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नौबतखाने में इबादत – Class 10 Hindi Chapter 11 Notes & NCERT PDF

Class 10HindiChapter 11NCERT book: क्षितिज भाग 2 (Kshitij) - Hindi Class 10

Notes and a simple summary of Chapter 11 of the NCERT Class 10 Hindi book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

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पाठ 11: नौबतखाने में इबादत

लेखक-परिचय

यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। वे अर्द्धवार्षिक पत्रिका 'सहित' का संपादन करते हैं और सन् 1999 से साहित्य-कलाओं के लिए 'विमला देवी फाउंडेशन' का संचालन कर रहे हैं।

  • काव्य-संग्रह: यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप
  • अन्य: शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी पर पुस्तक 'गिरिजा'; द्विजदेव ग्रंथावली (2000) का सह-संपादन; स्पिक मैके के लिए 'थाती' का संपादन
  • सम्मान: भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान
  • पाठ-परिचय

    'नौबतखाने में इबादत' प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर लिखा गया व्यक्ति-चित्र है। इसमें उनकी रुचियों, अंतर्मन की बुनावट, संगीत-साधना और लगन को संवेदनशील भाषा में व्यक्त किया गया है। लेखक बताते हैं कि संगीत एक आराधना है — इसका शास्त्र है, अभ्यास ज़रूरी है, गुरु-शिष्य परंपरा, पूर्ण तन्मयता, धैर्य और मंथन ज़रूरी है। बिस्मिल्ला खाँ में यही लगन थी; इसीलिए 80 वर्ष की उम्र में भी उनकी साधना चलती रही।

    पाठ-सार

    बचपन और काशी

  • समय: सन् 1916 से 1922 के आसपास की काशी। स्थान: पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी का नौबतखाना।
  • बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन। छह साल के अमीरुद्दीन और नौ साल के बड़े भाई शम्सुद्दीन के मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श देश के जाने-माने शहनाई वादक थे।
  • जन्म डुमराँव (बिहार) में। पिता उस्ताद पैगंबरबख्श खाँ, माँ मिट्ठन; परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ। 5-6 वर्ष डुमराँव में बिताकर वे ननिहाल काशी आ गए।
  • डुमराँव और शहनाई

    शहनाई में रीड लगती है जो नरकट (एक प्रकार की घास) से बनती है; यह नरकट डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारे मिलता है। इसलिए शहनाई की दुनिया में डुमराँव याद किया जाता है — और इसलिए भी कि बिस्मिल्ला खाँ का जन्म वहीं हुआ।

    रसूलनबाई और बतूलनबाई

    चौदह साल की उम्र में बालाजी मंदिर रियाज़ के लिए जाते समय अमीरुद्दीन रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर वाले रास्ते से जाना पसंद करते थे, जहाँ ठुमरी, टप्पे, दादरा सुनाई देते। खाँ साहब ने माना कि संगीत के प्रति आरंभिक आसक्ति इन्हीं गायिका बहिनों से मिली।

    शहनाई: 'सुषिर वाद्यों में शाह'

  • वैदिक इतिहास में शहनाई का उल्लेख नहीं। फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य सुषिर-वाद्य कहलाते हैं। अरब देश में नाड़ी (रीड) वाले वाद्य को 'नय' कहते हैं; शहनाई को 'शाहेनय' अर्थात् 'सुषिर वाद्यों में शाह' की उपाधि मिली।
  • सोलहवीं शताब्दी में तानसेन की बंदिश ('संगीत राग कल्पद्रुम' से) में शहनाई का वर्णन है। अवधी लोकगीतों और चैती में इसका बार-बार उल्लेख है; यह मांगलिक अवसरों का वाद्य है — दक्षिण के नागस्वरम् की तरह।
  • सुर की इबादत

    अस्सी बरस से वे खुदा से सच्चा सुर माँगते रहे:

    "मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।"

    लेखक कहते हैं — जैसे हिरन अपनी ही महक (कस्तूरी) खोजता फिरता है, वैसे ही खाँ साहब सोचते रहे कि सातों सुरों को बरतने की तमीज़ उन्हें अभी तक क्यों नहीं आई। यह उनकी विनम्रता है।

    मुहर्रम से जुड़ाव

    मुहर्रम के दस दिन उनके खानदान में न शहनाई बजती, न किसी कार्यक्रम में भाग लिया जाता। आठवीं तारीख को खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते। उस दिन कोई राग नहीं बजता।

    जवानी की यादें और बालसुलभ हँसी

  • कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी — 'संगीतमय कचौड़ी', क्योंकि घी में कचौड़ी डालते समय की छन्न की आवाज़ में उन्हें आरोह-अवरोह सुनाई देते।
  • फ़िल्मों के शौक़ीन — सुलोचना पसंदीदा हीरोइन; गीताबाली भी। थर्ड क्लास का टिकट छह पैसे — दो-दो पैसे मामू, मौसी और नानी से। बालाजी मंदिर पर शहनाई बजाने की अठन्नी मज़दूरी से फ़िल्म देखते।
  • बचपन में नाना की 'मीठी शहनाई' ढूँढ़ते; मामू के सम पर आने पर पत्थर पटककर दाद देते।
  • गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक

  • संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती पर पाँच दिन के संगीत-आयोजन में वे अवश्य रहते।
  • काशी से बाहर होते तो विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके शहनाई का प्याला घुमाते।
  • "मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी... शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं।"
  • दुनिया कहती "सुबहान अल्लाह", वे कहते "अलहमदुलिल्लाह"।
  • फटी तहमद

    भारतरत्न मिलने के बाद एक शिष्या ने फटी तहमद पर टोका, तो बोले:

    "धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं... मालिक से यही दुआ है, फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।"

    बदलती काशी का दुख

    सन् 2000 तक पक्का महाल से मलाई बरफ़ बेचने वाले चले गए; देशी घी, कचौड़ी-जलेबी का स्वाद, संगतियों के प्रति आदर, घंटों का रियाज़, कजली-चैती का ज़माना — सब खो रहा था। यह उन्हें व्यथित करता था।

    सम्मान और विदा

    भारतरत्न, पद्मविभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और अनेक मानद उपाधियाँ मिलीं। 21 अगस्त 2006 को नब्बे वर्ष की आयु में वे विदा हुए। उनकी सबसे बड़ी देन — पूरे अस्सी बरस संगीत को संपूर्णता से सीखने की जिजीविषा।

    व्यक्ति-चित्रण: बिस्मिल्ला खाँ

  • सच्चे साधक — अस्सी बरस भी स्वयं को अधूरा मानते रहे।
  • विनम्र और सरल — फटी तहमद, बालसुलभ हँसी।
  • धर्मनिष्ठ पर उदार — पाँचों वक्त की नमाज़ और काशी विश्वनाथ, बालाजी के प्रति श्रद्धा।
  • मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक — मुहर्रम और संकटमोचन, दोनों से जुड़ाव।
  • काशी-प्रेमी — काशी छोड़ने को तैयार नहीं।
  • शब्दार्थ

  • ड्योढ़ी — दहलीज़
  • नौबतखाना — प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान
  • रियाज़ — अभ्यास
  • सुषिर-वाद्य — फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य
  • नेमत — ईश्वर की देन
  • सजदा — माथा टेकना
  • इबादत — उपासना
  • तासीर — गुण, प्रभाव
  • अज़ादारी — मातम करना
  • गमक — खुशबू, सुगंध
  • बदस्तूर — कायदे से
  • दाद — शाबासी
  • जिजीविषा — जीने की इच्छा
  • सम — ताल का वह स्थान जहाँ लय की समाप्ति और ताल का आरंभ होता है
  • भाषा-बिन्दु

  • मिश्र वाक्य और उपवाक्य: "यह ज़रूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं" — संज्ञा उपवाक्य; "रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है" — विशेषण उपवाक्य।
  • भाषा में उर्दू-फ़ारसी (इबादत, तासीर, नेमत) और बनारसी बोली ("ई भारतरत्न... लुंगिया पे नाहीं") का सुंदर मेल।
  • वाद्यों की चार श्रेणियाँ: तत (वीणा, सितार), सुषिर (बाँसुरी, शहनाई), घन (झाँझ, मंजीरा), अवनद्ध (तबला, ढोलक, मृदंग)।
  • केन्द्रीय भाव

    कला साधना है, दिखावा नहीं। सच्चा कलाकार विनम्र रहता है और जीवन भर सीखता है। बिस्मिल्ला खाँ हिंदू-मुस्लिम एकता और काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति के जीवंत प्रतीक थे।

    बोर्ड परीक्षा हेतु

  • डुमराँव क्यों याद किया जाता है: रीड के लिए नरकट सोन नदी किनारे मिलता है + बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान।
  • मंगलध्वनि के नायक क्यों: शहनाई मांगलिक वाद्य है और वे उसके सर्वश्रेष्ठ वादक थे।
  • 'शाहेनय' की उपाधि: सुषिर वाद्यों में सबसे मधुर और प्रमुख होने के कारण।
  • मिली-जुली संस्कृति के प्रसंग: मुहर्रम का नौहा + संकटमोचन मंदिर, विश्वनाथ-बालाजी की ओर शहनाई।
  • सच्चे इनसान: फटी तहमद प्रसंग, विनम्र दुआ, काशी-प्रेम।
  • सामान्य भूलें

  • बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान काशी लिख देना — जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ।
  • 'नौबतखाना' को संगीत-विद्यालय समझना — यह प्रवेश-द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान है।
  • मुहर्रम की आठवीं तारीख पर 'राग' बजाने की बात लिखना — उस दिन नौहा बजता है, राग नहीं।
  • रसूलनबाई-बतूलनबाई को उनकी गुरु लिखना — वे प्रेरणा थीं; उस्ताद मामू अलीबख्श थे।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓व्यक्ति-चित्र विधा और बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की विशेषताएँ समझना
    • ✓शहनाई, सुषिर-वाद्य, रीड-नरकट और डुमराँव के संबंध को जानना
    • ✓संगीत को साधना और इबादत के रूप में देखने की दृष्टि विकसित करना
    • ✓बिस्मिल्ला खाँ को गंगा-जमुनी (मिली-जुली) संस्कृति के प्रतीक के रूप में पहचानना
    • ✓मिश्र वाक्यों के उपवाक्य पहचानना और उर्दू-बनारसी मिश्रित भाषा की विशेषता समझना

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कक्षा में बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई की कोई रिकॉर्डिंग सुनाकर पाठ आरंभ करें
    • →भारत के मानचित्र पर डुमराँव, सोन नदी और काशी चिह्नित करवाएँ
    • →वाद्यों की चार श्रेणियों (तत, सुषिर, घन, अवनद्ध) का चार्ट बनवाएँ
    • →'मिली-जुली संस्कृति' के प्रसंग विद्यार्थियों से पाठ में खोजकर सूचीबद्ध करवाएँ
    • →फटी तहमद वाले संवाद का अभिनय करवाकर उनकी सादगी पर चर्चा करें
    • →किसी प्रिय संगीतकार पर अनुच्छेद और शहनाई कार्यक्रम का नोटिस लिखवाएँ
    • →मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छाँटने का अभ्यास पाठ के वाक्यों से करवाएँ

    📋 Assessment Questions

    1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?
    2. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?
    3. किन प्रसंगों से पता चलता है कि बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे?
    4. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
    5. 'फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है...' — आशय स्पष्ट कीजिए

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