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मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा – Class 12 Hindi Chapter 7 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 7NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

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पाठ 7: मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा

परिचय

यह पाठ मलिक मुहम्मद जायसी के प्रसिद्ध प्रबंधकाव्य पद्मावत के "बारहमासा" (नागमती वियोग खंड) के कुछ अंशों से लिया गया है। इसमें राजा रत्नसेन की पहली रानी नागमती की विरह-दशा का वर्णन है। रत्नसेन पद्मावती की खोज में सिंहल चले गए हैं और नागमती चित्तौड़ में अकेली है। पाठ में चार अंश हैं, जो क्रमशः अगहन, पूस, माघ और फागुन — इन शीत ऋतु के महीनों में नायिका की विरह-व्यथा दिखाते हैं। 'बारहमासा' वह काव्य-परंपरा है जिसमें वर्ष के बारह महीनों की प्रकृति के साथ विरहिणी की दशा का वर्णन होता है।

कवि परिचय

  • जीवनकाल: सन् 1492-1542।
  • अमेठी (उत्तर प्रदेश) के निकट जायस के रहने वाले थे, इसी कारण 'जायसी' कहलाए।
  • अपने समय के सिद्ध और पहुँचे हुए फ़कीर माने जाते थे। उन्होंने सैयद अशरफ़ और शेख बुरहान को अपना गुरु बताया है।
  • सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि। पद्मावत प्रेमाख्यान परंपरा का सर्वश्रेष्ठ प्रबंधकाव्य है।
  • पद्मावत की कथा: भारतीय लोककथा पर आधारित; सिंहल देश की राजकुमारी पद्मावती और चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के प्रेम की कथा। लौकिक कथा में अलौकिक और परोक्ष सत्ता का आभास होता है; रहस्य का गहरा पुट है।
  • शैली: फ़ारसी की मसनवी शैली — कथा सर्गों में नहीं बँटी, लगातार चलती है; बीच-बीच में घटनाओं के शीर्षक हैं। दोहा-चौपाई की शैली अपनाई।
  • भाषा: ठेठ अवधी; काव्य-शैली प्रौढ़ और गंभीर। उपमा, रूपक, लोकोक्तियाँ, मुहावरे — पूरी काव्य-भाषा पर लोक संस्कृति का प्रभाव।
  • रचनाएँ: पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम (प्रसिद्धि का मुख्य आधार पद्मावत)।
  • पाठ का सार और व्याख्या

    अंश 1: अगहन मास

    "अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी॥" अगहन में दिन छोटे और रातें लंबी हो गई हैं; यह कठिन दुख कैसे काटा जाए? नायिका के लिए अब दिन भी विरह के कारण रात बन गया है, और वह दीपक की बाती की तरह विरह में जल रही है। शीत से हृदय काँपता है; प्रिय साथ होते तो ठंड न लगती। घर-घर में सबने (शीत के) वस्त्र सजाए हैं, पर मेरा रूप-रंग तो मेरा स्वामी (नाहू) ले गया। जो बिछुड़कर गया, वह लौटा नहीं; वह लौट आए तो वही रंग फिर आ जाए। "सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा" — यह ठंडी (विरह की) आग विरहिणी का हृदय जलाती है, सुलग-सुलगकर राख कर देती है; प्रिय (कंत) इस दुख को नहीं जानता, यौवन और जीवन भस्म हो रहे हैं।

    दोहा: "पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥" नायिका भौंरे और कौए से कहती है कि प्रिय को संदेश देना: तुम्हारी पत्नी विरह में जलकर मर गई, उसी का धुआँ लगने से हम काले हो गए। भौंरे और कौए के काले रंग का कारण विरह-अग्नि का धुआँ बताना कवि की मौलिक कल्पना है (हेतूत्प्रेक्षा का भाव)।

    अंश 2: पूस मास

    पूस में जाड़े से तन थर-थर काँपता है; सूर्य भी ठिठुरकर लंका की दिशा (दक्षिण) में तापने चला गया है। विरह बढ़कर दारुण शीत बन गया है; नायिका कहती है: काँप-काँपकर मर रही हूँ, (विरह) मेरे प्राण ले रहा है। प्रिय कहाँ हैं कि हृदय से लगूँ; मार्ग अपार है, पास कुछ नहीं सूझता। ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र (सौर-सुपेती) भी ठंडे लगते हैं, मानो सेज हिमालय की बर्फ़ में डूबी हो।

    "चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला॥" चकवी तो रात में बिछुड़कर दिन में (चकवे से) मिल जाती है, पर मैं रात-दिन विरह में कोयल की तरह (पुकारती) हूँ। रात में अकेली हूँ, सखी साथ नहीं; बिछुड़ा पक्षी कैसे जिए? "बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा॥" — विरह रूपी प्रचंड बाज़ शरीर पर मँडराता है; जीते जी खाता है और मरने पर भी नहीं छोड़ेगा।

    दोहा: "रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख॥" रक्त बह गया, माँस गल गया, हड्डियाँ शंख जैसी (सफ़ेद, खोखली) हो गईं; प्रिया सारस की तरह रट-रटकर मर गई, अब आकर उसके पंख समेट लो। (सारस-जोड़ी का प्रेम प्रसिद्ध है; एक के मरने पर दूसरा भी प्राण दे देता है।)

    अंश 3: माघ मास

    माघ लगते ही पाला पड़ने लगा; विरह में यह जाड़ा मृत्यु (काल) बन गया है। तन को रुई से जितना ढँको, हृदय उतना ही अधिक काँपता है। नायिका कहती है: हे नाथ, तुम सूर्य बनकर आओ और तपो; तुम्हारे बिना माघ का जाड़ा नहीं छूटेगा। इसी मास में (शृंगार का) मूल रस उपजता है; तुम भौंरे हो, मेरा यौवन फूल है। आँखों से आँसू माघ की वर्षा (माँहुट) की तरह चूते हैं; उस जल से भीगे वस्त्र शरीर पर बाण जैसे लगते हैं। बूँदें ओलों की तरह टूटकर गिरती हैं; विरह पवन बनकर झकझोरता है। किसके लिए शृंगार करूँ, कौन रेशमी वस्त्र पहने? गले में हार नहीं, (दुबली होकर) मैं स्वयं धागा (डोरा) बन गई हूँ।

    दोहा: "तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराइ कै, चहै उड़ावा झोल॥" हे प्रिय, तुम्हारे बिना पत्नी हल्की हो गई है, शरीर तिनके की तरह डोलता है; उस पर विरह उसे जलाकर राख (झोल) की तरह उड़ा देना चाहता है।

    अंश 4: फागुन मास

    फागुन में पवन के झकोरे चलने लगे; जाड़ा चौगुना हो गया, कैसे सहा जाए? मेरा तन पीले पत्ते जैसा हो गया है; विरह पवन बनकर झकझोर रहा है। पेड़ों के पत्ते झड़ रहे हैं, वन में ढाक पत्ते गिरा रहे हैं; शाखाएँ पत्तों, फूलों और फलों से रहित हो गईं। वनस्पतियाँ नई कोंपलों से उल्लसित हैं, पर मेरे लिए संसार दुगना उदास है। सब मिलकर फाग और चाँचरि खेल रहे हैं, पर मुझे तो मानो होली की तरह हृदय में आग लगा दी गई है। यदि प्रिय को मेरा जलना ही अच्छा लगता है तो जलने-मरने पर भी मुझे क्रोध नहीं।

    दोहा (समर्पण की पराकाष्ठा): "यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ। मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहँ पाउ॥" मैं इस शरीर को जलाकर राख कर दूँ और पवन से कहूँ कि उड़ा ले जाए; कदाचित मैं उस मार्ग पर जा पड़ूँ जहाँ मेरे प्रिय पाँव रखें।

    काव्य-सौंदर्य और शिल्प

  • भाषा: ठेठ अवधी; लोक-शब्द (देवस, सीउ, नाहू, सँदेसड़ा, माँहुट)।
  • छंद: दोहा-चौपाई (मसनवी शैली की प्रबंध-धारा)।
  • रस: वियोग शृंगार; विरह का अतिशयोक्तिपूर्ण और मार्मिक वर्णन।
  • प्रकृति-चित्रण: प्रकृति उद्दीपन रूप में — ऋतु का हर लक्षण विरह को बढ़ाता है (लंबी रातें, पाला, माघ की वर्षा, फागुन की हवा और पतझड़)।
  • अलंकार:
  • - "जरै बिरह ज्यों दीपक बाती" — उपमा।

    - "बिरह सचान" — रूपक (विरह रूपी बाज़); "विरह पवन होइ" — रूपक।

    - "सुलगि सुलगि", "कँपि कँपि", "हहलि हहलि" — पुनरुक्तिप्रकाश।

    - "जानहुँ सेज हिवंचल बूड़ी" — उत्प्रेक्षा।

    - "हाड़ भए सब संख", "रकत ढरा माँसू गरा" — अतिशयोक्ति।

    - "तूँ सो भँवर मोर जोबन फूलू" — रूपक।

    - भौंरे-कौए के कालेपन का कारण धुआँ बताना — हेतूत्प्रेक्षा।

  • लोक-संस्कृति: चकवा-चकवी, सारस-जोड़ी, कोयल, फाग, चाँचरि, होली — लोकजीवन से लिए प्रतीक।
  • बोर्ड परीक्षा फोकस (प्रश्न-अभ्यास पर आधारित)

    प्रश्न: अगहन मास की विशेषता बताते हुए नागमती की व्यथा का चित्रण कीजिए।

    उत्तर-रूपरेखा: (1) अगहन में दिन छोटे, रातें लंबी और ठंड शुरू। (2) नागमती के लिए दिन भी रात बन गया; वह दीपक की बाती की तरह जलती है। (3) सब घरों में शीत के वस्त्र सजे, पर उसका रूप-रंग प्रिय ले गया; 'सियरि अगिनि' उसे राख कर रही है। (4) भौंरे-कौए से संदेश भेजती है।

    प्रश्न: "जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँडा" के संदर्भ में विरह-दशा।

    उत्तर-रूपरेखा: (1) विरह को बाज़ (सचान) का रूपक दिया गया है। (2) जैसे बाज़ शिकार पर मँडराकर नोचता है, वैसे विरह जीते जी उसे खा रहा है। (3) मरने पर भी पीछा नहीं छोड़ेगा — अर्थात् विरह-वेदना अंतहीन है। (4) रूपक और अतिशयोक्ति से करुणा गहरी होती है।

    प्रश्न: वृक्षों से पत्तियाँ और वनों से ढाँखें किस माह गिरते हैं? विरहिणी से संबंध?

    उत्तर-रूपरेखा: फागुन मास। पतझड़ में पेड़ पत्र-पुष्प-फल रहित हो जाते हैं, वैसे ही नायिका का तन पीले पत्ते जैसा और जीवन सूना हो गया है; प्रकृति की उजाड़ दशा उसकी मनोदशा का प्रतिबिंब है, जबकि फाग का उल्लास उसके दुख को दुगना कर देता है।

    कठिन शब्द

  • देवस — दिवस, दिन
  • निसि — रात
  • दूभर — कठिन
  • सीउ — शीत
  • नाहू — नाथ, स्वामी
  • सियरि — ठंडी
  • दगधे — जले
  • सँदेसड़ा — संदेश
  • धनि — पत्नी, प्रिया
  • लंक दिसि — लंका की ओर, दक्षिण दिशा
  • सौर-सुपेती — जाड़े के ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र
  • हिवंचल — हिमाचल, बर्फ़ से ढका
  • सचान — बाज़ पक्षी
  • ररि — रट-रटकर
  • माँहुट — माघ मास की वर्षा
  • पटोरा — रेशमी वस्त्र
  • तिनुवर — तिनका
  • मकु — कदाचित
  • सामान्य भूलें

  • विरहिणी को पद्मावती लिख देना — इस अंश की विरहिणी नागमती (रत्नसेन की पहली रानी) है।
  • पाठ के महीनों को सावन-भादों आदि लिखना — पाठ में अगहन, पूस, माघ, फागुन हैं।
  • जायसी की भाषा को ब्रजभाषा बताना — यह ठेठ अवधी है।
  • 'मसनवी' को भारतीय शैली कहना — यह फ़ारसी की शैली है।
  • "धुआँ हम लाग" में बोलने वाले को नायिका मान लेना — यह भौंरे और कौए के मुँह से कहलवाया गया संदेश है।
  • "सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा" का अर्थ "सूर्य लंका में डूब गया" लिखना — अर्थ है: ठिठुरा सूर्य दक्षिण (लंका) की ओर तापने चला गया (शीत में सूर्य दक्षिणायन होता है)।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पाठ पद्मावत के 'बारहमासा' से है; इसमें राजा रत्नसेन की पहली रानी नागमती की विरह-दशा अगहन, पूस, माघ और फागुन के क्रम में वर्णित है।
    • ✓जायसी सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं; पद्मावत मसनवी शैली में, दोहा-चौपाई छंद और ठेठ अवधी में रचित प्रबंधकाव्य है।
    • ✓प्रकृति उद्दीपन के रूप में आई है: लंबी रातें, पाला, माघ की वर्षा, फागुन की हवा और पतझड़ — सब विरह को बढ़ाते हैं।
    • ✓प्रमुख बिंब: दीपक की बाती, विरह रूपी बाज़ (सचान), शंख जैसी हड्डियाँ, सारस, तिनका, पीला पत्ता, राख बनकर प्रिय के मार्ग में पड़ना।
    • ✓अंतिम दोहा प्रेम में पूर्ण समर्पण दिखाता है: नायिका राख बनकर प्रिय के पाँवों तले पड़ना चाहती है।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पहले पद्मावत की कथा संक्षेप में सुनाएँ (रत्नसेन, पद्मावती, हीरामन तोता, नागमती), ताकि विद्यार्थी जानें कि नागमती क्यों अकेली है।
    • →बोर्ड पर चार कॉलम बनाएँ — अगहन, पूस, माघ, फागुन — और हर मास का प्राकृतिक लक्षण तथा नायिका की दशा विद्यार्थियों से भरवाएँ।
    • →'बारहमासा' लोकगीत परंपरा के बारे में बताएँ; विद्यार्थियों से अपने क्षेत्र के किसी बारहमासा या विरह-गीत की पंक्तियाँ लाने को कहें।
    • →चारों दोहों को याद करवाएँ; ये व्याख्या के लिए सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
    • →अलंकार-खोज गतिविधि: प्रथम दो छंदों से उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, पुनरुक्तिप्रकाश छाँटने की प्रतियोगिता कराएँ।
    • →लोक-प्रतीकों (चकवा-चकवी, सारस-जोड़ी, कोयल) के पीछे की लोक-मान्यताएँ समझाएँ, ताकि बिंबों का अर्थ खुल सके।
    • →योग्यता-विस्तार के लिए विद्यापति या सूरदास के किसी विरह-पद से तुलना कराएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. विद्यार्थी चारों महीनों में नागमती की विरह-दशा का क्रमवार वर्णन कर सकें।
    2. पाठ के चारों दोहों की सप्रसंग व्याख्या कर सकें।
    3. 'बिरह सचान', 'जरै बिरह ज्यों दीपक बाती', 'जानहुँ सेज हिवंचल बूड़ी' में अलंकार पहचानकर सौंदर्य बता सकें।
    4. जायसी की भाषा, छंद और मसनवी शैली की विशेषताएँ लिख सकें।
    5. प्रकृति के उद्दीपन रूप को उदाहरण सहित स्पष्ट कर सकें।

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    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
    3. 3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' – यह दीप अकेला, मैंने देखा, एक बूँद
    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
    6. 6. तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
    7. 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
    8. 8. विद्यापति – पद
    9. 9. घनानंद – कवित्त
    10. 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
    11. 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
    12. 12. फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया
    13. 13. भीष्म साहनी – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
    14. 14. असगर वजाहत – शेर, पहचान, चार हाथ, साझा
    15. 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
    16. 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
    17. 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज