२ स्वर होते हैं: 5 ह्रस्व + 8 दीर्घ + 9 प्लुत।

    प्लुत का प्रयोग कहाँ?

  • दूर से किसी को पुकारते समय — हे३ राम !, अत्र आगच्छ कुमार३ !
  • वेद-मन्त्र के आरम्भ में ओंकार के उच्चारण में — ओ३म् – भूर्भुवः स्वः… (गायत्री-महामन्त्रः), ओ३म् – सङ्गच्छध्वं संवदध्वं… (सङ्गठन-मन्त्रः)
  • व्यञ्जनों की अर्ध-मात्रा

    तीन मात्राएँ केवल स्वरों में होती हैं। सभी व्यञ्जनों की सदा अर्ध-मात्रा (१/२) होती है — स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म और अयोगवाह (अनुस्वार-विसर्ग) सभी की। याज्ञवल्क्य-शिक्षा का श्लोक:

    एकमात्रो भवेद् ह्रस्वः द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
    त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयः व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम् ॥

    अर्थ: एकमात्र स्वर ह्रस्व, द्विमात्र दीर्घ, त्रिमात्र प्लुत कहलाता है; व्यञ्जन अर्धमात्रिक होता है।

    इसलिए संस्कृत वर्णों की चतुर्विधाः मात्राः (चार प्रकार की मात्राएँ) हैं — स्वरों की तीन (त्रिविधाः) + व्यञ्जनों की एक (एकविधा, अर्ध)। मात्राओं में भेद उच्चारण के काल (समय) का है।

    प्रकृति में मात्राएँ

    मुर्गे (कुक्कुटः) की बाँग में तीनों काल सुनाई देते हैं: 'उ' (अल्पकालिक – एकमात्र), 'ऊ' (लम्बकालिक – द्विमात्र), 'उ३' (अतिविलम्बकालिक – त्रिमात्र)। पाणिनीय-शिक्षा का श्लोक:

    चाषस्तु वदते मात्रां द्विमात्रं त्वेव वायसः ।
    शिखी रौति त्रिमात्रं तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम् ॥
  • चाषः (नीलकण्ठ पक्षी) – एकमात्र ध्वनि → ह्रस्व जैसा
  • वायसः (कौआ) – द्विमात्र → दीर्घ जैसा
  • शिखी (मोर) – त्रिमात्र → प्लुत जैसा
  • नकुलः (नेवला) – अर्धमात्र → व्यञ्जन जैसा
  • मात्रा-गणना-क्रीडा (पुस्तक के उदाहरण)

    शब्द को वर्णों में तोड़ें, हर वर्ण की मात्रा लिखें, जोड़ें:

  • रामः = र् + आ + म् + अ + ः = १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ = ४ १/२ मात्राः
  • सीता = स् + ई + त् + आ = १/२ + २ + १/२ + २ = ५ मात्राः
  • हनूमान् = ह् + अ + न् + ऊ + म् + आ + न् = १/२ + १ + १/२ + २ + १/२ + २ + १/२ = ७ मात्राः
  • भरतः = भ् + अ + र् + अ + त् + अ + ः = १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ = ५ मात्राः
  • संयुक्त व्यञ्जन वाले शब्द (हर व्यञ्जन अलग गिना जाता है):

  • कौसल्या = क् + औ + स् + अ + ल् + य् + आ = १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + २ = ७ मात्राः
  • लक्ष्मणः = ल् + अ + क् + ष् + म् + अ + ण् + अ + ः = १/२ + १ + १/२ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ = ६ मात्राः
  • शत्रुघ्नः = श् + अ + त् + र् + उ + घ् + न् + अ + ः = १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ = ६ मात्राः
  • प्लुत स्वर वाले शब्द:

  • हे३ = ह् + ए३ = १/२ + ३ = ३ १/२ मात्राः
  • ओ३म् = ओ३ + म् = ३ + १/२ = ३ १/२ मात्राः
  • कुमार३ = क् + उ + म् + आ + र् + अ३ = १/२ + १ + १/२ + २ + १/२ + ३ = ७ १/२ मात्राः
  • अनुनासिक स्वर वाले शब्द (अनुनासिक से मात्रा नहीं बदलती):

  • काँस्कान् = क् + आँ + स् + क् + आ + न् = १/२ + २ + १/२ + १/२ + २ + १/२ = ६ मात्राः
  • सँस्कर्ता = स् + अँ + स् + क् + अ + र् + त् + आ = १/२ + १ + १/२ + १/२ + १ + १/२ + १/२ + २ = ६ १/२ मात्राः
  • मात्राओं का महत्त्व

    मात्रा-गणना से वर्णों और शब्दों का शुद्ध उच्चारण होता है और यह श्लोक-रचना (छन्द) में आवश्यक है, क्योंकि छन्दों में निश्चित मात्राएँ होती हैं। प्रायः सभी भारतीय भाषाओं ने अपनी वर्णमाला संस्कृत से ली है — भाषा में गणित का ऐसा सरल समावेश संस्कृत और भारतीय भाषाओं की विशेषता है।

    विशेष चिह्न

  • ॐ – पवित्र शब्द 'ओम्' (ओ३म्) के स्थान पर प्राचीन काल से प्रयुक्त; ॐ और ओम्/ओ३म् दोनों प्रयोग शुद्ध हैं।
  • ऽ (अवग्रह) – यह कोई नया वर्ण नहीं है, इसका उच्चारण नहीं होता। सन्धि में जब 'अ' अदृश्य हो जाता है, तब यह लगाया जाता है: कः + अपि = कोऽपि (या कोपि) — उच्चारण दोनों में 'कोपि' ही।
  • अभ्यास-संकेत

  • "वर्णानां कतिविधाः मात्राः?" → चतुर्विधाः। "स्वरेषु?" → त्रिविधाः। "एकविधा मात्रा केषाम्?" → व्यञ्जनानाम्।
  • "आहत्य कति स्वराः?" → २२। "मात्राणाम् उच्चारणे कस्य भेदः?" → कालस्य।
  • विसर्ग और अनुस्वार (अयोगवाह) – प्रत्येक की १/२ मात्रा।
  • मेलन: अ३ → प्लुतः, ऊ → दीर्घः, एँ → अनुनासिक-स्वरः, कू (क् + ऊ) → २ १/२।
  • रिक्त स्थान: शिखी – त्रिमात्र, वायसः – द्विमात्र, चाषः – एकमात्र, नकुलः – अर्धमात्र।
  • गणना अभ्यास के कुछ हल: बालः = ब् + आ + ल् + अ + ः = १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ = ४ १/२ मात्राः; चटका = च् + अ + ट् + अ + क् + आ = १/२ + १ + १/२ + १ + १/२ + २ = ५ १/२ मात्राः; कपोतः = क् + अ + प् + ओ + त् + अ + ः = १/२ + १ + १/२ + २ + १/२ + १ + १/२ = ६ मात्राः।
  • सामान्य भूलें

  • आ, ई आदि मात्रा-चिह्न देखकर व्यञ्जन की अर्ध-मात्रा जोड़ना भूल जाना — "का" = क् (१/२) + आ (२) = २ १/२।
  • संयुक्त व्यञ्जन (क्ष, त्र, घ्न) को एक वर्ण गिनना — क्ष = क् + ष्, दोनों की अलग-अलग १/२।
  • विसर्ग (ः) और अनुस्वार को गिनना भूल जाना — ये भी १/२ हैं।
  • अनुनासिक (ँ) को अलग मात्रा देना — अँ की मात्रा अ जितनी ही (१) है।
  • "३" के चिह्न को अंक समझकर पढ़ना — यह प्लुत का संकेत है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓स्वरों की तीन मात्राएँ – ह्रस्व (१), दीर्घ (२), प्लुत (३); व्यञ्जनों की सदा अर्ध-मात्रा (१/२)
    • ✓संस्कृत में आहत्य २२ स्वर हैं; प्लुत दूर से पुकारने और वेद-मन्त्र के ओ३म् में प्रयुक्त होता है
    • ✓याज्ञवल्क्य-शिक्षा और पाणिनीय-शिक्षा के श्लोकों से मात्राओं की पहचान (चाष, वायस, शिखी, नकुल)
    • ✓किसी भी शब्द को वर्णों में तोड़कर उसकी कुल मात्राएँ गिनना
    • ✓ॐ और अवग्रह (ऽ) जैसे विशेष चिह्नों का प्रयोग

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →मुर्गे की बाँग 'कु-कू-कु३' की नकल कक्षा से करवाकर ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत का अन्तर ताली की गिनती से सुनाएँ
    • →प्लुत को दूर खड़े मित्र को 'हे३ राम !' पुकारकर अभ्यास कराएँ
    • →बोर्ड पर वर्ण-विच्छेद तालिका के बजाय पंक्ति बनाएँ: वर्ण / मात्रा / योग — हर छात्र एक वर्ण जोड़े
    • →'मात्रा-गणना-क्रीडा' को टीम-प्रतियोगिता बनाएँ: पुस्तक के शब्द (बालः, चटका, कपोतः…) कार्ड पर दें
    • →संयुक्त व्यञ्जन वाले शब्दों (लक्ष्मणः, शत्रुघ्नः) में पहले वर्ण-वियोग, फिर गणना — कक्षा 6 पाठ 2 से जोड़ें
    • →परियोजना: घर के आसपास के पशु-पक्षियों की ध्वनि सुनकर उनकी मात्रा लिखवाएँ
    • →श्लोकों का सस्वर पाठ कराएँ और पदच्छेद पर ध्यान दिलाएँ

    📋 Assessment Questions

    1. संस्कृत वर्णों की कितने प्रकार की मात्राएँ होती हैं? स्वरों और व्यञ्जनों की अलग-अलग बताइए।
    2. 'कुमार३' और 'ओ३म्' की मात्राएँ वर्ण-विच्छेद सहित गिनिए।
    3. चाषः, वायसः, शिखी, नकुलः – किसकी ध्वनि कितनी मात्रा की है?
    4. प्लुत स्वर का प्रयोग किन दो सन्दर्भों में होता है? उदाहरण दीजिए।
    5. अवग्रह (ऽ) का प्रयोग कब होता है? 'कोऽपि' का उदाहरण समझाइए।

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