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सेवा हि परमो धर्मः – Class 7 Sanskrit Chapter 5 Notes & NCERT PDF

Class 7SanskritChapter 5NCERT book: दीपकम् (Deepakam) - Sanskrit Class 7

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पाठ 5: सेवा हि परमो धर्मः (सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है)

पाठ-परिचय

पञ्चमः पाठः – सेवा हि परमो धर्मः (सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है)

पाठ की शुरुआत कक्षा के एक संवाद से होती है। अध्यापिका पूछती हैं – "जीवने सफलतायै मानवः किं किम् अर्जयेत्?" (जीवन में सफलता के लिए मनुष्य क्या-क्या कमाए?) छात्र उत्तर देते हैं – विद्याम्, उपाधिम् (डिग्री), पदवीम् (पद), धनम्। अध्यापिका समझाती हैं कि इतना ही पर्याप्त नहीं, मानवीयाः गुणाः अपि आवश्यकाः – मानवीय गुण भी ज़रूरी हैं।

सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः इत्यादयः मानवीयाः गुणाः सन्ति ।

उदाहरण दिया गया है – सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन और पद सब कुछ था, किन्तु मानवीय गुणों से ही वे महात्मा बुद्ध बने। इसके बाद इन्हीं गुणों से जुड़ी नागार्जुन की कथा पढ़ाई गई है।

पाठ-सार (कथा)

नागार्जुन को सहायक चाहिए

  • नागार्जुनः प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञः (रसायन-विशेषज्ञ) और चिकित्सकः थे। वे अहोरात्रं (दिन-रात) प्रयोगशालायां कार्य करते थे।
  • एक दिन उन्होंने महाराज से निवेदन किया – "महाराज ! मम चिकित्साकार्याय एकः सहायकः आवश्यकः।"
  • राजा ने कहा – कल कुछ योग्य युवक आएँगे, आप परीक्षा लेकर किसी एक को स्वीकार करें।
  • परीक्षा

  • अगले दिन द्वौ युवकौ (दो युवक) आए। दोनों की पढ़ाई (विद्याभ्यास) समान थी।
  • नागार्जुन ने दोनों से एक विशेष रसायन (औषध) बनाकर लाने को कहा, इसके लिए दिनद्वयम् (दो दिन) दिए और निर्देश दिया – "गमनसमये राजमार्गेण गच्छताम्" (जाते समय राजमार्ग से जाना)।
  • दो युवकों का व्यवहार

  • पहला युवक दो दिन बाद औषध लेकर आया। अपनी निष्ठा दिखाने के लिए उसने घर की समस्याएँ बताईं – "पितुः उदरवेदना, मातुः ज्वरः च आसीत्" (पिता के पेट में दर्द और माता को बुखार था), फिर भी सब छोड़कर मैंने औषध बनाई।
  • दूसरा युवक खिन्नः (दुखी) होकर आया और बोला – "अहम् औषधं निर्मातुं न शक्तवान्।" कारण पूछने पर उसने बताया – राजमार्ग पर उसने एक रोगी देखा जिसकी परिस्थितिः शोचनीया (दयनीय) थी। वह उसे अपने घर ले गया और दो दिन उसकी सेवा में निरतः (लगा) रहा। आज सुबह रोगी स्वस्थ हुआ, तब वह सीधे यहाँ आया।
  • नागार्जुन का निर्णय

  • नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक चुना। राजा को आश्चर्य हुआ।
  • नागार्जुन ने समझाया – वह रोगी मैंने पहले ही मार्ग में देखा था, इसीलिए दोनों को राजमार्ग से जाने को कहा था। पहला युवक रोगी को देखकर भी आगे बढ़ गया; वह यन्त्रवत् (मशीन की तरह) काम करता है, उसमें सेवा-भावना नहीं है।
  • सेवाभावनां विना चिकित्सकः कथं भवेत् ?
    (सेवा-भावना के बिना कोई चिकित्सक कैसे हो सकता है?)

    सीख: योग्यता (विद्या) के साथ सेवा-भावना और करुणा ही किसी व्यक्ति को सच्चा चिकित्सक और सच्चा मनुष्य बनाती है।

    शब्दार्थ

  • उपाधिम् – डिग्री (Degree)
  • पदवीम् – पदनाम, पद (Designation)
  • मानवीयाः – मनुष्यों में होने वाले (Humane)
  • रसायनशास्त्रज्ञः – रसायन शास्त्र का विशेषज्ञ; चिकित्सकः = भिषक्, वैद्य
  • प्रयोगशालायाम् – प्रयोगशाला में (अनुसन्धानपरीक्षण-कक्षे)
  • अङ्गीकृतवान् – स्वीकार किया
  • अन्यस्मिन् दिने – अगले दिन
  • राजमार्गः – मुख्य मार्ग, राजमार्ग (Highway)
  • खिन्नः – दुखी (दुःखितः)
  • शक्तवान् – कर सका (समर्थः अभवम्)
  • शोचनीया – दयनीय (दयनीया)
  • निरतः – लीन, मग्न
  • वृत्तान्तम् – घटना, प्रसंग
  • चितवान् – चुना (चयनं कृतवान्)
  • यन्त्रवत् – मशीन की भाँति
  • कषायम् – काढ़ा (क्वाथम्)
  • ध्यान दें: आयुर्वेद में 'रसायनम्' शब्द 'औषधम्' (दवा) के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

    व्याकरण-बिन्दु

    (क) क्तवतु प्रत्यय – भूतकाल का अर्थ

    धातु + क्तवतु से भूतकाल के अर्थ वाले पद बनते हैं। ये लिङ्ग के अनुसार बदलते हैं (पुरुष के अनुसार नहीं):

  • पुंलिङ्ग: पठितवान् (एकवचन), पठितवन्तः (बहुवचन)
  • स्त्रीलिङ्ग: पठितवती (एकवचन), पठितवत्यः (बहुवचन)
  • उदाहरण – सः पठितवान्। छात्राः पठितवन्तः। सा पठितवती। बालिकाः पठितवत्यः। त्वं/अहं पठितवान् (बालक) या पठितवती (बालिका)।

    (ख) 'स्म' अव्यय से भूतकाल

    वर्तमानकाल की क्रिया के साथ स्म जोड़ने पर भूतकाल का अर्थ होता है – सः बाल्ये पुस्तकानि पठति स्म (= अपठत्)।

    (ग) भूतकाल बताने के तीन तरीके (पाठ की सारणी से)

  • गम् – गच्छति → अगच्छत् / गतवान्, गतवती / गच्छति स्म
  • लिख् – लिखति → अलिखत् / लिखितवान्, लिखितवती / लिखति स्म
  • गा – गायति → अगायत् / गीतवान्, गीतवती
  • पा – पिबति → अपिबत् / पीतवान्, पीतवती
  • श्रु – शृणोति → अशृणोत् / श्रुतवान्, श्रुतवती
  • दा – ददाति → अददात् / दत्तवान्, दत्तवती
  • ज्ञा – जानाति → अजानात् / ज्ञातवान्, ज्ञातवती
  • कृ – करोति → अकरोत् / कृतवान्, कृतवती
  • दृश् – पश्यति → अपश्यत् / दृष्टवान्, दृष्टवती
  • स्था – तिष्ठति → अतिष्ठत् / स्थितवान्, स्थितवती
  • योग्यताविस्तर – स्वास्थ्य-रक्षा के नियम

    ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।
    सर्वमेव परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् ॥

    (आयु की रक्षा के लिए स्वस्थ व्यक्ति ब्राह्म मुहूर्त में उठे; सब कुछ छोड़कर भी शरीर की रक्षा करे।)

    भोजनान्ते पिबेत् तक्रं वासरान्ते पिबेत्पयः ।
    निशान्ते च पिबेत् वारि त्रिभी रोगो न जायते ॥

    (भोजन के अंत में छाछ, दिन के अंत में दूध और रात के अंत में (सुबह) पानी पीने से रोग नहीं होता।)

    अभ्यास-संकेत

  • एकपद उत्तर: प्रसिद्ध चिकित्सक – नागार्जुनः; कौन खिन्न था – द्वितीयः युवकः; रोगी की स्थिति – शोचनीया; किसे चुना – द्वितीयं युवकम्; किसके बिना चिकित्सक नहीं – सेवाभावनां विना; किस मार्ग से जाने को कहा – राजमार्गेण।
  • स्त्रीलिङ्ग रूप: गतवान् → गतवती/गतवत्यः; लिखितवान् → लिखितवती/लिखितवत्यः; हसितवान् → हसितवती/हसितवत्यः।
  • वाक्य-परिवर्तन (वर्तमान → क्तवतु): युवकः आपणं गच्छति → युवकः आपणं गतवान्; महिला वस्त्रं ददाति → महिला वस्त्रं दत्तवती; अश्वाः वने धावन्ति → अश्वाः वने धावितवन्तः; बालिकाः शीघ्रम् आगच्छन्ति → बालिकाः शीघ्रम् आगतवत्यः।
  • 'स्म' वाला अनुच्छेद: कोष्ठक के धातु से लट् रूप बनाकर 'स्म' जोड़ें – जैसे कृषकः प्रतिदिनं कृषिक्षेत्रं गच्छति स्म।
  • सामान्य भूलें

  • क्तवतु रूप को पुरुष के अनुसार बदलना – 'अहं पठितवामि' गलत है; सही है अहं पठितवान्/पठितवती।
  • स्त्रीलिङ्ग बहुवचन में 'पठितवन्त्यः' लिखना – सही है पठितवत्यः।
  • अनियमित रूपों में भूल – पा → पीतवान् (पिबितवान् नहीं), दृश् → दृष्टवान्, दा → दत्तवान्।
  • कथा में युवकों की भूमिका उलटना – औषध पहला युवक लाया, पर चुना गया दूसरा (सेवा करने वाला)।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓सफलता के लिए विद्या, उपाधि, पद और धन के साथ सत्य, करुणा, सेवा, परोपकार जैसे मानवीय गुण भी आवश्यक हैं
    • ✓नागार्जुन ने औषध न ला सकने वाले पर रोगी की सेवा करने वाले युवक को सहायक चुना – सेवा-भावना के बिना चिकित्सक नहीं
    • ✓धातु + क्तवतु से भूतकाल: पठितवान्/पठितवन्तः (पुं.), पठितवती/पठितवत्यः (स्त्री.)
    • ✓वर्तमान क्रिया + 'स्म' से भी भूतकाल का अर्थ – पठति स्म = अपठत्
    • ✓लङ् लकार, क्तवतु और 'स्म' – भूतकाल बताने के तीनों तरीकों का अभ्यास (गम्, पा, दृश्, दा आदि)

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पाठ से पहले पूछें – 'सफल व्यक्ति में क्या-क्या होना चाहिए?' – उत्तरों को विद्या/धन और मानवीय गुणों के दो कॉलम में लिखें
    • →नागार्जुन की कथा का तीन पात्रों (नागार्जुन, पहला युवक, दूसरा युवक) वाला छोटा नाट्य-रूपांतरण कराएँ
    • →कथा के अंत से पहले रुककर पूछें – 'आप नागार्जुन होते तो किसे चुनते और क्यों?'
    • →क्तवतु रूपों के लिए लड़के-लड़कियों से स्वयं के बारे में बुलवाएँ – 'अहं भोजनं कृतवान्/कृतवती'
    • →बोर्ड पर लट् → लङ् → क्तवतु → स्म की चार-खाने वाली सूची बनाकर दस धातुओं से भरवाएँ
    • →योग्यताविस्तर के स्वास्थ्य-श्लोकों का सस्वर पाठ कराएँ और आयुर्वेदीय पौधों (बिल्व, लवङ्ग) की सूची बनवाएँ
    • →परियोजना: परिवार या समाज में सेवा करने वाले दो लोगों का परिचय लिखवाएँ

    📋 Assessment Questions

    1. नागार्जुन ने दोनों युवकों को राजमार्ग से जाने को क्यों कहा था?
    2. पहले युवक को सहायक क्यों नहीं चुना गया? पाठ के शब्दों में बताइए।
    3. 'बालिका पुस्तकं पठति' को क्तवतु प्रत्यय से भूतकाल में बदलिए।
    4. 'गच्छति स्म' का लङ् लकार और क्तवतु (पुंलिङ्ग) रूप लिखिए।
    5. पाठ में बताए गए कोई चार मानवीय गुण संस्कृत में लिखिए।

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