हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज – Class 12 Hindi Chapter 17 Notes & NCERT PDF
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पाठ 17: हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज
परिचय
कुटज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध है। कुटज हिमालय की ऊँचाई पर सूखी शिलाओं के बीच उगने वाला एक जंगली पौधा है, जिसमें फूल लगते हैं। उसमें न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी लेखक ने उसमें मनुष्य के लिए संदेश पाया है — अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास और विषम परिस्थितियों में भी शान के साथ जीने की क्षमता। निबंध का उद्देश्य यह जताना है कि सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं।
लेखक परिचय
पाठ का सार
1. शिवालिक और अलमस्त वृक्ष
कालिदास ने हिमालय को "पृथ्वी का मानदंड" कहा था। उसके पाद-देश में शिवालिक श्रृंखला है — लेखक कल्पना करते हैं कि यह समाधिस्थ महादेव की जटाओं का निचला हिस्सा है, इसलिए इतनी सूखी, नीरस और कठोर। दूब तक सूख गई है; काली चट्टानें और रक्ताभ रेती। फिर भी कुछ ठिंगने पर शानदार पेड़ भयंकर गर्मी और भूख-प्यास सहकर भी "हँस भी रहे हैं"। लेखक पूछते हैं, "बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं?" — "कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं।" ये पाषाण की छाती फाड़कर अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं। ये वृक्ष द्वंद्वातीत और अलमस्त हैं।
2. नाम बड़ा या रूप?
एक ठिंगना, फूलों से लदा पेड़ मानो पूछ रहा है, "क्या तुम मुझे भी नहीं पहचानते?" लेखक रूप पहचानते हैं, पर नाम याद नहीं आता। भारतीय पंडितों का पुराना प्रश्न उठता है — नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदार्थ? लेखक सौ नाम सुझा सकते हैं — सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभ्रकिरीटिनी, मदोद्धता, विजितातपा, अलकावतंसा; या पौरुष-व्यंजक — अकुतोभय, गिरिगौरव, कूटोल्लास, अपराजित, धरतीधकेल, पहाड़फोड़, पातालभेद। पर मन नहीं मानता, क्योंकि "रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य।" नाम बड़ा इसलिए है कि उस पर समाज की मुहर (जिसे आधुनिक लोग 'सोशल सैंक्शन' कहते हैं) लगी होती है। अचानक याद आता है — "अरे, यह तो कुटज है!" संस्कृत साहित्य में परिचित, पर कवियों द्वारा अवमानित। गिरिकूट पर उगने से इसे 'कूटज' कहने में लेखक को विशेष आनंद आता है।
3. कालिदास और रहीम
कालिदास के 'मेघदूत' में "आषाढ़स्य प्रथम-दिवसे" रामगिरि पर यक्ष ने मेघ की अभ्यर्थना ताज़े कुटज पुष्पों की अंजलि से ही की थी — चंपक, बकुल, नीलोत्पल, मल्लिका, अरविंद नहीं, "फकत कुटज के फूल!" लेखक इसलिए कुटज को "गाढ़े के साथी" कहते हैं — संकट के समय काम आने वाला मित्र। (लेखक जिस दिन कुटज देख रहे हैं वह आषाढ़ का नहीं, जुलाई का पहला दिन है।)
दूसरी ओर रहीम ने, जो स्वयं दरियादिल थे पर दुनिया की बेरुखी से झुँझलाए होंगे, कुटज को "एक चपत लगा दी" —
"वे रहीम अब बिरछ कहँ, जिनकर छाँह गंभीर; बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़ कुटज करीर।"
लेखक का उत्तर: छाया के लिए न सही, फूल के लिए तो सम्मान होना चाहिए; और गिरिकूट-बिहारी कुटज का बागों से क्या संबंध?
4. 'कुटज' शब्द की व्युत्पत्ति
'कुट' = घड़ा या घर। घड़े से उत्पन्न होने के कारण अगस्त्य मुनि भी 'कुटज' कहलाते हैं। घर में काम करने वाली दासी कुटहारिका/कुटकारिका, और गलत ढंग की दासी 'कुटनी' (संस्कृत में 'कुट्टनी') कही जा सकती है; 'कुटिया', 'कुटीर' भी इसी से जुड़े लगते हैं। पर लेखक को संदेह है कि यह आर्यभाषा का शब्द है भी या नहीं। सिलवाँ लेवी के अनुसार संस्कृत में फूलों, वृक्षों और खेती-बागबानी के अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा-परिवार के हैं — जिसे आस्ट्रो-एशियाटिक या कोल-परिवार भी कहते हैं; संथाल, मुंडा आदि इसे बोलते हैं। कमल, कुड्मल, कंबु, कंबल, तांबूल ऐसे ही शब्द बताए जाते हैं। निष्कर्ष: "संस्कृत सर्वग्रासी भाषा है" — उसने शब्द-संग्रह में कभी छूत नहीं मानी।
5. अपराजेय जीवनी-शक्ति और कुटज का उपदेश
कुटज नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है। नाम हज़ारों वर्षों से संस्कृत की शब्दराशि में "जो जमके बैठा, सो बैठा ही है"। रूप ऐसा कि "कुपित यमराज के दारुण निःश्वास" जैसी लू में भी "हरा भी है और भरा भी है", पाषाण की कारा में रुद्ध जलस्रोत से रस खींचकर सरस है। वह ऊपर महादेव को पुष्पस्तबक चढ़ाता है और नीचे जड़ों से सरिताओं को रस का स्रोत बताता है। कुटज का उपदेश है: कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; झंझा-तूफ़ान को रगड़कर अपना प्राप्य वसूलो; आकाश को चूमकर उल्लास खींच लो। "जीना भी एक कला है… कला ही नहीं, तपस्या है।"
6. स्वार्थ से बड़ी शक्ति
याज्ञवल्क्य ने पत्नी से कहा था — "आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" (सब अपने मतलब के लिए प्रिय होते हैं); पश्चिम के हॉब्स और हेल्वेशियस ने भी ऐसा कहा। पर लेखक का अंतर्मन कहता है कि स्वार्थ से भी बड़ी, जिजीविषा से भी प्रचंड कोई शक्ति है। याज्ञवल्क्य 'आत्मा' का अर्थ व्यापक करना चाहते थे — "अपने में सब और सबमें आप" की समष्टि-बुद्धि आए बिना पूर्ण सुख नहीं; अपने को "दलित द्राक्षा" की तरह निचोड़कर 'सर्व' के लिए निछावर किए बिना स्वार्थ खंड-सत्य है, जो मोह और तृष्णा बढ़ाकर मनुष्य को कृपण बनाता है।
कुटज भीख नहीं माँगता, भय से अधमरा नहीं होता, अफ़सरों का जूता नहीं चाटता, ग्रहों की खुशामद नहीं करता, नीलम-अँगूठियाँ नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता। भीष्म (शांतिपर्व) की वाणी में वह कहता है — सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिले उसे "हृदयेनापराजितः" — हृदय से अपराजित होकर स्वीकार करो। लेखक कहते हैं: जो सोचता है कि वह उपकार कर रहा है, वह अबोध है; जो सोचता है दूसरे उसका अपकार कर रहे हैं, वह बुद्धिहीन है। "दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं" — सुखी वह जिसका मन वश में है, दुखी वह जिसका मन परवश है। कुटज राजा जनक की तरह संसार में रहकर भी मुक्त, वशी और वैरागी है। अंतिम वाक्य: "कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता। मनस्वी मित्र, तुम धन्य हो!"
विषय विश्लेषण
भाषा-शैली
बोर्ड परीक्षा फोकस
प्रश्न 1: कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है?
उत्तर-रूपरेखा: मेघदूत — रामगिरि पर यक्ष को मेघ की अभ्यर्थना के लिए और कोई फूल नहीं मिला → कुटज के फूलों से ही अर्घ्य → संकट में काम आया → गाढ़े (कठिन) समय का साथी।
प्रश्न 2: 'नाम' क्यों बड़ा है?
उत्तर-रूपरेखा: रूप व्यक्ति-सत्य, नाम समाज-सत्य → नाम पर समाज की मुहर (सोशल सैंक्शन) → समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित → इसलिए सौ काल्पनिक नाम भी मन को संतुष्ट नहीं करते।
प्रश्न 3: 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं' — सिद्ध कीजिए।
उत्तर-रूपरेखा: मन वश में = सुखी; परवश = खुशामद, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी → परवश व्यक्ति मिथ्या आडंबर रचता है → कुटज वशी, वैरागी, जनक की तरह मुक्त → इसलिए विषम परिस्थिति में भी प्रसन्न।
कठिन शब्द
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓'कुटज' ललित निबंध है; शिवालिक की सूखी पहाड़ियों पर उगने वाला कुटज अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन और शान से जीने का प्रतीक है।
- ✓लेखक के अनुसार 'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य' — नाम इसलिए बड़ा है कि उस पर समाज की मुहर लगी होती है।
- ✓मेघदूत में यक्ष ने कुटज पुष्पों से मेघ की अभ्यर्थना की, इसलिए कुटज 'गाढ़े के साथी' है; रहीम ने उसकी उपेक्षा की थी।
- ✓'कुटज' शब्द संभवतः आग्नेय (कोल) भाषा-परिवार का है; लेखक संस्कृत को 'सर्वग्रासी' भाषा कहते हैं।
- ✓स्वार्थ से बड़ी शक्ति समष्टि-बुद्धि है; 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं' — कुटज मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।
👨🏫 Teaching Tips
- →कुटज (इंद्रजौ/कुरची) के पौधे और फूल का चित्र दिखाकर पाठ आरंभ करें; शिवालिक श्रृंखला मानचित्र पर दिखाएँ।
- →'ललित निबंध' की विशेषताएँ — आत्मपरकता, विषयांतर, पांडित्य और हास्य — उदाहरण सहित समझाएँ।
- →'नाम बड़ा या रूप' पर कक्षा में छोटा वाद-विवाद कराएँ, शेक्सपियर के 'व्हाट्स इन ए नेम' से जोड़कर।
- →मेघदूत का प्रसंग और रहीम का दोहा संक्षेप में सुनाकर 'गाढ़े के साथी' का संदर्भ स्पष्ट करें।
- →कुट, कुटज, कुटनी, कुटीर शब्दों का शब्द-वृक्ष बोर्ड पर बनवाएँ।
- →'कुटज क्या केवल जी रहा है' अनुच्छेद से मानवीय कमज़ोरियों (खुशामद, भय, भीख, ग्रह-पूजा) की सूची बनवाएँ।
- →योग्यता-विस्तार के अनुसार किसी जंगली फूल पर 'कुटज' की तर्ज़ पर लेख या कविता लिखवाएँ।
📋 Assessment Questions
- क्या विद्यार्थी कुटज को 'गाढ़े के साथी' कहने का कारण संदर्भ सहित बता सकता है?
- क्या वह 'नाम' के बड़े होने पर लेखक के तर्क स्पष्ट कर सकता है?
- क्या वह 'कुट', 'कुटज', 'कुटनी' का विश्लेषण कर आपसी संबंध बता सकता है?
- क्या वह कुटज के जीवन से मिलने वाली सीख और 'दुख-सुख मन के विकल्प' की व्याख्या कर सकता है?
- क्या वह निबंध के गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कर सकता है?
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- 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज