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ईशावास्यम् इदं सर्वम् – Class 7 Sanskrit Chapter 7 Notes & NCERT PDF

Class 7SanskritChapter 7NCERT book: दीपकम् (Deepakam) - Sanskrit Class 7

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पाठ 7: ईशावास्यम् इदं सर्वम् (यह सब ईश्वर से व्याप्त है)

पाठ-परिचय

सप्तमः पाठः – ईशावास्यम् इदं सर्वम् (यह सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है)

अध्यापिका बच्चों से पूछती हैं – "ईश्वरः कुत्र अस्ति?" बच्चे कहते हैं – देवालय में। अध्यापिका बताती हैं – ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, सर्वत्र (वृक्ष, कक्षा, शिला, क्रीडाङ्गण में भी) व्याप्त है।

ईशावास्यमिदं सर्वम् – एतत् सर्वं जगत् ईशेन व्याप्तम् अस्ति ।

यह वाक्य उपनिषद् से है। अध्यापिका कहती हैं कि बहुत पहले एक छोटे बालक ने दिखाया था कि ईश्वर सर्वत्र है – वही प्रसंग प्रह्लाद और नृसिंह की कथा के रूप में नाटक (अभिनय सहित) पढ़ाया गया है।

पाठ-सार (नाटक)

दृश्य १: हिरण्यकशिपु की सभा

  • राजभट (सिपाही) घोषणा करता है – त्रैलोक्याधिपतिः दैत्यराजः हिरण्यकशिपुः आगच्छति। सभासद "विजयतां महाराज!" कहते हैं।
  • हिरण्यकशिपु अट्टहास करता है – "अहम् एव सर्वशक्तिमान् अस्मि। अहम् अमरः अस्मि।"
  • मन्त्री: सुर, असुर, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर – सभी आपसे डरे हुए हैं। दैत्यपुरोहित: देश में केवल आपकी पूजा होती है, देवताओं को यज्ञभाग भी कोई नहीं देगा।
  • पर मन्त्री चुप हो जाता है – हिरण्यकशिपु समझ जाता है कि बात उसके पुत्र प्रह्लाद की है, जो दिन-रात (अहर्निशम्) उसके शत्रु हरि का गुणगान करता है। वह उसे कुलकलङ्कः कहता है।
  • सेनापति और मन्त्री बताते हैं कि प्रह्लाद को मारने के सब उपाय विफल हुए:
  • - गजस्य पद-दलनेन (हाथी के पैरों से कुचलवाने पर) भी जीवित रहा,

    - उत्तुङ्गशिखरात् (ऊँचे पर्वत-शिखर से) गिराया, फिर भी नहीं मरा,

    - रज्ज्वा बद्ध्वा (रस्सी से बाँधकर) समुद्र में फेंका, फिर भी...

    दृश्य २: होलिका का षड्यन्त्र

  • हिरण्यकशिपु अपनी अनुजा (छोटी बहन) होलिका को बुलाता है। होलिका कहती है – "ब्रह्मणः वरप्रसादात् अग्निः मां न दहति" (ब्रह्मा के वर से अग्नि मुझे नहीं जलाती)।
  • होलिका प्रह्लाद से खेल (आँख-मिचौली) खेलने को कहती है। प्रह्लाद उसे पितृष्वसः (बुआ) कहकर गले लगाता है।
  • वह प्रह्लाद की आँखों पर पट्टी बाँधती है, दूर आग जलाकर उसमें बैठती है और ताली बजाकर (करतलध्वनिना) बुलाती है। प्रह्लाद पास आता है तो उसे गोद में ले लेती है।
  • प्रह्लाद हाथ जोड़कर जप करता है – ॐ नमो नारायणाय।
  • नारायण की कृपा से प्रह्लाद बच जाता है; ब्रह्मा के वर का दुरुपयोग करने के कारण अग्नि होलिका को ही जला देती है।
  • दृश्य ३: नृसिंह-अवतार

  • हिरण्यकशिपु क्रोध में पूछता है – "कुत्र अस्ति तव नारायणः?" प्रह्लाद उत्तर देता है – "तात! श्रीहरिः तु सर्वत्र अस्ति... अस्मिन् स्तम्भे अपि अस्ति।"
  • हिरण्यकशिपु खड्गेन (तलवार से) खम्भे पर प्रहार करता है। महान गर्जना के साथ नृसिंह स्तम्भ से बाहर आते हैं।
  • हिरण्यकशिपु कहता है कि ब्रह्मा के वर से वह अमर है। नृसिंह कहते हैं – मैं वर का उल्लंघन किए बिना तुम्हें मारूँगा। सन्ध्याकाल में वे उसे देहली (देहरी) पर पकड़ते हैं:
  • न त्वमसि भुवि, न च स्वर्गे ; न वा पाताले, न च आकाशे ;
    न गृहाभ्यन्तरे, बहिर्भागे वा ; नायं दिवसो, न वा रात्रिः ;
    नाहं मनुष्यो, न च पशुः ; न अस्त्रेण, न च शस्त्रेण ;
    निजनखैः तव वक्षःस्थलं विदीर्य हनिष्यामि ।
  • हिरण्यकशिपु क्षमा माँगता है, पर नृसिंह कहते हैं – "न तेऽपराधः क्षम्यः" और उसका वक्षःस्थल चीर देते हैं।
  • अध्यापिका: एवं बालः प्रह्लादः ईश्वरः सर्वत्र अस्ति इति दर्शितवान्। इसीलिए कहा जाता है – ईशावास्यम् इदं सर्वम्।
  • शब्दार्थ

  • ईशावास्यम् – ईश्वर से व्याप्त (ईश्वरेण व्याप्तम्)
  • सर्वशक्तिमान् – सबसे अधिक शक्तिशाली
  • यक्षाः, गन्धर्वाः, किन्नराः – देवयोनियाँ (कुबेर के अनुचर, दिव्य गायक, किम्पुरुष)
  • सक्रोधम् – क्रोध सहित
  • कुलकलङ्कः – वंश को कलंकित करने वाला
  • अहर्निशम् – दिन-रात
  • पद-दलनेन – पैरों से कुचलने से
  • उत्तुङ्गशिखरात् – ऊँचे पर्वत के शिखर से
  • रज्ज्वा – रस्सी से; बद्ध्वा – बाँधकर
  • पितृष्वसः! – हे बुआ!
  • बाढम् – अवश्य
  • करतलध्वनिना – ताली बजाकर
  • आर्तनादम् – चीख-पुकार
  • भङ्क्ष्यामि – तोड़ दूँगा
  • देहल्याम् – देहरी पर; निजनखैः – अपने नाखूनों से
  • वक्षःस्थलम् – छाती; भिनत्ति – चीरता है
  • व्याकरण-बिन्दु

    (क) तृतीया विभक्ति

  • साधन (उपकरण) के अर्थ में: हिरण्यकशिपुः खड्गेन स्तम्भं भञ्जयति। बालकः लेखन्या लिखति। पितामहः चषकेण क्षीरं पिबति।
  • क्रियाविशेषण / स्वभाव बताने में: हिरण्यकशिपुः आश्चर्येण आह। नृसिंहः क्रोधेन गर्जति।
  • (ख) तृतीया के रूप (एक, द्वि, बहु)

  • पुं.: बालकेन, बालकाभ्याम्, बालकैः; वृक्षेण, वृक्षाभ्याम्, वृक्षैः; तेन, ताभ्याम्, तैः; केन, काभ्याम्, कैः
  • स्त्री.: छात्रया, छात्राभ्याम्, छात्राभिः; गदया, गदाभ्याम्, गदाभिः; तया, ताभ्याम्, ताभिः; कया, काभ्याम्, काभिः
  • नपुं.: वनेन, वनाभ्याम्, वनैः; पुस्तकेन, पुस्तकाभ्याम्, पुस्तकैः; फलेन, फलाभ्याम्, फलैः
  • (ग) लृट् लकार (भविष्यत्काल) – पठ्

  • प्रथमपुरुषः: पठिष्यति, पठिष्यतः, पठिष्यन्ति
  • मध्यमपुरुषः: पठिष्यसि, पठिष्यथः, पठिष्यथ
  • उत्तमपुरुषः: पठिष्यामि, पठिष्यावः, पठिष्यामः
  • (घ) गुण सन्धि (अभ्यास ६)

    अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ

  • रमा + ईशः = रमेशः; सुर + ईश्वरः = सुरेश्वरः; गज + इन्द्रः = गजेन्द्रः; माता + इव = मातेव
  • पर + उपकारः = परोपकारः; सूर्य + उदयः = सूर्योदयः; तस्य + उपरि = तस्योपरि
  • योग्यताविस्तर

  • यह कथा नरसिंहपुराण और श्रीमद्भागवतपुराण में है; इन पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास हैं, जिन्होंने अठारह पुराण लिखे।
  • जनश्रुति के अनुसार बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी ग्राम में सिकलीगढ धरहरा वह स्थान है जहाँ नृसिंह-अवतार हुआ; वहाँ माणिक्य नामक विशाल स्तम्भ है और लोग भस्म और मिट्टी से होली खेलते हैं।
  • शास्त्रों में होलिकोत्सव को 'वासन्तीय-नवसस्येष्टिः' कहा गया है; होलकः = तिनकों की आग में भुना अधपका अनाज (हिन्दी में 'होरा')।
  • अभ्यास-संकेत

  • एकपद उत्तर: दैत्यराजः – हिरण्यकशिपुः; किस से गिराया – उत्तुङ्गशिखरात्; वर किससे – ब्रह्मदेवात्; हरि सर्वत्र है, कौन कहता है – प्रह्लादः।
  • लृट् में बदलना: सा आपणं गच्छति → गमिष्यति; अहं नित्यं पठामि → पठिष्यामि; वयं श्लोकान् स्मरामः → स्मरिष्यामः; ते बालिके वैद्ये भवतः → भविष्यतः।
  • तृतीया भरना: (खड्ग) → खड्गेन; (पददलन) → पददलनेन; (शिक्षिका) → शिक्षिकया; (निजनख) → निजनखैः।
  • सामान्य भूलें

  • होलिका को हिरण्यकशिपु की बड़ी बहन लिखना – पाठ में वह अनुजा (छोटी बहन) है; प्रह्लाद की बुआ।
  • होलिका के जलने का कारण न लिखना – कारण: ब्रह्मा के वर का दुरुपयोग।
  • 'सह' के साथ भी तृतीया लगती है, इसे भूलना – शिक्षिकया सह।
  • गुण सन्धि में 'ऐ/औ' लिखना – अ + इ = ए, अ + उ = ओ (वृद्धि नहीं)।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓'ईशावास्यमिदं सर्वम्' – समस्त जगत् ईश्वर से व्याप्त है; ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, सर्वत्र है
    • ✓प्रह्लाद-नृसिंह नाटक: हिरण्यकशिपु का अहंकार, होलिका का दहन (वर के दुरुपयोग से), स्तम्भ से नृसिंह का प्रकट होना
    • ✓तृतीया विभक्ति – साधन (खड्गेन, लेखन्या) और रीति/स्वभाव (क्रोधेन, आश्चर्येण) के अर्थ में
    • ✓लृट् लकार (भविष्यत्काल) – पठिष्यति, पठिष्यसि, पठिष्यामि आदि
    • ✓गुण सन्धि – रमेशः, गजेन्द्रः, परोपकारः, सूर्योदयः

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पाठ शुरू करने से पहले पूछें – 'ईश्वर कहाँ है?' – उत्तरों को बोर्ड पर लिखकर 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' से जोड़ें
    • →नाटक का पात्र-वितरण करके कक्षा में पूरा अभिनय कराएँ (राजभट, मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, होलिका, प्रह्लाद, नृसिंह, अध्यापिका)
    • →नृसिंह के 'न भुवि, न स्वर्गे...' संवाद को दो स्तम्भों (ब्रह्मा का वर / नृसिंह का उपाय) में लिखवाकर तर्क समझाएँ
    • →कक्षा की वस्तुओं से तृतीया के वाक्य बनवाएँ – 'अहं लेखन्या लिखामि', 'सः दण्डेन क्रीडति'
    • →लृट् लकार के लिए 'कल आप क्या करेंगे?' पूछकर संस्कृत में उत्तर दिलवाएँ
    • →होली पर्व से जुड़ी योग्यताविस्तर की जानकारी (वासन्तीय-नवसस्येष्टि, होलक) पर चर्चा करें
    • →परियोजना: किसी पुराण की एक कथा संग्रह कर कक्षा में सुनाने को कहें

    📋 Assessment Questions

    1. प्रह्लाद को मारने के लिए किए गए तीन उपाय पाठ के शब्दों में बताइए।
    2. अग्नि ने होलिका को क्यों जला दिया?
    3. नृसिंह ने ब्रह्मा के वर का उल्लंघन किए बिना हिरण्यकशिपु को कैसे मारा?
    4. 'वयं श्लोकान् स्मरामः' को लृट् लकार में बदलिए।
    5. 'सुर + ईश्वरः' और 'पर + उपकारः' की सन्धि कीजिए।

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