TalentJR

न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् – Class 7 Sanskrit Chapter 4 Notes & NCERT PDF

Class 7SanskritChapter 4NCERT book: दीपकम् (Deepakam) - Sanskrit Class 7

Notes and a simple summary of Chapter 4 of the NCERT Class 7 Sanskrit book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

🎧 Listen to the content

पाठ 4: न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् (न मिले तो अंगूर खट्टे)

पाठ-परिचय

चतुर्थः पाठः – न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् (यदि न मिले तो अंगूर खट्टे हैं)

यह पाठ प्रसिद्ध कथा ‘लोमड़ी और अंगूर’ (हिन्दी मुहावरा – अंगूर खट्टे हैं) को संस्कृत गीत के रूप में प्रस्तुत करता है। आचार्य विद्यार्थियों को एक चित्र दिखाते हैं – पेड़, शृगाल (लोमड़ी) और अंगूर। विद्यार्थी बताते हैं कि यह कथा उन्होंने मातृभाषा में सुनी है। फिर सब मिलकर यह कथा गीत-रूप में गाते और अभिनय करते हैं। व्याकरण में आत्मनेपदी धातुओं (लभते, जायते, पलायते) के लट्-लकार रूप सिखाए गए हैं।

पाठ-सार – ‘एकः शृगालः’ गीत

एकः शृगालः वनं गच्छति । पिपासया बुभुक्षया वनं गच्छति ॥
  • एक लोमड़ी प्यास (पिपासा) और भूख (बुभुक्षा) से व्याकुल होकर वन में जाती है।
  • इधर-उधर जाती है पर कुछ नहीं पाती – ‘किमपि न लभते’।
  • वह थक जाती (श्रान्तः) और दुःखी (खिन्नः) हो जाती है।
  • बाएँ, दाएँ, आगे, पीछे देखती है – ‘वामतः पश्यति, दक्षिणतः पश्यति, अग्रतः पश्यति, पृष्ठतः पश्यति’; उसे पसीना (स्वेदः) और प्यास (तृषा) होती है।
  • तब वह अंगूर की बेल (द्राक्षालता) देखती है; अंगूर बहुत ऊपर लताओं पर दिखते हैं।
  • अंगूर देखते ही उसके मुँह में पानी (रसः) आ जाता है – ‘अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते’।
  • वह एक बार, दो बार, तीन बार, बार-बार उछलती है – ‘एकवारम् उत्पतति, द्विवारम् उत्पतति…’; पसीना और थकान होती है।
  • अन्त में कहती है:
  • आम्लं द्राक्षाफलम् आम्लं द्राक्षाफलम् । इत्येवं कथयति, सः पलायते ॥

    (अंगूर खट्टे हैं – ऐसा कहकर वह भाग जाती है।)

    सीख: जो वस्तु मेहनत करके भी न मिले, उसे बुरा बता देना अपनी असफलता छिपाने का बहाना है। सच्चा व्यक्ति असफल होने पर भी प्रयास नहीं छोड़ता।

    योग्यताविस्तर के श्लोक

    प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
    विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥

    अर्थ: निम्न लोग विघ्न के डर से काम शुरू ही नहीं करते; मध्यम लोग शुरू करके विघ्न आने पर रुक जाते हैं; उत्तम लोग बार-बार विघ्न आने पर भी शुरू किया काम नहीं छोड़ते।

    गच्छन् पिपीलको याति योजनानां शतान्यपि ।
    अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ॥

    अर्थ: चलती रहने वाली चींटी सैकड़ों योजन चली जाती है, पर न चलने वाला गरुड़ (वैनतेय) एक कदम भी नहीं जाता।

    शब्दार्थ

  • शृगालः – लोमड़ी/सियार (Fox)
  • पिपासा – प्यास
  • बुभुक्षा – भूख
  • किमपि – कुछ भी
  • श्रान्तः – थका हुआ
  • खिन्नः – दुःखी
  • वामतः / दक्षिणतः – बायीं ओर / दायीं ओर
  • अग्रतः / पृष्ठतः – आगे / पीछे
  • स्वेदः – पसीना
  • तृषा – प्यास
  • द्राक्षालताम् – अंगूर की बेल को
  • अनुक्षणम् – उसी क्षण
  • उत्पतति – उछलता/कूदता है
  • आम्लम् – खट्टा
  • पलायते – भाग जाता है
  • व्याकरण-बिन्दु

    आत्मनेपदी धातु – लट्-लकार

    पाठ में जायते, लभते, पलायते जैसे आत्मनेपदी क्रियापद हैं। ‘लभ्’ धातु के रूप:

  • प्रथमपुरुषः: लभते – लभेते – लभन्ते
  • मध्यमपुरुषः: लभसे – लभेथे – लभध्वे
  • उत्तमपुरुषः: लभे – लभावहे – लभामहे
  • इसी प्रकार के रूप (अभ्यास ५)

  • कम्प्: कम्पते – कम्पेते – कम्पन्ते
  • वृध्: वर्धते – वर्धेते – वर्धन्ते
  • प्र + काश्: प्रकाशते – प्रकाशेते – प्रकाशन्ते
  • याच्: याचते – याचेते – याचन्ते
  • वीक्ष्: वीक्षते – वीक्षेते – वीक्षन्ते
  • शुभ्: शोभते – शोभेते – शोभन्ते
  • वृत् (मध्यम): वर्तसे – वर्तेथे – वर्तध्वे
  • लज्ज् (मध्यम): लज्जसे – लज्जेथे – लज्जध्वे
  • सेव् (उत्तम): सेवे – सेवावहे – सेवामहे
  • वन्द् (उत्तम): वन्दे – वन्दावहे – वन्दामहे
  • दिशावाचक अव्यय

    वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः, उपरि; आवृत्तिवाचक – एकवारम्, द्विवारम्, त्रिवारम्, पुनः पुनः।

    अभ्यास-संकेत

  • एक-पद उत्तर: शृगालः वन जाता है; वह द्राक्षालताम् देखता है; उसके मुख में रसः होता है; अंगूर उपरि उपरि लतासु दिखते हैं; क्या बार-बार उछलता है – आम्; क्या अंगूर पाता है – न।
  • वाक्य-पूर्ति (अभ्यास ७): शुनकं दृष्ट्वा बालकस्य भयं जायते; मूषकः मार्जारं दृष्ट्वा पलायते; रात्रिकाले मार्गदीपाः प्रकाशन्ते; अहं देवं वन्दे; त्वं किमर्थं लज्जसे; वयं देशं सेवामहे।
  • एकवचन → बहुवचन: शत्रुः पलायते → चोराः पलायन्ते; वृक्षः वर्धते → बालाः वर्धन्ते।
  • सामान्य भूलें

  • आत्मनेपद में परस्मैपद के प्रत्यय लगाना (‘लभति’, ‘पलायति’) – सही लभते, पलायते।
  • उत्तमपुरुष एकवचन ‘वन्दामि’ लिखना – ‘वन्द्’ आत्मनेपदी है, सही वन्दे।
  • ‘पिपासा’ और ‘बुभुक्षा’ के अर्थ उलट देना – पिपासा = प्यास, बुभुक्षा = भूख।
  • बहुवचन ‘लभन्ति’ लिखना – सही लभन्ते।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓‘एकः शृगालः’ गीत के माध्यम से ‘अंगूर खट्टे हैं’ कथा का क्रम संस्कृत में समझना और गाना
    • ✓पिपासा, बुभुक्षा, श्रान्तः, खिन्नः, स्वेदः, पलायते आदि शब्दों का अर्थ जानना
    • ✓दिशावाचक (वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः) और आवृत्तिवाचक (एकवारम्, द्विवारम्) पदों का प्रयोग
    • ✓आत्मनेपदी धातुओं (लभ्, जन्, पलाय्, वन्द्, सेव्) के लट्-लकार के सभी पुरुष-वचन रूप लिखना
    • ✓असफलता पर बहाना न बनाकर निरन्तर प्रयास करने की सीख (योग्यताविस्तर के श्लोक)

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →‘एकः शृगालः’ गीत को लय में गवाएँ और शृगाल की भूमिका में विद्यार्थी से अभिनय करवाएँ
    • →‘वामतः, दक्षिणतः, अग्रतः, पृष्ठतः’ बोलते हुए विद्यार्थियों से उसी दिशा में देखने का खेल कराएँ
    • →पुस्तक का कार्यकलाप – रस्सी से बँधे फल को मुँह से पकड़ने का खेल क्रीडाङ्गण में कराएँ
    • →आत्मनेपद और परस्मैपद के अन्त (-ते/-ति) की तुलना बोर्ड पर दो स्तम्भों में करवाएँ
    • →‘लभ्’ धातु के नौ रूपों का चार्ट बनवाकर कक्षा में लगवाएँ
    • →‘अंगूर खट्टे हैं’ मुहावरे से जुड़ी अपने जीवन की घटना लिखने की परियोजना दें
    • →चींटी और गरुड़ वाले श्लोक पर निरन्तर प्रयास के महत्त्व की चर्चा करें

    📋 Assessment Questions

    1. शृगाल वन में क्यों जाता है और अन्त में क्या कहकर भाग जाता है?
    2. ‘लभ्’ धातु के लट्-लकार में उत्तमपुरुष के तीनों रूप लिखिए।
    3. ‘मूषकः मार्जारं दृष्ट्वा (पलाय्)’ – सही क्रियापद भरिए।
    4. ‘पिपासा’, ‘बुभुक्षा’ और ‘स्वेदः’ के अर्थ लिखिए।
    5. ‘गच्छन् पिपीलको याति…’ श्लोक से क्या सीख मिलती है?

    👩‍🏫 Class 7 Sanskrit classes near you — online or at home

    Prefer a real teacher? TalentJR teachers take live online classes anywhere in India and visit homes in selected cities. Tell us what you need and our team will call you with timings and fees.

    • Live online classesSmall groups or 1:1 with a teacher, from home, any city.
    • Teacher at homeA TalentJR teacher visits your home (selected cities).
    • At a centreClasses at a TalentJR partner centre near you, where available.