ममता कालिया – दूसरा देवदास – Class 12 Hindi Chapter 16 Notes & NCERT PDF
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पाठ 16: ममता कालिया – दूसरा देवदास
परिचय
दूसरा देवदास ममता कालिया की कहानी है। यह हर की पौड़ी, हरिद्वार के परिवेश को केंद्र में रखकर युवा मन की संवेदना, भावना और विचारों की उथल-पुथल को आकर्षक भाषा में प्रस्तुत करती है। युवा हृदय में पहली आकस्मिक मुलाकात की हलचल, कल्पना और रूमानियत इसका केंद्र है। घटनाएँ इस तरह गुँथी हैं कि अनजाने में संभव और पारो के मन में प्रेम का पहला अंकुर फूटता है। पाठ-परिचय के अनुसार कहानी सिद्ध करती है कि प्रेम के लिए कोई निश्चित व्यक्ति, समय या स्थिति ज़रूरी नहीं; लेखिका ने प्रेम को बंबइया फ़िल्मों की परिपाटी से अलग हटाकर पवित्र और स्थायी रूप दिया है।
लेखिका परिचय
पाठ का सार
1. हर की पौड़ी पर साँझ की आरती
"हर की पौड़ी पर साँझ कुछ अलग रंग में उतरती है।" आरती की बेला में फूलों के दोने एक रुपए से दो रुपए के हो जाते हैं, पर भक्तों को शिकायत नहीं — "एक-दो रुपए का मुँह थोड़े ही देखना है।" गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वर्दी में व्यवस्था करते हैं; कुछ भक्तों ने एक सौ एक या एक सौ इक्यावन रुपए वाली 'स्पेशल आरती' बोल रखी है। पीतल की पंचमंज़िली नीलांजलि में सहस्र बत्तियाँ जलती हैं, "जय गंगे माता" का समवेत स्वर उठता है, फिर लाउडस्पीकर पर लता मंगेशकर का "ओम जय जगदीश हरे" गूँजता है। दोनों की छोटी किश्तियाँ लहरों पर तैरती हैं।
गंगापुत्र (गोताखोर) दोनों से पैसे उठाकर मुँह में दबा लेते हैं। एक औरत के इक्कीस दोने तैराने पर एक दीपक से गंगापुत्र के लंगोट में आग लग जाती है; वह झट गंगा में बैठ जाता है। "गंगा मैया ही उसकी जीविका और जीवन है।" उसकी बीवी और बहन कुशाघाट पर रेज़गारी बेचकर नोट कमाती हैं — एक रुपए के पचासी, कभी अस्सी पैसे। लेखिका पंडों के व्यापार पर हल्का व्यंग्य भी करती हैं, पर मानती हैं — "कई खर्च सुखदायी होते हैं।"
2. संभव और पारो की पहली मुलाकात
संभव देर तक नहाकर घाट पर आता है। मंगल पंडा उसके माथे पर चंदन-तिलक लगाता है। नानी ने कहा था कि मंदिर में बीस आने चढ़ाना। चवन्नी न मिलने पर वह दो का नोट देता है। पुजारी कलावा बाँधने को हाथ बढ़ाता है, पर संभव गंगा की छटा निहार रहा है — तभी एक "दुबली नाज़ुक सी कलाई" आगे आती है। भीगे कपड़ों, गुलाबी आँचल और लंबे गीले बालों वाली लड़की "लगभग काँस्य प्रतिमा" लगती है; उसका आँचल संभव के कुर्ते का कोना भी गीला कर देता है। लड़की सवा पाँच रुपए चढ़ाकर कहती है, "नहीं हम कल आरती की बेला आएँगे।"
पुजारी लड़की के 'हम' को युगल अर्थ में लेकर आशीर्वाद देता है — "सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पूरे करें।" दोनों अकबका जाते हैं; लड़की छिटककर दूर खड़ी हो जाती है और घबराहट में चप्पल भी ठीक से नहीं पहन पाती। संभव गलियों और चूड़ी की दुकानों में उसे ढूँढता है, पर "एक भीगी, गुलाबी आकृति" नहीं मिलती।
3. नानी का घर और संभव की बेचैनी
नानी चिंता करती हैं — "तुझे तो तैरना भी न आवे। कहीं पैर फिसल जाता तो मैं तेरी माँ को कौन मुँह दिखाती।" संभव खाना मना करता है, फिर याद आते ही कि लड़की ने कल आने को कहा है, उत्साह से खाने लगता है; पर आशीर्वचन की 'दुर्घटना' याद आते ही कौर हाथ में रह जाता है। संभव ने इसी साल एम.ए. किया है और सिविल सेवा की परीक्षा देने वाला है; माता-पिता मानते थे कि गंगा-दर्शन से वह "बेखटके" चुन लिया जाएगा। अब तक कोई लड़की उसके जीवन में अहम नहीं थी — यह अनुभूति "कुछ सुख और ज़्यादा बेचैनी" वाली थी। वह कल्पना करता है कि उससे क्या कहेगा, वह बी.ए. में होगी या एम.ए. में।
4. बैसाखी, मन्नू और मंसा देवी
अगले दिन बैसाखी है। पौड़ी की भीड़ दिल्ली की भीड़ से अलग है — "इस भीड़ में एकसूत्रता थी… महत्त्व उद्देश्य का था", जीवन के कल्याण की कामना का। जलधारा में सूर्य की ओर हाथ जोड़े एक आदमी "चेतनस्वरूप, आत्माराम और निर्मलानंद" लगता है। रोहतक से अपनी बुआ के साथ आया बच्चा मन्नू उससे बात करता है और बताता है कि उसे मंसा देवी जाना है। नानी ने रोपवे से मना किया था, पर संभव 'उषा ब्रेको सर्विस' के रोपवे से गुलाबी केबिल कार में जाता है — "कल से उसे गुलाबी के सिवा और कोई रंग सुहा ही नहीं रहा था।" बिंदियाँ देखकर वह मन ही मन उस "अज्ञातयौवना" के माथे पर बिंदी सजा देता है। मंदिर में वह मनोकामना का लाल-पीला धागा बाँधता है।
5. दूसरा देवदास
लौटते समय वह दूर पीली केबिल कार में मन्नू और उसके साथ वही लड़की देखता है। नीचे पहुँचकर मन्नू से मिलता है; मन्नू उसे "बुआ" से मिलवाता है। वही महीन मीठी आवाज़ — "ऐसे कैसे दोस्त हैं तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम भी नहीं…"। संभव का रोम-रोम पुलकित हो उठता है — "उसने कब सोचा था मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखाएगा।" आज सफ़ेद साड़ी में लाज से गुलाबी होती लड़की सोचती है, "मनोकामना की गाँठ भी अद्भुत, अनूठी है, इधर बाँधो उधर लग जाती है…" मन्नू कहता है, "पारो बुआ, पारो बुआ, इनका नाम है…" और संभव हँसकर वाक्य पूरा करता है — "संभव देवदास।"
पात्र विश्लेषण
शीर्षक की सार्थकता
शरतचंद्र के 'देवदास' में देवदास और पारो की प्रेम-कथा दुखांत है। यहाँ नायिका का नाम भी पारो है, इसलिए संभव स्वयं को "संभव देवदास" कहता है — वह दूसरा देवदास है। पर यह देवदास विरह में नहीं टूटता; कहानी का प्रेम सुखद और संभावनापूर्ण है — नायक का नाम 'संभव' भी इसी संभावना का संकेत है। मनोकामना के धागे की गाँठ दोनों ओर "लग जाती" है।
भाषा-शैली
बोर्ड परीक्षा फोकस
प्रश्न 1: पुजारी ने 'हम' को युगल अर्थ में लेकर क्या आशीर्वाद दिया और उसके बाद दोनों के व्यवहार में अटपटापन क्यों आया?
उत्तर-रूपरेखा: लड़की का "हम कल आरती की बेला आएँगे" → पुजारी ने दोनों को दंपति समझा → "सुखी रहो, फूलो-फलो, जब भी आओ साथ ही आना" → दोनों अपरिचित थे → लड़की छिटककर दूर, चप्पल ठीक से न पहन पाना; संभव को वहाँ से चल देने की जल्दी।
प्रश्न 2: 'मनोकामना की गाँठ… इधर बाँधो उधर लग जाती है' — पारो की मनोदशा।
उत्तर-रूपरेखा: पारो ने भी मंसा देवी पर मन्नत माँगी थी → संभव का अचानक मिलना → लाज, पुलक, आश्चर्य → एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प → प्रेम का परस्पर होना।
प्रश्न 3: 'दूसरा देवदास' शीर्षक की सार्थकता। (ऊपर 'शीर्षक की सार्थकता' देखें)
कठिन शब्द
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓कहानी हर की पौड़ी, हरिद्वार के परिवेश में युवा मन में पहली आकस्मिक मुलाकात से उपजे प्रेम की हलचल को चित्रित करती है।
- ✓पुजारी लड़की के 'हम' को युगल अर्थ में लेकर 'जब भी आओ साथ ही आना' का आशीर्वाद देता है, जिससे दोनों अपरिचित अकबका जाते हैं।
- ✓संभव की बेचैनी, कल्पनाएँ, गुलाबी रंग का आकर्षण और मंसा देवी पर मनोकामना का धागा — प्रथम प्रेम का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण है।
- ✓मन्नू के माध्यम से दोनों फिर मिलते हैं; लड़की का नाम पारो है और संभव स्वयं को 'संभव देवदास' कहता है।
- ✓लेखिका ने प्रेम को बंबइया फ़िल्मी परिपाटी से अलग पवित्र रूप दिया है; साथ में घाट के धार्मिक व्यापार पर हल्का व्यंग्य भी है।
👨🏫 Teaching Tips
- →हर की पौड़ी की गंगा-आरती का छोटा वीडियो या चित्र दिखाकर पाठ का परिवेश बनाएँ।
- →कहानी को पाँच दृश्यों (आरती, पहली भेंट, नानी का घर, बैसाखी-मन्नू, मंसा देवी) में बाँटकर समूह-वाचन कराएँ।
- →शरतचंद्र के 'देवदास' की कथा संक्षेप में बताकर शीर्षक की सार्थकता पर चर्चा कराएँ — दुखांत बनाम संभावनापूर्ण प्रेम।
- →पाठ से पूजा-अर्चना संबंधी शब्द छाँटने का भाषा-शिल्प अभ्यास कराएँ।
- →नानी के संवादों की लोकभाषा (ब्रज पुट) को मानक हिंदी में बदलवाकर भाषा-भेद समझाएँ।
- →'आख्याता (नैरेटर) शैली' के उदाहरण — लेखिका की टिप्पणियाँ — विद्यार्थियों से खोजवाएँ।
- →दिल्ली की भीड़ और पौड़ी की भीड़ की तुलना पर अनुच्छेद लिखवाएँ।
📋 Assessment Questions
- क्या विद्यार्थी गंगा-आरती और गंगापुत्रों के जीवन का भावपूर्ण वर्णन अपने शब्दों में कर सकता है?
- क्या वह आशीर्वाद के बाद दोनों पात्रों के अटपटे व्यवहार का कारण स्पष्ट कर सकता है?
- क्या वह संभव के मन की हलचल और कल्पनाओं का क्रमबद्ध विवेचन कर सकता है?
- क्या वह 'दूसरा देवदास' शीर्षक और 'मनोकामना की गाँठ' कथन की सार्थकता लिख सकता है?
- क्या वह पाठ के लोकभाषा-प्रयोग और मुहावरों को पहचानकर उनका अर्थ बता सकता है?
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All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12
- 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
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- 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
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- 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
- 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
- 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज