न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् – Class 7 Sanskrit Chapter 4 Notes & NCERT PDF
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पाठ 4: न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् (न मिले तो अंगूर खट्टे)
पाठ-परिचय
चतुर्थः पाठः – न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् (यदि न मिले तो अंगूर खट्टे हैं)
यह पाठ प्रसिद्ध कथा ‘लोमड़ी और अंगूर’ (हिन्दी मुहावरा – अंगूर खट्टे हैं) को संस्कृत गीत के रूप में प्रस्तुत करता है। आचार्य विद्यार्थियों को एक चित्र दिखाते हैं – पेड़, शृगाल (लोमड़ी) और अंगूर। विद्यार्थी बताते हैं कि यह कथा उन्होंने मातृभाषा में सुनी है। फिर सब मिलकर यह कथा गीत-रूप में गाते और अभिनय करते हैं। व्याकरण में आत्मनेपदी धातुओं (लभते, जायते, पलायते) के लट्-लकार रूप सिखाए गए हैं।
पाठ-सार – ‘एकः शृगालः’ गीत
एकः शृगालः वनं गच्छति । पिपासया बुभुक्षया वनं गच्छति ॥
आम्लं द्राक्षाफलम् आम्लं द्राक्षाफलम् । इत्येवं कथयति, सः पलायते ॥
(अंगूर खट्टे हैं – ऐसा कहकर वह भाग जाती है।)
सीख: जो वस्तु मेहनत करके भी न मिले, उसे बुरा बता देना अपनी असफलता छिपाने का बहाना है। सच्चा व्यक्ति असफल होने पर भी प्रयास नहीं छोड़ता।
योग्यताविस्तर के श्लोक
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥
अर्थ: निम्न लोग विघ्न के डर से काम शुरू ही नहीं करते; मध्यम लोग शुरू करके विघ्न आने पर रुक जाते हैं; उत्तम लोग बार-बार विघ्न आने पर भी शुरू किया काम नहीं छोड़ते।
गच्छन् पिपीलको याति योजनानां शतान्यपि ।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥
अर्थ: चलती रहने वाली चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, पर न चलने वाला गरुड़ (वैनतेय) एक कदम भी नहीं जाता।
शब्दार्थ
व्याकरण-बिन्दु
आत्मनेपदी धातु – लट्-लकार
पाठ में जायते, लभते, पलायते जैसे आत्मनेपदी क्रियापद हैं। ‘लभ्’ धातु के रूप:
इसी प्रकार के रूप (अभ्यास ५)
दिशावाचक अव्यय
वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः, उपरि; आवृत्तिवाचक – एकवारम्, द्विवारम्, त्रिवारम्, पुनः पुनः।
अभ्यास-संकेत
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓‘एकः शृगालः’ गीत के माध्यम से ‘अंगूर खट्टे हैं’ कथा का क्रम संस्कृत में समझना और गाना
- ✓पिपासा, बुभुक्षा, श्रान्तः, खिन्नः, स्वेदः, पलायते आदि शब्दों का अर्थ जानना
- ✓दिशावाचक (वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः) और आवृत्तिवाचक (एकवारम्, द्विवारम्) पदों का प्रयोग
- ✓आत्मनेपदी धातुओं (लभ्, जन्, पलाय्, वन्द्, सेव्) के लट्-लकार के सभी पुरुष-वचन रूप लिखना
- ✓असफलता पर बहाना न बनाकर निरन्तर प्रयास करने की सीख (योग्यताविस्तर के श्लोक)
👨🏫 Teaching Tips
- →‘एकः शृगालः’ गीत को लय में गवाएँ और शृगाल की भूमिका में विद्यार्थी से अभिनय करवाएँ
- →‘वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः’ बोलते हुए विद्यार्थियों से उसी दिशा में देखने का खेल कराएँ
- →पुस्तक का कार्यकलाप – रस्सी से बँधे फल को मुँह से पकड़ने का खेल क्रीडाङ्गण में कराएँ
- →आत्मनेपद और परस्मैपद के अन्त (-ते/-ति) की तुलना बोर्ड पर दो स्तम्भों में करवाएँ
- →‘लभ्’ धातु के नौ रूपों का चार्ट बनवाकर कक्षा में लगवाएँ
- →‘अंगूर खट्टे हैं’ मुहावरे से जुड़ी अपने जीवन की घटना लिखने की परियोजना दें
- →चींटी और गरुड़ वाले श्लोक पर निरन्तर प्रयास के महत्त्व की चर्चा करें
📋 Assessment Questions
- शृगाल वन में क्यों जाता है और अन्त में क्या कहकर भाग जाता है?
- ‘लभ्’ धातु के लट्-लकार में उत्तमपुरुष के तीनों रूप लिखिए।
- ‘मूषकः मार्जारं दृष्ट्वा (पलाय्)’ – सही क्रियापद भरिए।
- ‘पिपासा’, ‘बुभुक्षा’ और ‘स्वेदः’ के अर्थ लिखिए।
- ‘गच्छन् पिपीलको याति…’ श्लोक से क्या सीख मिलती है?
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- 1. वन्दे भारतमातरम्
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- 3. मित्राय नमः
- 4. न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्
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- 10. दशमः कः ?
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- 12. वीराङ्गना पन्नाधाया
- 13. अतिरिक्तम् अध्ययनम्: वर्णमात्रा-परिचयः
- 14. परिशिष्टम् १: शब्दरूपाणि
- 15. परिशिष्टम् २: धातुरूपाणि