TalentJR

फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया – Class 12 Hindi Chapter 12 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 12NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

Notes and a simple summary of Chapter 12 of the NCERT Class 12 Hindi book, with the official chapter PDF, flashcards, an MCQ quiz and an AI tutor for your doubts.

🎧 Listen to the content

पाठ 12: फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया

परिचय

'संवदिया' फणीश्वरनाथ 'रेणु' की प्रसिद्ध आंचलिक कहानी है। 'संवदिया' का अर्थ है संदेशवाहक, यानी वह व्यक्ति जो गाँव-गाँव जाकर लोगों का संवाद ज्यों-का-त्यों पहुँचाता है। कहानी में जलालगढ़ गाँव का संवदिया हरगोबिन बड़ी हवेली की विधवा बड़ी बहुरिया का दुख भरा संदेश उसके मायके ले जाता है, पर वहाँ पहुँचकर उसे सुना नहीं पाता। कहानी असहाय, सहनशील नारी के दुख, संयुक्त परिवार के बिखराव और गाँव की आत्मीयता का मार्मिक चित्र है। पाठ-परिचय के शब्दों में, लोकभाषा की नींव पर खड़ी यह कहानी "पहाड़ी झरने की तरह गतिमान" है।

लेखक परिचय

  • जीवनकाल: फणीश्वरनाथ 'रेणु' (सन् 1921–1977)। जन्म बिहार के पूर्णिया ज़िले के औराही हिंगना गाँव में।
  • राजनीतिक जीवन: सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में भाग लिया; नेपाल के राणाशाही-विरोधी आंदोलन में सक्रिय भूमिका; प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक।
  • साहित्य: सन् 1953 से साहित्य-सृजन; कहानी, उपन्यास और निबंध लिखे।
  • प्रमुख कृतियाँ: कहानी-संग्रह ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक; कहानी तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम (जिस पर फ़िल्म बनी); उपन्यास मैला आँचल और परती परिकथा।
  • विशेषता: हिंदी के प्रमुख आंचलिक कथाकार, जिन्होंने अंचल-विशेष की शब्दावली, मुहावरों और लोकजीवन का चित्रण किया। उन्होंने प्रेमचंद की विरासत को नई पहचान दी और गहरी मानवीय संवेदना से अभावग्रस्त जनता की पीड़ा को स्वर दिया।
  • पाठ का सार

    1. हरगोबिन की बुलाहट

    डाकघर के ज़माने में भी संवदिया की ज़रूरत पड़ी, इस पर हरगोबिन को अचरज हुआ। उसने अंदाज़ लगाया कि कोई गुप्त संवाद है, जिसे "चाँद-सूरज को भी नहीं मालूम हो। परेवा-पंछी तक न जाने।"

    2. बड़ी हवेली की दशा

    बड़ी हवेली "अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है।" कभी वहाँ नौकर-नौकरानियों की भीड़ रहती थी; आज बड़ी बहुरिया स्वयं सूप में अनाज फटक रही है। बड़े भैया की एक घंटे की बीमारी में मृत्यु के बाद तीनों देवरों में झगड़ा हुआ, रैयतों ने ज़मीन दबा ली और भाई शहर जा बसे। बँटवारे में बड़ी बहुरिया की देह से ज़ेवर छीने गए, बनारसी साड़ी के तीन टुकड़े किए गए। हरगोबिन ने "अपनी आँखों से द्रौपदी चीर-हरण लीला" देखी थी।

    3. मोदिआइन प्रसंग

    उधार का तगादा करने बैठी मोदिआइन को हरगोबिन ने "काबुली-कायदा" कहकर छेड़ा। पाँच साल पहले गुल मुहम्मद आगा उधार कपड़ा बेचता था और वसूली में एक का दो लेता था; लोगों ने उसकी मरम्मत कर दी थी। तब से मोदिआइन 'काबुली' नाम से चिढ़ती है। यह प्रसंग हास्य के साथ बड़ी बहुरिया की कर्ज़दारी भी दिखाता है।

    4. बड़ी बहुरिया का संवाद

    सिसकते हुए बड़ी बहुरिया ने कहा कि माँ से कहना: वह भाई-भाभियों की नौकरी करके, बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहेगी, पर यहाँ नहीं रहेगी; माँ न ले गई तो "गले में घड़ा बाँधकर पोखरे में डूब मरूँगी"; "बथुआ-साग खाकर कब तक जीऊँ? किसलिए... किसके लिए?" देवर-देवरानियाँ केवल अगहनी धान और आम के मौसम में आकर अनाज-आम ले जाते हैं। बड़ी बहुरिया ने राह-खर्च के लिए पाँच रुपए का एक गंदा नोट दिया, पर हरगोबिन ने नहीं लिया।

    5. संवदिया का धर्म

    संवाद का हर शब्द याद रखना और उसी सुर-स्वर में सुनाना "सहज काम नहीं।" गाँव वाले संवदिया को निठल्ला, कामचोर, पेटू और "औरतों का गुलाम" समझते हैं ("न आगे नाथ, न पीछे पगहा"), पर हरगोबिन ने गाँव की हर माँ-बहू-बेटी का संवाद पहुँचाया है। ऐसा संवाद वह पहली बार ले जा रहा था।

    6. यात्रा और मन का द्वंद्व

    रेलगाड़ी में संवाद के शब्द "काँटे की तरह" चुभते रहे। कटिहार में भोंपे की घोषणा सुनकर उसे लगा कि "सचमुच सुराज हुआ है।" थाना बिंहपुर पहुँचकर उसके पैर गाँव की ओर बढ़ ही नहीं रहे थे: "गाँव की लक्ष्मी ही गाँव छोड़कर जावेगी!" लोग उसके गाँव का नाम लेकर थूकेंगे।

    7. मायके में झूठ

    बूढ़ी माता के पूछने पर हरगोबिन ने कहा कि कोई संवाद नहीं है; वह सिरसिया आया था, इसलिए दर्शन करने चला आया। उसने यह भी गढ़ दिया कि बड़ी बहुरिया दशहरे पर गंगाजी के मेले में आकर मिलेगी और सारी गृहस्थी उसी पर है। थाली में दाल-भात, तीन किस्म की भाजी, घी, पापड़ और अचार देखकर उसे बथुआ-साग खाती बड़ी बहुरिया याद आई और वह खा नहीं सका। रातभर नींद नहीं आई। सुबह सच बताने का निश्चय किया, पर फिर भी नहीं कह सका और लौटने की अनुमति माँगी। माँ ने बेटी के लिए बासमती धान का चूड़ा भेजा।

    8. बीस कोस की पैदल यात्रा

    पैसे केवल कटिहार तक के टिकट के थे। रास्ते में निरगुन गाने वाले सूरदास के गीत ("भाई रोओ मति, यही करम की गति") से उसका मन स्थिर हुआ। कटिहार से जलालगढ़ बीस कोस वह भूखा-प्यासा पैदल चला। चूड़े की पोटली से उसने एक मुट्ठी भी नहीं खाई। अंत में वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

    9. अंत: संकल्प

    होश आने पर उसने बड़ी बहुरिया के पैर पकड़ लिए: "मुझे माफ़ करो। मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका... तुम गाँव छोड़कर मत जाओ... मैं तुम्हारा बेटा! ... तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो! मैं अब निठल्ला बैठा नहीं रहूँगा।" बड़ी बहुरिया गरम दूध में बासमती चूड़ा मसकने लगी; संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी।

    पात्र-विश्लेषण

  • हरगोबिन: कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील, स्वाभिमानी (राह-खर्च नहीं लिया, "किसी बात की कमी नहीं" कहा); गाँव की मर्यादा का रक्षक। उसका झूठ स्वार्थ का नहीं, करुणा और गाँव-प्रेम का झूठ है।
  • बड़ी बहुरिया: परिस्थितियों की मारी पर स्वाभिमानी, सहनशील, 'गाँव की लक्ष्मी'। उसका दुख संयुक्त परिवार के स्वार्थ और स्त्री की असहायता का प्रतीक है।
  • बूढ़ी माता: स्नेहमयी; बेटी को बुलाना चाहती है और सौगात भेजती है।
  • मूल संवेदना: गाँव एक परिवार है। 'सवांग' (अपना आदमी) न होते हुए भी "बड़ी बहुरिया का तो सारा गाँव ही परिवार है।"
  • भाषा-शैली

  • आंचलिक भाषा: पाँवलागी, मायजी, बहुरिया, मोदिआइन, निमौछिये, अफरना, हिकरना, चूड़ा, बथुआ-साग।
  • लोकगीत: "हमारो संवाद ले ले जाहु रे संवदिया-या-या!", निरगुन "नैहरा को सुख सपन भयो अब..."।
  • चेतना-प्रवाह और बिंब: अंतिम दृश्य में बेहोशी की अवस्था ("नदी है! ...नदी नहीं, खेत हैं... ये झोंपड़े हैं या हाथियों का झुंड?")।
  • मुहावरे: रोम-रोम कलपना, कलेजा धड़कना, खून सूख जाना, आगे नाथ न पीछे पगहा।
  • प्रश्नवाचक वाक्यों ("किसलिए... किसके लिए?") से मन का द्वंद्व प्रकट होता है।
  • बोर्ड परीक्षा फोकस

  • हरगोबिन बड़ी बहुरिया का संवाद क्यों नहीं सुना सका? उत्तर-रूपरेखा: बड़ी बहुरिया को 'गाँव की लक्ष्मी' मानना; गाँव की बदनामी का डर (लोग गाँव का नाम लेकर थूकेंगे); बड़ी बहुरिया के चले जाने से गाँव सूना होने का दुख; आत्मीयता और संवेदना के कारण कलेजा न सँभलना।
  • संवदिया की विशेषताएँ और गाँववालों की धारणा: हर शब्द याद रखना, उसी सुर-स्वर में सुनाना, बिना मज़दूरी के काम; गाँववाले उसे निठल्ला, पेटू और औरतों का गुलाम समझते हैं।
  • "बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है" की व्याख्या: वैभव का पतन, बड़े भैया की मृत्यु, भाइयों का झगड़ा, रैयतों का दखल, बहुरिया का सूप फटकना।
  • अन्य: 'संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है' का आशय; जलालगढ़ पहुँचकर हरगोबिन का संकल्प; 'डिजिटल इंडिया' के दौर में संवदिया की भूमिका।
  • कठिन शब्द

  • संवदिया: संदेशवाहक
  • मारफ़त: माध्यम, ज़रिया
  • परेवा: कबूतर, तेज़ उड़ने वाला पक्षी
  • सूपा: सूप, छाज
  • रैयत: प्रजा, किसान
  • दखल: हस्तक्षेप, कब्ज़ा
  • हिकरना: बेचैन होकर पुकारना (रँभाना)
  • अफरना: भरपेट खाना
  • चूड़ा: चिड़वा
  • बहुरिया: पुत्रवधू
  • आगे नाथ न पीछे पगहा: कोई ज़िम्मेदारी न होना
  • कलेजा धड़कना: घबरा जाना
  • खून सूख जाना: बहुत अधिक डर जाना
  • अगहनी धान: अगहन (मार्गशीर्ष) महीने में कटने वाला धान
  • सवांग: अपना आदमी, परिवार का पुरुष सदस्य
  • सामान्य भूलें

  • हरगोबिन के झूठ को बेईमानी समझना; वह करुणा और गाँव की मर्यादा से उपजा है।
  • यह मान लेना कि बड़ी बहुरिया मायके चली गई; वह गाँव में ही रहती है और स्वयं पछता रही थी।
  • बड़ी बहुरिया का मायका (थाना बिंहपुर) और हरगोबिन का गाँव (जलालगढ़) आपस में उलट देना।
  • पैदल दूरी गलत लिखना: कटिहार से जलालगढ़ बीस कोस।
  • माँ की भेजी सौगात को 'दही-चूड़ा' लिखना; दही नहीं जम सका, केवल बासमती धान का चूड़ा भेजा गया।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓'संवदिया' रेणु की आंचलिक कहानी है, जिसमें संदेशवाहक हरगोबिन विधवा बड़ी बहुरिया का दुख भरा संवाद उसके मायके ले जाता है।
    • ✓बड़े भैया की मृत्यु, भाइयों के झगड़े और बँटवारे ने बड़ी हवेली को 'नाममात्र की' बना दिया; बड़ी बहुरिया बथुआ-साग खाकर जी रही है।
    • ✓गाँव की लक्ष्मी को गाँव छोड़ते देखने और गाँव की बदनामी के डर से हरगोबिन मायके में संवाद नहीं सुना पाता और झूठ बोल देता है।
    • ✓टिकट के पैसे न होने पर वह कटिहार से जलालगढ़ बीस कोस भूखा-प्यासा पैदल चलता है और बेहोश हो जाता है।
    • ✓अंत में वह बड़ी बहुरिया को 'सारे गाँव की माँ' कहकर उनकी सेवा का संकल्प लेता है; कहानी गाँव की आत्मीयता और मानवीय संवेदना का चित्र है।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →शुरुआत में पूछें कि मोबाइल-डाक से पहले संदेश कैसे पहुँचते थे; फिर 'संवदिया' शब्द और उसकी भूमिका समझाएँ।
    • →कहानी को तीन दृश्यों (हवेली, मायका, वापसी-यात्रा) में बाँटकर पढ़ाएँ और हर दृश्य में हरगोबिन की मनःस्थिति बोर्ड पर लिखें।
    • →बड़ी बहुरिया के संवाद और हरगोबिन के झूठ वाले अंश का नाट्य-पाठ कराएँ (योग्यता-विस्तार में नाट्य रूपांतरण भी सुझाया गया है)।
    • →आंचलिक शब्दों की एक सूची बनवाकर उनके मानक हिंदी रूप लिखवाएँ; रेणु की आंचलिकता की विशेषता स्पष्ट करें।
    • →नैतिक चर्चा कराएँ: क्या हरगोबिन का झूठ उचित था? विद्यार्थियों से तर्क सहित पक्ष-विपक्ष रखवाएँ।
    • →अंतिम बेहोशी वाले अनुच्छेद से बिंब और चेतना-प्रवाह शैली समझाएँ।
    • →प्रश्नवाचक वाक्य छाँटने (भाषा-शिल्प प्रश्न 2) का अभ्यास कक्षा में ही करा दें।

    📋 Assessment Questions

    1. क्या विद्यार्थी बता सकता है कि हरगोबिन संवाद क्यों नहीं सुना सका, और कम से कम तीन कारण दे सकता है?
    2. क्या वह संवदिया की विशेषताओं और गाँववालों की धारणा में अंतर स्पष्ट कर सकता है?
    3. क्या वह बड़ी हवेली के पतन का क्रम और बड़ी बहुरिया की विवशता पाठ के उदाहरणों से लिख सकता है?
    4. क्या वह 'द्रौपदी का चीरहरण', 'बथुआ साग खाकर कब तक जीऊँ' जैसी पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कर सकता है?
    5. क्या वह कहानी की आंचलिक भाषा और लोकगीतों की भूमिका पर टिप्पणी कर सकता है?

    👩‍🏫 Class 12 Hindi classes near you — online or at home

    Prefer a real teacher? TalentJR teachers take live online classes anywhere in India and visit homes in selected cities. Tell us what you need and our team will call you with timings and fees.

    • Live online classesSmall groups or 1:1 with a teacher, from home, any city.
    • Teacher at homeA TalentJR teacher visits your home (selected cities).
    • At a centreClasses at a TalentJR partner centre near you, where available.

    Keep learning

    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
    3. 3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' – यह दीप अकेला, मैंने देखा, एक बूँद
    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
    6. 6. तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
    7. 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
    8. 8. विद्यापति – पद
    9. 9. घनानंद – कवित्त
    10. 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
    11. 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
    12. 12. फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया
    13. 13. भीष्म साहनी – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
    14. 14. असगर वजाहत – शेर, पहचान, चार हाथ, साझा
    15. 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
    16. 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
    17. 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज