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पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके – Class 12 Hindi Chapter 11 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 11NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

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पाठ 11: पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके

परिचय

'सुमिरिनी के मनके' पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी के तीन लघु निबंधों का संकलन है: (क) बालक बच गया, (ख) घड़ी के पुर्ज़े, (ग) ढेले चुन लो। 'सुमिरिनी' जप की छोटी माला को कहते हैं और 'मनके' उसके दाने हैं। जैसे माला का हर मनका अलग होकर भी एक धागे में पिरोया होता है, वैसे ही ये तीनों निबंध अलग विषयों पर हैं, पर तीनों समाज की मूल समस्याओं (शिक्षा, धर्म और अंधविश्वास) पर विचार करते हैं। तीनों में व्यंग्य है और तीनों पाठक को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।

लेखक परिचय

  • जीवनकाल: पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी (सन् 1883–1922)। जन्म पुरानी बस्ती, जयपुर में।
  • बहुभाषाविद्: संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्रज, अवधी, मराठी, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी, बाँग्ला के साथ अंग्रेज़ी, लैटिन और फ़्रेंच में भी अच्छी गति। प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व और भाषा विज्ञान में गहरी रुचि।
  • सृजन के चार पड़ाव (पत्रिकाएँ): समालोचक (1903–06), मर्यादा (1911–12), प्रतिभा (1918–20) और नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1920–22)।
  • कहानियाँ: सुखमय जीवन, बुद्धू का काँटा और उसने कहा था। 'उसने कहा था' तो गुलेरी जी का पर्याय ही बन चुकी है।
  • सम्मान और कार्य: 1904 से 1922 तक अनेक संस्थानों में अध्यापन; 'इतिहास दिवाकर' की उपाधि; पं. मदन मोहन मालवीय के आग्रह पर 11 फ़रवरी 1922 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य बने।
  • भाषा-शैली: सरल, बोलचाल की, फिर भी गंभीर ढंग से विषय-प्रवर्तन करने वाली; व्यंग्य, दृष्टांत और उद्धरणों से भरपूर।
  • पाठ का सार

    (क) बालक बच गया: शिक्षा ग्रहण की सही उम्र

    एक पाठशाला के वार्षिकोत्सव में प्रधान अध्यापक का आठ वर्ष का इकलौता पुत्र "नुमाइश में मिस्टर हादी के कोल्हू की तरह" दिखाया जा रहा था। उसका मुँह पीला था, आँखें सफ़ेद थीं और दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी। उससे उम्र से बहुत ऊपर के प्रश्न पूछे गए: धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, चार डिग्री से नीचे पानी के फैलने से मछलियों की प्राणरक्षा, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, अभाव को पदार्थ मानने का शास्त्रार्थ, इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम और पेशवाओं का कुर्सीनामा। "तू क्या करेगा?" पूछने पर उसने रटा हुआ उत्तर दिया: "मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा।"

    एक वृद्ध महाशय ने कहा कि जो इनाम माँगे, वही मिलेगा। बालक के चेहरे पर "कृत्रिम और स्वाभाविक भावों की लड़ाई" दिखी और अंत में उसने धीरे से कहा, "लड्डू"। पिता और अध्यापक निराश हो गए, पर लेखक ने सुख की साँस ली, क्योंकि बालक की स्वाभाविक प्रवृत्ति अभी जीवित थी: "वह 'लड्डू' की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखाने वाली खड़खड़ाहट नहीं।"

    मूल भाव: शिक्षा व्यक्ति के मानस के विकास के लिए है, मनुष्य शिक्षा के लिए नहीं। शिक्षा बच्चे पर लादनी नहीं चाहिए, बल्कि उसके मन में रुचि के बीज डालने चाहिए: "सहज पके सो मीठा होय।"

    (ख) घड़ी के पुर्ज़े: धर्म के रहस्य पर एकाधिकार

    धर्मोपदेशक कहते हैं कि धर्म के रहस्य हर कोई न जाने; जो कहा जाए, उसे "कान ढलकाकर" सुन लो। इसके लिए घड़ी का दृष्टांत दिया जाता है: समय पूछ लो या घड़ी देखना सीख लो, पर घड़ी का पीछा खोलकर पुर्ज़े देखना तुम्हारा काम नहीं; यह "वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है।"

    लेखक इसी दृष्टांत को आगे बढ़ाकर उसे उलट देते हैं:

  • गिनती और अंक हम जानते हैं, सुइयों की चाल देख सकते हैं, तो हमें स्वयं देखने दो।
  • पड़ोस की घड़ियों में दोपहर के बारह बजे हैं और आपकी घड़ी में आधी रात है, तो खोलकर देखने दो कि कौन-सा पेच बिगड़ा है।
  • "अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया है उसे तो देखने दो।"
  • तीखा व्यंग्य: "परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना, तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।"
  • मूल भाव: धर्म पर मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार उसे संकुचित करता है। जिज्ञासा और विवेक पर रोक लगाना उचित नहीं।

    (ग) ढेले चुन लो: अंधविश्वास पर चोट

    लेखक शेक्सपियर के नाटक 'मर्चेंट ऑफ़ वेनिस' और उसके भारतेंदु-कृत रूपांतर 'दुर्लभ बंधु' से आरंभ करते हैं। पुरश्री (पोर्शिया) के सामने तीन पेटियाँ हैं (सोने, चाँदी और लोहे की) और एक में उसकी प्रतिमूर्ति है। अकड़बाज़ सोना चुनकर लौटता है, लोभी को चाँदी की पिटारी अँगूठा दिखाती है और सच्चा प्रेमी लोहे को छूकर "पहिला इनाम" पाता है।

    ऐसी ही "लाटरी" वैदिक काल में चलती थी। स्नातक कन्या के पिता के यहाँ जाकर गौ भेंट करता और कन्या के सामने कुछ मिट्टी के ढेले रख देता। कहीं सात होते, कहीं कम, कहीं ज़्यादा। कन्या को एक उठाना होता:

  • वेदि की मिट्टी: संतान 'वैदिक पंडित' होगी।
  • गोबर (गौशाला): 'पशुओं का धनी' होगा।
  • खेत की मिट्टी: 'ज़मींदार पुत्र' होगा।
  • मसान की मिट्टी: बड़ा अशुभ माना जाता था; पर वह कन्या किसी दूसरे नर के सामने वेदि का ढेला उठाकर ब्याही जा सकती थी।
  • इस प्रथा का उल्लेख आश्वलायन, गोभिल, भारद्वाज आदि गृह्यसूत्रों में है। लेखक व्यंग्य करते हैं: जीवनसाथी का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं, पर लाखों कोस दूर के "मिट्टी और आग के ढेलों" (मंगल, शनैश्चर, बृहस्पति) की "कल्पित चाल के कल्पित हिसाब" पर भरोसा करना कैसे अच्छा है? वात्स्यायन के अनुसार "आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से", और कबीर का दोहा:

    पत्थर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार।
    इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।

    मूल भाव: ज्योतिष और लोक-विश्वासों में छिपे अंधविश्वास पर व्यंग्य, और विवेक तथा प्रत्यक्ष अनुभव का समर्थन।

    विषय-विश्लेषण

  • शिक्षा: रटंत विद्या बच्चे की स्वाभाविकता को मारती है। 'लर्निंग आउटकम' उम्र के अनुकूल होने चाहिए।
  • धर्म: धर्म का आम आदमी से जुड़ना उसके विकास का द्योतक है; एकाधिकार उसे जड़ बनाता है।
  • अंधविश्वास: चाहे वैदिक ढेले हों या ग्रह-नक्षत्र, बिना तर्क का भरोसा अविवेक है। इससे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी चर्चा भी जुड़ती है।
  • तीनों निबंधों का सूत्र है विवेक और स्वाभाविकता का समर्थन।
  • भाषा-शैली

  • दृष्टांत शैली: कोल्हू, घड़ी, पेटियाँ और ढेले, सब ठोस उदाहरणों से अमूर्त विचार समझाए गए हैं।
  • व्यंग्य: "पढ़ाई का पुतला", "परदादा की घड़ी", "कल्पित चाल के कल्पित हिसाब"।
  • उद्धरण और संदर्भ: शेक्सपियर, भारतेंदु, गृह्यसूत्र, वात्स्यायन, कबीर। इससे लेखक का व्यापक ज्ञान झलकता है।
  • संस्कृत शब्द (यावज्जन्म, दृष्टांत) और उर्दू-अंग्रेज़ी शब्द (नुमाइश, इम्तहान, लाटरी) साथ-साथ; बोलचाल का प्रवाह।
  • बोर्ड परीक्षा फोकस

  • बालक द्वारा लड्डू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों ली? उत्तर-रूपरेखा: उम्र से ऊपर के प्रश्नों और रटे उत्तरों से लेखक का दम घुट रहा था; 'लड्डू' स्वाभाविक बाल-इच्छा थी; इसका अर्थ था कि बालक की प्रवृत्तियाँ मरी नहीं हैं; 'हरे पत्तों का मर्मर' बनाम 'मरे काठ की खड़खड़ाहट' की व्याख्या।
  • घड़ी के पुर्ज़े का दृष्टांत क्यों दिया गया है? उत्तर-रूपरेखा: धर्माचार्यों का तर्क (रहस्य जानना उनका अधिकार है); लेखक द्वारा दृष्टांत को आगे बढ़ाकर उलटना; योग्य व्यक्ति को जाँचने देने की माँग; परदादा की बंद घड़ी वाला व्यंग्य।
  • वैदिक काल की ढेलों वाली लाटरी: स्नातक, गौ भेंट, ढेलों के प्रकार और उनके फल, गृह्यसूत्रों का उल्लेख, ग्रह-नक्षत्रों पर व्यंग्य।
  • कबीर की साखी की व्याख्या और 'आज का कबूतर...' का आशय भी अकसर पूछा जाता है।
  • कठिन शब्द

  • सुमिरिनी: जप की छोटी माला; मनके: माला के दाने
  • वार्षिकोत्सव: सालाना जलसा
  • नुमाइश: प्रदर्शनी, दिखावा
  • कोल्हू: तेल निकालने की मशीन, जिसमें बैल जोता जाता था
  • यावज्जन्म: जीवनभर
  • उल्लास: खुशी, हर्ष
  • कुर्सीनामा: वंशावली, राज की अवधि का क्रम
  • कान ढलकाकर: कान खोलकर, चुपचाप
  • दृष्टांत: उदाहरण
  • टंटा: झंझट
  • घड़ीसाज़ी: घड़ी बनाने-सुधारने की कला
  • प्रतिमूर्ति: प्रतिमा, हूबहू रूप
  • अकड़बाज़: अपनी ही बात को सही मानने वाला
  • डगले: मिट्टी के ढेले
  • गृह्यसूत्र: गृहस्थ-संस्कारों के नियम बताने वाले वैदिक ग्रंथ
  • सामान्य भूलें

  • 'सुमिरिनी के मनके' को एक निबंध मानना; ये तीन अलग लघु निबंध हैं।
  • बालक की उम्र या पहचान भूलना: वह प्रधान अध्यापक का आठ वर्ष का इकलौता पुत्र था।
  • 'घड़ी के पुर्ज़े' को घड़ी के बारे में निबंध समझना; घड़ी केवल दृष्टांत है, विषय धर्म है।
  • पेटियों के क्रम में गलती: पाठ (भारतेंदु के 'दुर्लभ बंधु') के अनुसार सोना, चाँदी और लोहा। शेक्सपियर के मूल नाटक में तीसरी पेटी सीसे की है, पर उत्तर पाठ के अनुसार ही लिखें।
  • गुलेरी जी की प्रसिद्ध कहानी का नाम 'उसने कहा था' है, 'उसने कहा' नहीं।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓'सुमिरिनी के मनके' में तीन लघु निबंध हैं: बालक बच गया (शिक्षा), घड़ी के पुर्ज़े (धर्म) और ढेले चुन लो (अंधविश्वास)।
    • ✓'बालक बच गया' बताता है कि शिक्षा बच्चे पर लादी न जाए; 'लड्डू' की माँग बालक की स्वाभाविकता के बचे रहने का प्रमाण है।
    • ✓'घड़ी के पुर्ज़े' में लेखक धर्माचार्यों के ही दृष्टांत को उलटकर धर्म पर एकाधिकार और जिज्ञासा पर प्रतिबंध का विरोध करते हैं।
    • ✓'ढेले चुन लो' वैदिक काल की ढेलों वाली 'लाटरी' के सहारे ज्योतिष और लोक-अंधविश्वासों पर व्यंग्य करता है।
    • ✓गुलेरी जी की शैली दृष्टांत, व्यंग्य और उद्धरणों (शेक्सपियर, भारतेंदु, गृह्यसूत्र, वात्स्यायन, कबीर) से समृद्ध है।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कक्षा में एक असली सुमिरिनी या माला दिखाकर शीर्षक की सार्थकता समझाएँ: अलग मनके, एक धागा।
    • →'बालक बच गया' पढ़ाते समय बालक से पूछे गए प्रश्नों की सूची बोर्ड पर लिखकर विद्यार्थियों से पूछें कि आठ वर्ष के बच्चे के लिए इनमें से कौन-से उचित हैं।
    • →रटने बनाम समझने पर कक्षा-संवाद कराएँ (योग्यता-विस्तार का प्रश्न); 'लर्निंग आउटकम' की अवधारणा जोड़ें।
    • →एक पुरानी घड़ी खोलकर या उसका चित्र दिखाकर 'घड़ी के पुर्ज़े' का दृष्टांत और उसका उलटा जाना चरणबद्ध समझाएँ।
    • →'मर्चेंट ऑफ़ वेनिस' की पेटियों वाली कथा संक्षेप में सुनाएँ और तुलना कराएँ कि पेटियों और ढेलों में क्या समानता है।
    • →कबीर की साखी और 'आज का कबूतर...' वाली उक्ति पर व्याख्या-लेखन का अभ्यास कराएँ।
    • →विद्यार्थियों से अपने आस-पास के किसी अंधविश्वास पर छोटा लेख लिखवाएँ और तर्क से उसकी जाँच करवाएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. क्या विद्यार्थी तीनों निबंधों के नाम और उनके मूल प्रतिपाद्य अलग-अलग बता सकता है?
    2. क्या वह 'हरे पत्तों का मधुर मर्मर' और 'मरे काठ की खड़खड़ाहट' के प्रतीकार्थ की व्याख्या कर सकता है?
    3. क्या वह घड़ी के दृष्टांत के दोनों पक्ष (धर्माचार्यों का तर्क और लेखक का प्रत्युत्तर) स्पष्ट कर सकता है?
    4. क्या वह ढेलों के प्रकार और उनसे जुड़ी मान्यताएँ क्रम से लिख सकता है और लेखक के व्यंग्य को पहचान सकता है?
    5. क्या वह पाठ के विचारों को आज की शिक्षा और समाज से जोड़कर अपनी राय तर्कसहित दे सकता है?

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    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
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    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
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    7. 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
    8. 8. विद्यापति – पद
    9. 9. घनानंद – कवित्त
    10. 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
    11. 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
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