मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा – Class 12 Hindi Chapter 7 Notes & NCERT PDF
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पाठ 7: मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
परिचय
यह पाठ मलिक मुहम्मद जायसी के प्रसिद्ध प्रबंधकाव्य पद्मावत के "बारहमासा" (नागमती वियोग खंड) के कुछ अंशों से लिया गया है। इसमें राजा रत्नसेन की पहली रानी नागमती की विरह-दशा का वर्णन है। रत्नसेन पद्मावती की खोज में सिंहल चले गए हैं और नागमती चित्तौड़ में अकेली है। पाठ में चार अंश हैं, जो क्रमशः अगहन, पूस, माघ और फागुन — इन शीत ऋतु के महीनों में नायिका की विरह-व्यथा दिखाते हैं। 'बारहमासा' वह काव्य-परंपरा है जिसमें वर्ष के बारह महीनों की प्रकृति के साथ विरहिणी की दशा का वर्णन होता है।
कवि परिचय
पाठ का सार और व्याख्या
अंश 1: अगहन मास
"अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी॥" अगहन में दिन छोटे और रातें लंबी हो गई हैं; यह कठिन दुख कैसे काटा जाए? नायिका के लिए अब दिन भी विरह के कारण रात बन गया है, और वह दीपक की बाती की तरह विरह में जल रही है। शीत से हृदय काँपता है; प्रिय साथ होते तो ठंड न लगती। घर-घर में सबने (शीत के) वस्त्र सजाए हैं, पर मेरा रूप-रंग तो मेरा स्वामी (नाहू) ले गया। जो बिछुड़कर गया, वह लौटा नहीं; वह लौट आए तो वही रंग फिर आ जाए। "सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा" — यह ठंडी (विरह की) आग विरहिणी का हृदय जलाती है, सुलग-सुलगकर राख कर देती है; प्रिय (कंत) इस दुख को नहीं जानता, यौवन और जीवन भस्म हो रहे हैं।
दोहा: "पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥" नायिका भौंरे और कौए से कहती है कि प्रिय को संदेश देना: तुम्हारी पत्नी विरह में जलकर मर गई, उसी का धुआँ लगने से हम काले हो गए। भौंरे और कौए के काले रंग का कारण विरह-अग्नि का धुआँ बताना कवि की मौलिक कल्पना है (हेतूत्प्रेक्षा का भाव)।
अंश 2: पूस मास
पूस में जाड़े से तन थर-थर काँपता है; सूर्य भी ठिठुरकर लंका की दिशा (दक्षिण) में तापने चला गया है। विरह बढ़कर दारुण शीत बन गया है; नायिका कहती है: काँप-काँपकर मर रही हूँ, (विरह) मेरे प्राण ले रहा है। प्रिय कहाँ हैं कि हृदय से लगूँ; मार्ग अपार है, पास कुछ नहीं सूझता। ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र (सौर-सुपेती) भी ठंडे लगते हैं, मानो सेज हिमालय की बर्फ़ में डूबी हो।
"चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला॥" चकवी तो रात में बिछुड़कर दिन में (चकवे से) मिल जाती है, पर मैं रात-दिन विरह में कोयल की तरह (पुकारती) हूँ। रात में अकेली हूँ, सखी साथ नहीं; बिछुड़ा पक्षी कैसे जिए? "बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा॥" — विरह रूपी प्रचंड बाज़ शरीर पर मँडराता है; जीते जी खाता है और मरने पर भी नहीं छोड़ेगा।
दोहा: "रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख॥" रक्त बह गया, माँस गल गया, हड्डियाँ शंख जैसी (सफ़ेद, खोखली) हो गईं; प्रिया सारस की तरह रट-रटकर मर गई, अब आकर उसके पंख समेट लो। (सारस-जोड़ी का प्रेम प्रसिद्ध है; एक के मरने पर दूसरा भी प्राण दे देता है।)
अंश 3: माघ मास
माघ लगते ही पाला पड़ने लगा; विरह में यह जाड़ा मृत्यु (काल) बन गया है। तन को रुई से जितना ढँको, हृदय उतना ही अधिक काँपता है। नायिका कहती है: हे नाथ, तुम सूर्य बनकर आओ और तपो; तुम्हारे बिना माघ का जाड़ा नहीं छूटेगा। इसी मास में (शृंगार का) मूल रस उपजता है; तुम भौंरे हो, मेरा यौवन फूल है। आँखों से आँसू माघ की वर्षा (माँहुट) की तरह चूते हैं; उस जल से भीगे वस्त्र शरीर पर बाण जैसे लगते हैं। बूँदें ओलों की तरह टूटकर गिरती हैं; विरह पवन बनकर झकझोरता है। किसके लिए शृंगार करूँ, कौन रेशमी वस्त्र पहने? गले में हार नहीं, (दुबली होकर) मैं स्वयं धागा (डोरा) बन गई हूँ।
दोहा: "तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराइ कै, चहै उड़ावा झोल॥" हे प्रिय, तुम्हारे बिना पत्नी हल्की हो गई है, शरीर तिनके की तरह डोलता है; उस पर विरह उसे जलाकर राख (झोल) की तरह उड़ा देना चाहता है।
अंश 4: फागुन मास
फागुन में पवन के झकोरे चलने लगे; जाड़ा चौगुना हो गया, कैसे सहा जाए? मेरा तन पीले पत्ते जैसा हो गया है; विरह पवन बनकर झकझोर रहा है। पेड़ों के पत्ते झड़ रहे हैं, वन में ढाक पत्ते गिरा रहे हैं; शाखाएँ पत्तों, फूलों और फलों से रहित हो गईं। वनस्पतियाँ नई कोंपलों से उल्लसित हैं, पर मेरे लिए संसार दुगना उदास है। सब मिलकर फाग और चाँचरि खेल रहे हैं, पर मुझे तो मानो होली की तरह हृदय में आग लगा दी गई है। यदि प्रिय को मेरा जलना ही अच्छा लगता है तो जलने-मरने पर भी मुझे क्रोध नहीं।
दोहा (समर्पण की पराकाष्ठा): "यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ। मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहँ पाउ॥" मैं इस शरीर को जलाकर राख कर दूँ और पवन से कहूँ कि उड़ा ले जाए; कदाचित मैं उस मार्ग पर जा पड़ूँ जहाँ मेरे प्रिय पाँव रखें।
काव्य-सौंदर्य और शिल्प
- "जरै बिरह ज्यों दीपक बाती" — उपमा।
- "बिरह सचान" — रूपक (विरह रूपी बाज़); "विरह पवन होइ" — रूपक।
- "सुलगि सुलगि", "कँपि कँपि", "हहलि हहलि" — पुनरुक्तिप्रकाश।
- "जानहुँ सेज हिवंचल बूड़ी" — उत्प्रेक्षा।
- "हाड़ भए सब संख", "रकत ढरा माँसू गरा" — अतिशयोक्ति।
- "तूँ सो भँवर मोर जोबन फूलू" — रूपक।
- भौंरे-कौए के कालेपन का कारण धुआँ बताना — हेतूत्प्रेक्षा।
बोर्ड परीक्षा फोकस (प्रश्न-अभ्यास पर आधारित)
प्रश्न: अगहन मास की विशेषता बताते हुए नागमती की व्यथा का चित्रण कीजिए।
उत्तर-रूपरेखा: (1) अगहन में दिन छोटे, रातें लंबी और ठंड शुरू। (2) नागमती के लिए दिन भी रात बन गया; वह दीपक की बाती की तरह जलती है। (3) सब घरों में शीत के वस्त्र सजे, पर उसका रूप-रंग प्रिय ले गया; 'सियरि अगिनि' उसे राख कर रही है। (4) भौंरे-कौए से संदेश भेजती है।
प्रश्न: "जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँडा" के संदर्भ में विरह-दशा।
उत्तर-रूपरेखा: (1) विरह को बाज़ (सचान) का रूपक दिया गया है। (2) जैसे बाज़ शिकार पर मँडराकर नोचता है, वैसे विरह जीते जी उसे खा रहा है। (3) मरने पर भी पीछा नहीं छोड़ेगा — अर्थात् विरह-वेदना अंतहीन है। (4) रूपक और अतिशयोक्ति से करुणा गहरी होती है।
प्रश्न: वृक्षों से पत्तियाँ और वनों से ढाँखें किस माह गिरते हैं? विरहिणी से संबंध?
उत्तर-रूपरेखा: फागुन मास। पतझड़ में पेड़ पत्र-पुष्प-फल रहित हो जाते हैं, वैसे ही नायिका का तन पीले पत्ते जैसा और जीवन सूना हो गया है; प्रकृति की उजाड़ दशा उसकी मनोदशा का प्रतिबिंब है, जबकि फाग का उल्लास उसके दुख को दुगना कर देता है।
कठिन शब्द
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓पाठ पद्मावत के 'बारहमासा' से है; इसमें राजा रत्नसेन की पहली रानी नागमती की विरह-दशा अगहन, पूस, माघ और फागुन के क्रम में वर्णित है।
- ✓जायसी सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं; पद्मावत मसनवी शैली में, दोहा-चौपाई छंद और ठेठ अवधी में रचित प्रबंधकाव्य है।
- ✓प्रकृति उद्दीपन के रूप में आई है: लंबी रातें, पाला, माघ की वर्षा, फागुन की हवा और पतझड़ — सब विरह को बढ़ाते हैं।
- ✓प्रमुख बिंब: दीपक की बाती, विरह रूपी बाज़ (सचान), शंख जैसी हड्डियाँ, सारस, तिनका, पीला पत्ता, राख बनकर प्रिय के मार्ग में पड़ना।
- ✓अंतिम दोहा प्रेम में पूर्ण समर्पण दिखाता है: नायिका राख बनकर प्रिय के पाँवों तले पड़ना चाहती है।
👨🏫 Teaching Tips
- →पहले पद्मावत की कथा संक्षेप में सुनाएँ (रत्नसेन, पद्मावती, हीरामन तोता, नागमती), ताकि विद्यार्थी जानें कि नागमती क्यों अकेली है।
- →बोर्ड पर चार कॉलम बनाएँ — अगहन, पूस, माघ, फागुन — और हर मास का प्राकृतिक लक्षण तथा नायिका की दशा विद्यार्थियों से भरवाएँ।
- →'बारहमासा' लोकगीत परंपरा के बारे में बताएँ; विद्यार्थियों से अपने क्षेत्र के किसी बारहमासा या विरह-गीत की पंक्तियाँ लाने को कहें।
- →चारों दोहों को याद करवाएँ; ये व्याख्या के लिए सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
- →अलंकार-खोज गतिविधि: प्रथम दो छंदों से उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, पुनरुक्तिप्रकाश छाँटने की प्रतियोगिता कराएँ।
- →लोक-प्रतीकों (चकवा-चकवी, सारस-जोड़ी, कोयल) के पीछे की लोक-मान्यताएँ समझाएँ, ताकि बिंबों का अर्थ खुल सके।
- →योग्यता-विस्तार के लिए विद्यापति या सूरदास के किसी विरह-पद से तुलना कराएँ।
📋 Assessment Questions
- विद्यार्थी चारों महीनों में नागमती की विरह-दशा का क्रमवार वर्णन कर सकें।
- पाठ के चारों दोहों की सप्रसंग व्याख्या कर सकें।
- 'बिरह सचान', 'जरै बिरह ज्यों दीपक बाती', 'जानहुँ सेज हिवंचल बूड़ी' में अलंकार पहचानकर सौंदर्य बता सकें।
- जायसी की भाषा, छंद और मसनवी शैली की विशेषताएँ लिख सकें।
- प्रकृति के उद्दीपन रूप को उदाहरण सहित स्पष्ट कर सकें।
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