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यह दंतुरित मुसकान / फ़सल – Class 10 Hindi Chapter 5 Notes & NCERT PDF

Class 10HindiChapter 5NCERT book: क्षितिज भाग 2 (Kshitij) - Hindi Class 10

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पाठ 5: यह दंतुरित मुसकान / फ़सल

कवि-परिचय

नागार्जुन का जन्म बिहार के दरभंगा ज़िले के सतलखा गाँव में सन् 1911 में हुआ। उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। आरंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई, फिर वे बनारस और कलकत्ता (कोलकाता) पढ़ने गए। सन् 1936 में वे श्रीलंका गए और वहीं बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए; दो साल बाद 1938 में स्वदेश लौटे। घुमक्कड़ और अक्खड़ स्वभाव के नागार्जुन ने अनेक बार पूरे भारत की यात्रा की। सन् 1998 में उनका देहांत हुआ।

  • प्रमुख काव्य-कृतियाँ: युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा
  • संपूर्ण कृतित्व 'नागार्जुन रचनावली' के सात खंडों में।
  • सम्मान: हिंदी अकादमी दिल्ली का शिखर सम्मान, उत्तर प्रदेश का भारत भारती पुरस्कार, बिहार का राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार; मैथिली कविता के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार।
  • मैथिली में वे 'यात्री' नाम से प्रतिष्ठित हैं। व्यंग्य में माहिर होने के कारण उन्हें 'आधुनिक कबीर' कहा जाता है; वे सच्चे अर्थों में जनकवि हैं।
  • कविता 1 — यह दंतुरित मुसकान

    परिचय

    छोटे बच्चे की मनोहारी मुसकान देखकर कवि के मन में उमड़े भावों को अनेक बिंबों के माध्यम से प्रकट किया गया है। कवि मानता है कि इस सुंदरता में ही जीवन का संदेश है — यह कठोर से कठोर मन को भी पिघला देती है।

    तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
    मृतक में भी डाल देगी जान
    धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात...
    छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात

    भावार्थ: नए-नए दाँतों वाली (दंतुरित) तुम्हारी मुसकान इतनी जीवंत है कि मुर्दे में भी जान डाल दे। धूल से सने तुम्हारे अंग ऐसे लगते हैं मानो कमल (जलजात) तालाब छोड़कर मेरी झोंपड़ी में खिल गए हों।

    परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
    पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण
    छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
    बाँस था कि बबूल?

    भावार्थ: तुम्हारे स्पर्श से कठोर पत्थर (कठोर हृदय) भी पिघलकर जल बन गया होगा। तुम्हें छूकर तो बाँस या बबूल जैसे नीरस, कँटीले पेड़ से भी शेफालिका के फूल झरने लगते हैं — अर्थात् कवि जैसा रूखा मन भी कोमल हो गया।

    तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
    देखते ही रहोगे अनिमेष!
    थक गए हो?
    आँख लूँ मैं फेर?

    भावार्थ: बच्चा कवि को पहचान नहीं पाता और अनिमेष (बिना पलक झपकाए) देखता रहता है। कवि स्नेह से पूछता है — थक गए हो? क्या मैं अपनी आँखें फेर लूँ?

    यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
    मैं न सकता देख
    मैं न पाता जान
    तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
    धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
    चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!

    भावार्थ: यदि माँ माध्यम न बनती तो कवि यह मुसकान न देख पाता। कवि बच्चे और उसकी माँ दोनों को धन्य मानता है। स्वयं को चिर प्रवासी (लंबे समय से बाहर रहने वाला) और इतर/अन्य (पराया) कहता है।

    उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क
    देखते तुम इधर कनखी मार
    और होतीं जब कि आँखें चार
    तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
    मुझे लगती बड़ी ही छविमान!

    भावार्थ: माँ की उँगलियाँ बच्चे को मधुपर्क (आत्मीय स्नेह का अमृत) चटाती रही हैं। बच्चा कनखी (तिरछी नज़र) से कवि को देखता है; जब आँखें मिलती हैं, तब उसकी दंतुरित मुसकान बहुत सुंदर (छविमान) लगती है।

    कविता 2 — फ़सल

    परिचय

    कविता बताती है कि फ़सल क्या है और उसे पैदा करने में किन तत्वों का योगदान है। प्रकृति और मनुष्य के सहयोग से ही सृजन संभव है। यह कविता उपभोक्ता-संस्कृति के दौर में हमें कृषि-संस्कृति के निकट ले जाती है।

    एक के नहीं,
    दो के नहीं,
    ढेर सारी नदियों के पानी का जादू:
    एक के नहीं,
    दो के नहीं,
    लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा:
    एक की नहीं,
    दो की नहीं,
    हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म:
    फ़सल क्या है?
    और तो कुछ नहीं है वह
    नदियों के पानी का जादू है वह
    हाथों के स्पर्श की महिमा है
    भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
    रूपांतर है सूरज की किरणों का
    सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

    भावार्थ: फ़सल अनेक नदियों के पानी का जादू, करोड़ों किसानों के श्रम (हाथों के स्पर्श) की गरिमा और हज़ारों खेतों की मिट्टी के गुण-धर्म का परिणाम है। वह सूरज की किरणों का रूपांतर (प्रकाश-संश्लेषण से बनी ऊर्जा) है और हवा की थिरकन सिमटकर उसमें समा गई है।

    फ़सल उपजाने के आवश्यक तत्व

    पानी (नदियाँ), मानव-श्रम (हाथों का स्पर्श), मिट्टी, सूरज की किरणें (धूप) और हवा।

    शब्दार्थ (शब्द-संपदा)

  • दंतुरित — बच्चों के नए-नए दाँत
  • धूलि-धूसर गात — धूल-मिट्टी से सने अंग-प्रत्यंग
  • जलजात — कमल का फूल
  • पाषाण — पत्थर
  • शेफालिका — हरसिंगार का फूल
  • अनिमेष — बिना पलक झपकाए लगातार देखना
  • इतर — दूसरा
  • चिर प्रवासी — लंबे समय से घर से दूर रहने वाला
  • मधुपर्क — दही, घी, शहद, जल और दूध का योग (पंचामृत); कविता में माँ के आत्मीय प्यार के रूप में
  • कनखी — तिरछी निगाह से देखना
  • छविमान — सुंदर
  • रूपांतर — बदला हुआ रूप
  • संदली — चंदन के रंग की
  • काव्य-सौन्दर्य

  • दंतुरित मुसकान: वात्सल्य रस; सजीव बिंब (जलजात, शेफालिका, पिघलता पाषाण); अतिशयोक्ति — "मृतक में भी डाल देगी जान"; अनुप्रास — "धूलि-धूसर"; प्रश्न-शैली ("बाँस था कि बबूल?")। तत्सम और बोलचाल के शब्दों का मेल; मुक्त छंद।
  • फ़सल: बोलचाल की भाषा की गति और लय; पुनरावृत्ति ("एक के नहीं, दो के नहीं") से प्रभाव; मानवीकरण/प्रतीक — "हवा की थिरकन", "सूरज की किरणों का रूपांतर"; प्रश्नोत्तर शैली।
  • बोर्ड परीक्षा हेतु

  • प्र. बच्चे की मुसकान का कवि के मन पर प्रभाव? — कवि का कठोर, नीरस मन भी कोमल और प्रसन्न हो उठता है; उसे जीवन का संदेश मिलता है।
  • प्र. बच्चे और बड़े की मुसकान में अंतर? — बच्चे की मुसकान निश्छल, स्वाभाविक, स्वार्थरहित; बड़े की मुसकान में अक्सर औपचारिकता या स्वार्थ होता है।
  • प्र. भाव स्पष्ट करें — "छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात" — धूल-सने बच्चे का सौंदर्य ऐसा है मानो कमल तालाब छोड़कर झोंपड़ी में खिल गए हों।
  • प्र. कवि के अनुसार फ़सल क्या है? — पानी, मिट्टी, धूप, हवा और मानव-श्रम के सहयोग का परिणाम।
  • प्र. "हाथों के स्पर्श की गरिमा/महिमा" से आशय? — किसानों का परिश्रम ही फ़सल को संभव बनाता है; उनका श्रम गौरवपूर्ण है।
  • प्र. भाव स्पष्ट करें — "रूपांतर है सूरज की किरणों का, सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का" — धूप और हवा का योगदान फ़सल में रूप बदलकर समाया हुआ है।
  • सामान्य भूलें

  • 'दंतुरित' का अर्थ 'दाँत दिखाना' लिखना — सही अर्थ नए-नए दाँतों वाला है।
  • 'मधुपर्क' को केवल शहद लिखना — यह पंचामृत, और कविता में माँ का स्नेह है।
  • फ़सल को केवल किसान की उपज मानना — कवि के अनुसार यह प्रकृति और मनुष्य दोनों के सहयोग से बनती है।
  • नागार्जुन का मूल नाम भूलना — वैद्यनाथ मिश्र; मैथिली में उपनाम 'यात्री'।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓'यह दंतुरित मुसकान' में बच्चे की निश्छल मुसकान को जीवन-संदेश के रूप में सजीव बिंबों से चित्रित किया गया है।
    • ✓बच्चे की मुसकान कठोर मन को भी कोमल बना देती है — 'बाँस था कि बबूल?' इसका सुंदर प्रमाण है।
    • ✓'फ़सल' बताती है कि फ़सल पानी, मिट्टी, धूप, हवा और मानव-श्रम के सहयोग का परिणाम है।
    • ✓कविता किसानों के श्रम ('हाथों के स्पर्श की गरिमा') को सम्मान देती है और कृषि-संस्कृति के निकट ले जाती है।
    • ✓नागार्जुन जनकवि और 'आधुनिक कबीर' कहे जाते हैं; मैथिली में वे 'यात्री' नाम से लिखते थे।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कक्षा में किसी छोटे बच्चे की मुसकान से जुड़े अनुभव साझा करवाकर कविता से जोड़ें।
    • →कविता के बिंबों (जलजात, शेफालिका, पिघलता पाषाण) की सूची बनवाकर चित्रांकन कराएँ।
    • →'फ़सल' के लिए पाँच तत्वों (पानी, मिट्टी, धूप, हवा, श्रम) का चार्ट बनवाएँ।
    • →विज्ञान से जोड़ें — 'सूरज की किरणों का रूपांतर' को प्रकाश-संश्लेषण के संदर्भ में समझाएँ।
    • →'एक के नहीं, दो के नहीं' की पुनरावृत्ति को समूह-वाचन में पढ़वाएँ।
    • →किसानों की स्थिति पर संपादक को पत्र लिखने की पाठेतर गतिविधि कराएँ।
    • →फ़सल उत्पादन में महिलाओं के योगदान पर कक्षा-चर्चा आयोजित करें।

    📋 Assessment Questions

    1. बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
    2. 'छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात' का भाव स्पष्ट कीजिए।
    3. कवि के अनुसार फ़सल क्या है? उसके आवश्यक तत्व बताइए।
    4. 'हाथों के स्पर्श की गरिमा' से कवि क्या कहना चाहता है?
    5. दोनों कविताओं के शिल्प की दो-दो विशेषताएँ लिखिए।

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