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वर्णोच्चारण-शिक्षा २ – Class 9 Sanskrit Chapter 11 Notes & NCERT PDF

Class 9SanskritChapter 11NCERT book: शारदा (Sharada) - Sanskrit Class 9

Notes and a simple summary of Chapter 11 of the NCERT Class 9 Sanskrit book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

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वर्णोच्चारण-शिक्षा २ (वर्णों के शुद्ध उच्चारण की शिक्षा – आभ्यन्तर-प्रयत्न)

पाठ-परिचय

यह पाठ पिछली कक्षा के 'वर्णोच्चारण-शिक्षा' पाठ का अगला भाग है। वहाँ हमने पढ़ा था कि मुख (आस्य) के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं —

  • (क) स्थानम् – जहाँ से वर्ण बोला जाता है
  • (ख) करणम् – जो अंग स्थान की ओर जाता है (प्रायः जिह्वा)
  • (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः – करण जिस प्रकार का प्रयास करके स्थान को छूता है या उसके पास जाता है
  • छह स्थान और छह करण पिछली कक्षा में पढ़े जा चुके हैं। इस पाठ में तीसरे तत्त्व — आभ्यन्तर-प्रयत्न — को विस्तार से समझाया गया है।

    पाठ-सार

    आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः — 'आभ्यन्तर-प्रयत्नः' इति उच्यते ।

    (मुख के भीतर करण जिस प्रयत्न से स्थान को छूता है या स्थान के पास जाता है, वह 'आभ्यन्तर-प्रयत्न' कहलाता है।)

    आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति —

    (१) स्पृष्ट-प्रयत्नः

  • करण जब स्थान को स्पष्ट रूप से छूता है (स्पष्टरूपेण स्पृशति)।
  • इससे स्पर्श-व्यञ्जन (क से म तक, २५ वर्ण) उत्पन्न होते हैं।
  • (२) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः

  • करण जब स्थान को थोड़ा-सा ही छूता है (स्वल्पम् एव स्पृशति)।
  • इससे अन्तःस्थ-व्यञ्जन — य, र, ल, व (अर्ध-स्वर, ४ वर्ण) उत्पन्न होते हैं।
  • (३) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः

  • करण स्थान को छूता नहीं, परन्तु स्थान के बहुत पास जाता है; दोनों के बीच 'लघुः विवरः' (बहुत छोटा-सा अन्तराल) बनता है।
  • इससे ऊष्म-व्यञ्जन — श, ष, स, ह तथा अयोगवाह — अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः) उत्पन्न होते हैं।
  • (४) विवृत-प्रयत्नः

  • करण स्थान को नहीं छूता, बल्कि स्थान के कुछ पास जाता है; बीच में 'स्फुटः विवरः' (स्पष्ट खुला अन्तराल) बनता है।
  • इससे अ-कार को छोड़कर शेष सभी स्वर बोले जाते हैं।
  • (५) संवृत-प्रयत्नः

  • 'अ-वर्ण' के तीन उपभेद हैं — अ (ह्रस्व), आ (दीर्घ), अ३ (प्लुत)। तीनों कण्ठ्य स्वर हैं।
  • कण्ठ्य वर्णों में स्वस्थानम् एव करणम् — स्थान भी कण्ठ (कण्ठ का पृष्ठ-भाग) और करण भी कण्ठ (कण्ठ का अग्र-भाग)।
  • आ और अ३ के उच्चारण में कण्ठ में स्पष्ट अन्तराल रहता है, इसलिए उनका प्रयत्न विवृत है।
  • परन्तु ह्रस्व अ बोलते समय कण्ठ सिकुड़ता (संकुचित/संकीर्ण) है — इस संकोच को 'संवृतम्' कहते हैं। अतः केवल ह्रस्व अ-कार का प्रयत्न संवृत है, और यह केवल कण्ठ-स्थान में होता है।
  • पाठ बाँसुरी का सुन्दर उदाहरण देता है — उँगलियाँ करण जैसी, बाँसुरी के छिद्र स्थान जैसे, और उँगली का छिद्र की ओर प्रयास आभ्यन्तर-प्रयत्न जैसा है।

    प्रयत्न के अनुसार वर्ण-संख्या (पाठ के अनुसार)

  • विवृत-प्रयत्न – २१ स्वर
  • संवृत-प्रयत्न – १ (ह्रस्व अ)
  • स्पृष्ट-प्रयत्न – २५ स्पर्श
  • ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न – ४ अन्तःस्थ
  • ईषद्-विवृत-प्रयत्न – ४ ऊष्म + २ अयोगवाह
  • स्वर और व्यञ्जन में भेद

  • स्वर स्वतन्त्र वर्ण है — उच्चारण के लिए किसी अन्य वर्ण की आवश्यकता नहीं; एकमात्र/द्विमात्र/त्रिमात्र होता है।
  • व्यञ्जन परतन्त्र वर्ण है — उच्चारण के लिए आधार-स्वर चाहिए; नित्य अर्धमात्र होता है।
  • समानाक्षर स्वर एक-स्थानी हैं और उनमें ह्रस्व उपभेद होता है (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत तीनों); सन्ध्यक्षर (ए, ऐ, ओ, औ) द्वि-स्थानी हैं, उनमें ह्रस्व नहीं होता (दीर्घ-प्लुत दो ही)। 'ऌ' का दीर्घ नहीं होता।
  • अयोगवाह (अं, अः) विशिष्ट व्यञ्जन हैं — इनका आधार-स्वर सदा पहले आता है।
  • स्थान-करण (पाठ की तालिका से)

  • कण्ठ्य – स्थान कण्ठ, करण कण्ठ (स्वस्थान)
  • तालव्य – स्थान तालु, करण जिह्वा-मध्य
  • मूर्धन्य – स्थान मूर्धा, करण जिह्वा-उपाग्र
  • दन्त्य – स्थान दन्त, करण जिह्वा-अग्र
  • ओष्ठ्य – स्थान ओष्ठ, करण ओष्ठ (स्वस्थान)
  • नासिक्य – स्थान नासिका, करण नासिका (स्वस्थान)
  • पाणिनीय-शिक्षा-सूत्र (स्वाध्यायान्मा प्रमदः)

    स्पृष्टकरणाः स्पर्शाः । ईषत्स्पृष्टकरणा अन्तःस्थाः । ईषद्विवृतकरणा ऊष्माणः । विवृतकरणाः स्वराः । संवृतस्त्वकारः ।

    प्रयत्न दो प्रकार का है — आभ्यन्तर और बाह्य। इस पाठ में केवल आभ्यन्तर-प्रयत्न की चर्चा है।

    शब्दार्थ

  • प्रयत्नः – उच्चारण में लगाया जाने वाला बल/दबाव
  • आभ्यन्तरम् – भीतर स्थित
  • स्पृष्टः – छुआ हुआ
  • ईषत् – थोड़ा
  • विवृतः – खुला हुआ
  • विवरः – अन्तराल, छिद्र
  • संवृतः – सिकुड़ा हुआ
  • संकोचः – सिकुड़ना
  • आस्यम् – मुख
  • करणम् – उच्चारण में सहायक अंग
  • अयोगवाहौ – अनुस्वार और विसर्ग
  • ऊष्माणः – श, ष, स, ह
  • अभ्यास-संकेत

  • मेलन (प्रश्न ३): विवृत – ॠ; स्पृष्ट – ध्; ईषत्-स्पृष्ट – व्; ईषद्-विवृत – श्; संवृत – अ।
  • आम्/न (प्रश्न ४): 'ई' सन्ध्यक्षर नहीं (समानाक्षर) – न; 'ऐ' सन्ध्यक्षर – आम्; 'झ' स्पर्श – आम्; 'र' स्पर्श नहीं (अन्तःस्थ) – न; 'य, र, ल, व' ऊष्म नहीं (अन्तःस्थ) – न।
  • एक पद में उत्तर: तत्त्व – त्रीणि; स्थान – षट्; प्रयत्न – पञ्चविधः; अ-वर्ण के उपभेद – त्रयः; संवृत – कण्ठे (केवल अ-कारस्य)।
  • सामान्य भूलें

  • 'आ' और 'अ' दोनों का प्रयत्न संवृत मान लेना — संवृत केवल ह्रस्व अ का है; आ और अ३ विवृत हैं।
  • अनुस्वार-विसर्ग को स्पर्श मान लेना — ये ईषद्-विवृत प्रयत्न वाले अयोगवाह हैं।
  • 'र' को स्पर्श मानना — य, र, ल, व अन्तःस्थ (ईषत्-स्पृष्ट) हैं।
  • ईषत्-स्पृष्ट (थोड़ा छूना) और ईषद्-विवृत (थोड़ा खुला, छूना नहीं) को आपस में मिला देना।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓वर्ण-उत्पत्ति के तीन तत्त्व — स्थान, करण और आभ्यन्तर-प्रयत्न
    • ✓आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँच भेद — स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत, संवृत
    • ✓कौन-से वर्ण किस प्रयत्न से बोले जाते हैं (स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, अयोगवाह, स्वर)
    • ✓केवल ह्रस्व अ-कार का संवृत प्रयत्न — कण्ठ में संकोच
    • ✓स्वर-व्यञ्जन, समानाक्षर-सन्ध्यक्षर के परस्पर भेद और पाणिनीय-शिक्षा-सूत्र

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →बाँसुरी का उदाहरण कक्षा में दिखाएँ — उँगली (करण), छिद्र (स्थान), दबाव (प्रयत्न)
    • →छात्रों से 'क', 'य', 'श', 'आ', 'अ' एक-एक करके बोलवाएँ और जीभ की स्थिति महसूस करने को कहें
    • →पाँच प्रयत्नों का बोर्ड पर चार्ट बनवाएँ — प्रयत्न, स्पर्श की मात्रा, वर्ण-समूह, संख्या
    • →'आ' और 'अ' का अन्तर दर्पण के सामने बोलकर दिखाएँ — ह्रस्व अ में कण्ठ सिकुड़ता है
    • →पाणिनीय-शिक्षा-सूत्रों को सस्वर पाठ करवाएँ और हर सूत्र का अर्थ छात्रों से पूछें
    • →मेलन और आम्/न वाले अभ्यास को जोड़ी में हल करवाएँ
    • →वर्ण-पत्तियों (flash cards) से 'प्रयत्न पहचानो' खेल करवाएँ

    📋 Assessment Questions

    1. आभ्यन्तर-प्रयत्न की परिभाषा संस्कृत में दे सकता है?
    2. दिए गए वर्ण (जैसे व्, श्, ध्, ॠ, अ) का प्रयत्न सही बता सकता है?
    3. ह्रस्व अ और दीर्घ आ के प्रयत्न का अन्तर समझा सकता है?
    4. स्वर-व्यञ्जन तथा समानाक्षर-सन्ध्यक्षर के भेद बता सकता है?
    5. पाणिनीय-शिक्षा के पाँच सूत्रों का अर्थ लिख सकता है?

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    All chapters in शारदा (Sharada) - Sanskrit Class 9

    1. 1. सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
    2. 2. सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
    3. 3. आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
    4. 4. न खलु वयस्तेजसो हेतुः
    5. 5. एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी
    6. 6. मनःपूतं समाचरेत्
    7. 7. उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
    8. 8. अन्नाद् आनन्दं प्रति
    9. 9. कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
    10. 10. णमो अरिहन्ताणम्
    11. 11. वर्णोच्चारण-शिक्षा २
    12. 12. परिशिष्टम् १: अन्वयः
    13. 13. परिशिष्टम् २: समासः
    14. 14. परिशिष्टम् ३: वाच्यम्
    15. 15. परिशिष्टम् ४: शब्दरूपाणि
    16. 16. परिशिष्टम् ५: धातुरूपाणि