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णमो अरिहन्ताणम् – Class 9 Sanskrit Chapter 10 Notes & NCERT PDF

Class 9SanskritChapter 10NCERT book: शारदा (Sharada) - Sanskrit Class 9

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पाठ 10: णमो अरिहन्ताणम् (अरिहन्तों को नमस्कार — ऋषभदेव का जीवन)

पाठ-परिचय

दशमः पाठः — णमो अरिहन्ताणम् (अरिहन्तों को नमस्कार)

यह पाठ जैन परम्परा के प्रथम तीर्थङ्कर ऋषभदेव (आदिनाथ) के जीवन पर आधारित है — एक आदर्श राजा से महामुनि बनने तक की यात्रा। साथ ही जैन धर्म के परम मन्त्र णमोकार (नवकार) मन्त्र, जैन सिद्धान्तों और प्राकृत भाषा का परिचय दिया गया है।

पाठ-सार

राजा नाभि और राजकुमार ऋषभ

युगों के आरम्भ में नाभि नामक प्रजाप्रिय महाराज थे — राजनीति, युद्धतन्त्र और प्रशासन में समर्थ। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और करुणाशालिनी थीं। उनके प्रिय पुत्र ऋषभ सर्वगुणसम्पन्न, विद्वान् और राजनीतिज्ञ थे।

ऋषभ का राज्य और सुधार

समाज में दुर्भिक्ष और परस्पर विद्वेष फैलने पर नाभि ने इसे ऋषभ की राजनीति की परीक्षा का समय मानकर उन्हें राज्य सौंपा। ऋषभ ने समस्याओं के मूल पर चिन्तन किया और पाया कि मूल समस्याएँ हैं — जनों का आलस्य, कृषि-कार्य में कमी और उत्पादन-क्षमता का अभाव। उन्होंने प्रजा को जीवन-कौशल सिखाए — कृषि, विविध पदार्थों से भोजन-निर्माण, तन्तुओं से वस्त्र-निर्माण, गाय-अश्व आदि पशुपालन, तथा लकड़ी, धातु और पत्थर से बर्तन, घर और नगर-निर्माण। लोग सक्रिय हुए, आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई और राज्य फिर सुभिक्ष हो गया।

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

(प्रजा के सुख में राजा का सुख है और प्रजा के हित में राजा का हित; राजा का हित अपना प्रिय करने में नहीं, प्रजा का प्रिय करने में है।)

उनके कुशल शासन से विनिता नामक नगर का निर्माण हुआ और प्रजा उन्हें प्रेम से राजा ऋषभदेव कहने लगी। उनके सौ पुत्रों में भरत और बाहुबलि विशेष प्रसिद्ध थे; पुत्रियाँ ब्राह्मी और सुन्दरी गणित आदि शास्त्रों में प्रवीण थीं। जैन परम्परा के अनुसार ब्राह्मी लिपि का विकास ब्राह्मी ने किया।

जीवन-परिवर्तन की घटना

दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम् ।
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम् ॥

एक बार राजमहल में नृत्य-प्रदर्शन के समय एक नर्तकी अचानक गिरकर मर गई। इससे ऋषभदेव का मन विक्षुब्ध हुआ — जीवन क्या है, कैसे जीना चाहिए? संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं — यह सोचकर उन्होंने सब त्यागकर भिक्षु-रूप में प्रस्थान किया। राज्य बाँटते हुए विनिता भरत को और तक्षशिला बाहुबलि को सौंपी।

उपवास और पारणा

वन में मौन, ध्यान और अध्ययन में लीन रहकर वे भोजन भी भूल जाते थे। मौन रहकर भिक्षा माँगने पर लोग अपने प्रिय महाराज को आभूषण और अमूल्य वस्तुएँ देते, भोजन नहीं। इस प्रकार उन्होंने एक बार चार सौ (४००) दिन तक लगातार उपवास किया। अन्त में हस्तिनापुर के पास उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने अपने गन्ने के खेत से उन्हें इक्षुरस (गन्ने का रस) दिया और उपवास समाप्त हुआ — वह दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया था। इसीलिए जैन सम्प्रदाय में "वर्षीतप-पारणा-महोत्सव" आज भी गुजरात के पालीताणा और उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर आदि तीर्थों में मनाया जाता है — तेरह महीने एकान्तर दिनों में उपवास करके अक्षय तृतीया को इक्षुरस से पारणा की जाती है।

केवलज्ञान और जैन सङ्घ

दीर्घ उपवास, अध्ययन और कठोर तप से ऋषभदेव ने फाल्गुन कृष्ण एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवट के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। वे जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीर्थङ्कर हैं, इसलिए "आदिनाथ" कहलाते हैं। उन्होंने भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक, श्राविका — यह क्रम बनाया, जो जैन सङ्घ कहलाता है।

णमोकार (नवकार) मन्त्र — प्राकृत भाषा में

णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ॥

अर्थ — अरिहन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, लोक के सभी साधुओं को नमस्कार। यह मन्त्र पञ्चपरमेष्ठियों (अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधु) को प्रणाम है। प्रतिवर्ष ९ अप्रैल को जैन जन सामूहिक जप करते हैं — यह "नवकार महामन्त्र दिवस" कहलाता है।

जैन सिद्धान्त

  • अहिंसा परमो धर्मः — मन, वचन और कर्म से अहिंसा।
  • अनेकान्तवादः — सत्य के अनेक पक्ष होते हैं।
  • स्याद्वादः — हर कथन सापेक्ष, "स्यात्" रूप से ग्राह्य।
  • अपरिग्रहः — आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना।
  • त्रिरत्न — सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र।
  • पञ्चमहाव्रत — सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य।
  • शब्दार्थ

  • अधीतविद्यः — जिसने विद्या पढ़ी हो (बहुव्रीहि)
  • अनर्घवस्तूनि — अमूल्य वस्तुएँ
  • अनुयायिनः — अनुयायी
  • अरिहन्ताणम् — अरिहन्तों (शत्रुओं/विकारों को जीतने वालों) का
  • इक्षुक्षेत्रम् — गन्ने का खेत
  • इक्षुरसः — गन्ने का रस
  • दुर्भिक्षम् — अकाल; सुभिक्षम् — अन्न की भरपूरता
  • विक्षुब्धम् — व्याकुल
  • केवलज्ञानम् — पूर्ण ज्ञान
  • अपरिग्रहः — आवश्यकता से अधिक ग्रहण न करना
  • अनेकान्तवादः — सत्य के बहुपक्ष का सिद्धान्त
  • व्याकरण-बिन्दु (प्राकृत भाषा)

  • भारत में कभी अनेक प्राकृत भाषाएँ सामान्य जनों की बोलचाल थीं — आर्षप्राकृत, मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, चूलिका, अपभ्रंश आदि।
  • जैन आगम अर्धमागधी में लिखे गए; महाकवि हाल ने महाराष्ट्री प्राकृत में गाथासप्तशती लिखी; शौरसेनी में अनेक नाट्यग्रन्थ रचे गए।
  • पाठ की उपमा — संस्कृत यदि नदी है तो प्राकृत उसी का सरल प्रवाह है।
  • संस्कृत → प्राकृत उदाहरण:
  • - सः जलं पिबति → सो जलं पिवइ

    - बालकः पद्यं पठति → बालओ पोत्थं पढइ

    - अहं फलानि खादामि → अहं फलाइं / फलाणि खामि

  • समास (अभ्यास ३): महाराजः (महान् च असौ राजा च — कर्मधारय), प्रजासुखम् (प्रजानां सुखम् — षष्ठी-तत्पुरुष), मूलसमस्याः (कर्मधारय), भोजननिर्माणम् (षष्ठी-तत्पुरुष)।
  • अभ्यास-संकेत

  • एकपद-उत्तर: नगर — विनिता; प्रसिद्ध कन्याएँ — ब्राह्मी, सुन्दरी; विनिता राज्य — भरताय; बाहुबलि को — तक्षशिला; प्रजा भिक्षा में देती थी — आभरणानि, अनर्घवस्तूनि।
  • पूर्णवाक्य-उत्तर में घटनाओं का क्रम और स्थान-काल (अक्षय तृतीया, फाल्गुन कृष्ण एकादशी, प्रयागराज) सही लिखें।
  • सामान्य भूलें

  • ऋषभदेव को महावीर स्वामी समझ लेना — ऋषभदेव प्रथम तीर्थङ्कर (आदिनाथ) हैं।
  • विनिता और तक्षशिला उलट देना — विनिता भरत को, तक्षशिला बाहुबलि को।
  • उपवास तोड़ने वाले को पुत्र लिखना — श्रेयांस प्रपौत्र था।
  • णमोकार मन्त्र को संस्कृत मानना — यह प्राकृत भाषा में है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓प्रथम तीर्थङ्कर ऋषभदेव (आदिनाथ) का जीवन — आदर्श राजा से महामुनि तक
    • ✓प्रजाहितकारी शासन: समस्या के मूल (आलस्य, कृषि-न्यूनता, उत्पादन-अभाव) का समाधान और कौशल-प्रशिक्षण
    • ✓अक्षय तृतीया, इक्षुरस-पारणा और वर्षीतप-पारणा-महोत्सव का सम्बन्ध
    • ✓णमोकार (नवकार) मन्त्र, पञ्चपरमेष्ठी, त्रिरत्न, पञ्चमहाव्रत और जैन सिद्धान्त
    • ✓प्राकृत भाषाएँ और संस्कृत-प्राकृत का सम्बन्ध

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →ऋषभदेव के जीवन की घटनाओं की समय-रेखा (टाइमलाइन) बोर्ड पर बनवाएँ
    • →'राजा ने समस्या का मूल कैसे खोजा' पर चर्चा — आज की समस्या-समाधान पद्धति से जोड़ें
    • →नवकार मन्त्र का शुद्ध उच्चारण कराएँ और प्रत्येक पद का अर्थ कार्ड पर लिखवाएँ
    • →जैन सिद्धान्तों (अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकान्त) पर दैनिक-जीवन उदाहरण सहित चर्चा
    • →संस्कृत वाक्यों का प्राकृत रूपान्तरण देखकर समानताएँ खोजने की गतिविधि
    • →मानचित्र पर विनिता (अयोध्या क्षेत्र), तक्षशिला, हस्तिनापुर, पालीताणा, प्रयागराज दिखाएँ
    • →समास-अभ्यास को पाठ के शब्दों से बोर्ड पर हल कराएँ

    📋 Assessment Questions

    1. ऋषभदेवस्य मते जनानां मूलसमस्याः काः आसन्?
    2. ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत्?
    3. दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथं कदा च अभवत्?
    4. णमोकारमन्त्रः केभ्यः प्रणामं समर्पयति?
    5. जैनमतस्य चत्वारः सिद्धान्ताः के?

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    1. 1. सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
    2. 2. सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
    3. 3. आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
    4. 4. न खलु वयस्तेजसो हेतुः
    5. 5. एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी
    6. 6. मनःपूतं समाचरेत्
    7. 7. उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
    8. 8. अन्नाद् आनन्दं प्रति
    9. 9. कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
    10. 10. णमो अरिहन्ताणम्
    11. 11. वर्णोच्चारण-शिक्षा २
    12. 12. परिशिष्टम् १: अन्वयः
    13. 13. परिशिष्टम् २: समासः
    14. 14. परिशिष्टम् ३: वाच्यम्
    15. 15. परिशिष्टम् ४: शब्दरूपाणि
    16. 16. परिशिष्टम् ५: धातुरूपाणि