TalentJR

क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् – Class 7 Sanskrit Chapter 6 Notes & NCERT PDF

Class 7SanskritChapter 6NCERT book: दीपकम् (Deepakam) - Sanskrit Class 7

Notes and a simple summary of Chapter 6 of the NCERT Class 7 Sanskrit book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

🎧 Listen to the content

पाठ 6: क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् (आओ, श्लोक-अन्त्याक्षरी खेलें)

पाठ-परिचय

षष्ठः पाठः – क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् (आओ, हम श्लोक-अन्त्याक्षरी खेलें)

बाहर वर्षा हो रही है, इसलिए भारती, दीपिका और उनके साथी कक्षा में ही एक नया खेल खेलते हैं – श्लोकान्त्याक्षरी। इस खेल के माध्यम से विद्या की महिमा बताने वाले दस श्लोक सीखे जाते हैं।

खेल के नियम

  • दो गण (टीमें) बनते हैं – ज्ञानमाला और रत्नमाला।
  • पहले गण का सदस्य एक पद्य गाता है; उस पद्य के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से दूसरे गण का सदस्य नया श्लोक गाता है।
  • खेल 'र्' अक्षर से ज्ञानमाला गण शुरू करता है।
  • विशेष नियम: यदि पद के अन्त में म्, विसर्ग (ः) या अनुस्वार (ं) हो, तो उससे पहले वाला व्यञ्जन लिया जाता है। जैसे किंशुकाः → 'क्', भूषणम् → 'ण्'।
  • पाठ-सार (दस श्लोक और उनके भाव)

    १. (ज्ञानमाला) – अन्तिम वर्ण 'क्'

    रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः ।
    विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥

    सुन्दर रूप, यौवन और ऊँचे कुल में जन्म होने पर भी विद्याहीन लोग वैसे ही शोभा नहीं पाते जैसे गन्धहीन पलाश (किंशुक) के फूल – देखने में सुन्दर पर सुगन्ध-रहित।

    २. (रत्नमाला) – 'व्'

    काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
    व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥

    बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्रों के आनन्द में बीतता है, जबकि मूर्खों का समय बुरी आदतों, नींद या झगड़े में।

    ३. (ज्ञानमाला) – 'य्'

    विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
    खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥

    दुष्ट (खल) की विद्या विवाद के लिए, धन घमंड के लिए और शक्ति दूसरों को सताने के लिए होती है; सज्जन (साधु) के लिए इसका उल्टा – विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति रक्षा के लिए।

    ४. (रत्नमाला) – 'त्'

    येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
    ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

    जिनके पास न विद्या, न तप, न दान, न ज्ञान, न शील (चरित्र), न गुण और न धर्म है, वे इस धरती पर भार हैं और मनुष्य के रूप में पशु की तरह घूमते हैं।

    ५. (ज्ञानमाला) – 'व्'

    तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च लक्ष्मीर्वाणी यशस्विनी ।
    तत्त्वज्ञानं परा शान्तिर्यदा विद्या भवेत्तव ॥

    जब तुम्हारे पास विद्या होगी, तब आजीविका, कीर्ति, धन, यशस्वी वाणी, तत्त्वज्ञान और परम शान्ति – सब प्राप्त होंगे।

    ६. (रत्नमाला) – 'श्'

    विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं
    विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
    विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता
    विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥

    विद्या मनुष्य का सबसे बड़ा सौन्दर्य और छिपा हुआ सुरक्षित धन है; वह सुख, यश देती है, गुरुओं की गुरु है, विदेश में बन्धु है, परम देवता है। राजसभाओं में विद्या पूजी जाती है, धन नहीं; विद्याहीन मनुष्य पशु के समान है।

    ७. (ज्ञानमाला) – 'न्'

    शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् ।
    शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः ॥

    मार्ग पर चलना, कन्था (गुदड़ी) सीना, पर्वत चढ़ना, विद्या और धन कमाना – ये पाँच काम धीरे-धीरे (क्रम से) करने चाहिए।

    ८. (रत्नमाला) – 'त्'

    न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम् ।
    अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत् ॥

    विद्या के बिना मनुष्यों को निश्चित सुख नहीं मिलता; इसलिए धर्म, अर्थ और मोक्ष के लिए विद्याभ्यास करना चाहिए।

    ९. (ज्ञानमाला) – 'ण्/न्'

    ताराणां भूषणं चन्द्रः लतानां भूषणं सुमम् ।
    पृथिव्याः भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम् ॥

    तारों का आभूषण चन्द्रमा, लताओं का फूल, पृथ्वी का राजा – पर विद्या सबका आभूषण है।

    १०. (रत्नमाला) – 'न्'

    न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि ।
    व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥

    विद्या-धन को न चोर चुरा सकता, न राजा छीन सकता, न भाइयों में बँटता, न बोझ बनता; खर्च (बाँटने) करने पर यह बढ़ता ही है – इसलिए विद्याधन सब धनों में प्रधान है।

    शब्दार्थ

  • किंशुकाः – पलाश के वृक्ष (ढाक/टेसू)
  • निर्गन्धाः – गन्धहीन
  • धीमताम् – बुद्धिमानों का
  • व्यसनेन – भोग-विलास / बुरी आदत से
  • मदाय – घमंड के लिए (गर्वाय)
  • परिपीडनाय – कष्ट देने के लिए
  • खलः – दुष्ट; साधुः – सज्जन
  • शीलम् – चरित्र
  • भुवि – धरती पर; भारभूताः – बोझ-स्वरूप
  • वृत्तिः – आजीविका
  • प्रच्छन्नगुप्तम् – ढँका हुआ और सुरक्षित
  • कन्था – पुराने कपड़ों से बनी मोटी चादर (गुदड़ी)
  • ध्रुवम् – निश्चित रूप से
  • सुमम् – फूल (कुसुमम्)
  • भ्रातृभाज्यम् – भाइयों में बाँटने योग्य
  • व्याकरण-बिन्दु

    विद्या (आकारान्त स्त्रीलिङ्ग) – शब्दरूप

  • प्रथमा: विद्या, विद्ये, विद्याः
  • द्वितीया: विद्याम्, विद्ये, विद्याः
  • तृतीया: विद्यया, विद्याभ्याम्, विद्याभिः
  • चतुर्थी: विद्यायै, विद्याभ्याम्, विद्याभ्यः
  • पञ्चमी: विद्यायाः, विद्याभ्याम्, विद्याभ्यः
  • षष्ठी: विद्यायाः, विद्ययोः, विद्यानाम्
  • सप्तमी: विद्यायाम्, विद्ययोः, विद्यासु
  • सम्बोधन: हे विद्ये!, हे विद्ये!, हे विद्याः!
  • पाठ के पदों की विभक्ति-वचन (अभ्यास ६)

  • ताराणाम् – षष्ठी, बहुवचन; विद्याम् – द्वितीया, एकवचन; धनस्य – षष्ठी, एकवचन
  • कलहेन – तृतीया, एकवचन; नराणाम् – षष्ठी, बहुवचन; मर्त्यलोके – सप्तमी, एकवचन
  • ज्ञानाय – चतुर्थी, एकवचन; राजसु – सप्तमी, बहुवचन
  • अभ्यास-संकेत

  • सज्जन-दुर्जन तालिका (अभ्यास ५): सज्जन की शक्ति → रक्षणाय, विद्या → ज्ञानाय, धन → दानाय; दुर्जन की शक्ति → परिपीडनाय, विद्या → विवादाय, धन → मदाय।
  • प्रश्न-निर्माण: रेखांकित पद की विभक्ति देखकर प्रश्नवाचक चुनें – पृथिव्याः → कस्याः; गुरूणाम् → केषाम्।
  • मिलान: श्लोक का पहला और दूसरा आधा भाग जोड़ें – जैसे विद्याहीना न शोभन्ते – निर्गन्धा इव किंशुकाः।
  • सामान्य भूलें

  • अन्त्याक्षरी में विसर्ग/म्/अनुस्वार को अन्तिम वर्ण मान लेना – उससे पहले का व्यञ्जन लें।
  • श्लोक ३ में सज्जन और दुर्जन के प्रयोग उलट देना – खल: विवाद-मद-परिपीडन; साधु: ज्ञान-दान-रक्षण।
  • 'किंशुक' को सुगन्धित फूल समझना – उपमा यही है कि वह सुन्दर है पर गन्धहीन।
  • 'शनैः शनैः' के पाँच काम गिनने में भूल – पन्थाः, कन्था, पर्वतलङ्घनम्, विद्या, वित्तम्।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓श्लोकान्त्याक्षरी के नियम – दो गण (ज्ञानमाला, रत्नमाला); अगला श्लोक पिछले के अन्तिम व्यञ्जन से
    • ✓पद के अन्त में म्, विसर्ग या अनुस्वार हो तो उससे पहले का व्यञ्जन लिया जाता है
    • ✓दस श्लोकों से विद्या की महिमा – विद्या सबका भूषण, सब धनों में प्रधान, न चोरहार्य न राजहार्य
    • ✓सज्जन और दुर्जन द्वारा विद्या, धन और शक्ति के प्रयोग का अंतर
    • ✓'विद्या' (आकारान्त स्त्रीलिङ्ग) के सभी विभक्तियों के रूप और पाठ के पदों की विभक्ति-पहचान

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कक्षा को सचमुच 'ज्ञानमाला' और 'रत्नमाला' दो गणों में बाँटकर पाठ के क्रम से अन्त्याक्षरी खेलें
    • →हर श्लोक के बाद बोर्ड पर उसका अन्तिम व्यञ्जन लिखें और विसर्ग/म् वाले नियम को उदाहरण से समझाएँ
    • →पलाश (किंशुक) के फूल का चित्र दिखाकर 'सुन्दर पर गन्धहीन' उपमा स्पष्ट करें
    • →श्लोक ३ के लिए दो कॉलम (खल / साधु) बनाकर विद्या, धन, शक्ति के प्रयोग भरवाएँ
    • →श्लोक १० पर चर्चा – 'कौन-सा धन बाँटने से बढ़ता है?' – विद्याधन को अन्य धन से तुलना करें
    • →पदान्त्याक्षरी (रामः → मानवः → वनम् → नकुलः) और क्रियापद-स्मरण खेल से शब्दावली बढ़ाएँ
    • →'विद्या' शब्दरूप को सस्वर कंठस्थ कराएँ और पाठ से उसी विभक्ति के पद ढुँढवाएँ

    📋 Assessment Questions

    1. श्लोकान्त्याक्षरी में 'भूषणम्' के बाद अगला श्लोक किस वर्ण से शुरू होगा और क्यों?
    2. सज्जन और दुर्जन अपनी विद्या, धन और शक्ति का उपयोग कैसे करते हैं?
    3. 'शनैः शनैः' किए जाने वाले पाँच कार्य कौन-से हैं?
    4. विद्याधन को 'सर्वधनप्रधानम्' क्यों कहा गया है?
    5. 'राजसु', 'कलहेन' और 'विद्याम्' की विभक्ति और वचन बताइए।

    👩‍🏫 Class 7 Sanskrit classes near you — online or at home

    Prefer a real teacher? TalentJR teachers take live online classes anywhere in India and visit homes in selected cities. Tell us what you need and our team will call you with timings and fees.

    • Live online classesSmall groups or 1:1 with a teacher, from home, any city.
    • Teacher at homeA TalentJR teacher visits your home (selected cities).
    • At a centreClasses at a TalentJR partner centre near you, where available.