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हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज – Class 12 Hindi Chapter 17 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 17NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

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पाठ 17: हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज

परिचय

कुटज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध है। कुटज हिमालय की ऊँचाई पर सूखी शिलाओं के बीच उगने वाला एक जंगली पौधा है, जिसमें फूल लगते हैं। उसमें न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध, फिर भी लेखक ने उसमें मनुष्य के लिए संदेश पाया है — अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन, आत्मविश्वास और विषम परिस्थितियों में भी शान के साथ जीने की क्षमता। निबंध का उद्देश्य यह जताना है कि सामान्य से सामान्य वस्तु में भी विशेष गुण हो सकते हैं।

लेखक परिचय

  • हजारी प्रसाद द्विवेदी (सन् 1907–1979) का जन्म आरत दुबे का छपरा, ज़िला बलिया (उ.प्र.) में हुआ।
  • संस्कृत महाविद्यालय, काशी से शास्त्री; सन् 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाधि।
  • सन् 1940–50 तक हिंदी भवन, शांतिनिकेतन के निदेशक; वहाँ रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिमोहन सेन का सान्निध्य मिला।
  • सन् 1950 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष; 1952–53 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष; 1955 में प्रथम राजभाषा आयोग के सदस्य; 1960–67 तक पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभागाध्यक्ष; 1967 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रेक्टर। अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष।
  • सम्मान: 'आलोक पर्व' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार; लखनऊ विश्वविद्यालय से डी.लिट. की मानद उपाधि; भारत सरकार से पद्मभूषण।
  • संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला तथा इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्म में गहरी गति; परंपरा और आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय में विश्वास।
  • रचनाएँ: अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व (निबंध); चारुचंद्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा (उपन्यास); सूर-साहित्य, कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका, कालिदास की लालित्य-योजना (आलोचना)। सभी रचनाएँ 'हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली' के ग्यारह खंडों में।
  • भाषा-शैली: सरल, प्रांजल; व्यक्ति-व्यंजकता और आत्मपरकता; व्यंग्य के कारण पांडित्य का बोझ हावी नहीं होता।
  • पाठ का सार

    1. शिवालिक और अलमस्त वृक्ष

    कालिदास ने हिमालय को "पृथ्वी का मानदंड" कहा था। उसके पाद-देश में शिवालिक श्रृंखला है — लेखक कल्पना करते हैं कि यह समाधिस्थ महादेव की जटाओं का निचला हिस्सा है, इसलिए इतनी सूखी, नीरस और कठोर। दूब तक सूख गई है; काली चट्टानें और रक्ताभ रेती। फिर भी कुछ ठिंगने पर शानदार पेड़ भयंकर गर्मी और भूख-प्यास सहकर भी "हँस भी रहे हैं"। लेखक पूछते हैं, "बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं?" — "कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं।" ये पाषाण की छाती फाड़कर अतल गह्वर से अपना भोग्य खींच लाते हैं। ये वृक्ष द्वंद्वातीत और अलमस्त हैं।

    2. नाम बड़ा या रूप?

    एक ठिंगना, फूलों से लदा पेड़ मानो पूछ रहा है, "क्या तुम मुझे भी नहीं पहचानते?" लेखक रूप पहचानते हैं, पर नाम याद नहीं आता। भारतीय पंडितों का पुराना प्रश्न उठता है — नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदार्थ? लेखक सौ नाम सुझा सकते हैं — सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभ्रकिरीटिनी, मदोद्धता, विजितातपा, अलकावतंसा; या पौरुष-व्यंजक — अकुतोभय, गिरिगौरव, कूटोल्लास, अपराजित, धरतीधकेल, पहाड़फोड़, पातालभेद। पर मन नहीं मानता, क्योंकि "रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य।" नाम बड़ा इसलिए है कि उस पर समाज की मुहर (जिसे आधुनिक लोग 'सोशल सैंक्शन' कहते हैं) लगी होती है। अचानक याद आता है — "अरे, यह तो कुटज है!" संस्कृत साहित्य में परिचित, पर कवियों द्वारा अवमानित। गिरिकूट पर उगने से इसे 'कूटज' कहने में लेखक को विशेष आनंद आता है।

    3. कालिदास और रहीम

    कालिदास के 'मेघदूत' में "आषाढ़स्य प्रथम-दिवसे" रामगिरि पर यक्ष ने मेघ की अभ्यर्थना ताज़े कुटज पुष्पों की अंजलि से ही की थी — चंपक, बकुल, नीलोत्पल, मल्लिका, अरविंद नहीं, "फकत कुटज के फूल!" लेखक इसलिए कुटज को "गाढ़े के साथी" कहते हैं — संकट के समय काम आने वाला मित्र। (लेखक जिस दिन कुटज देख रहे हैं वह आषाढ़ का नहीं, जुलाई का पहला दिन है।)

    दूसरी ओर रहीम ने, जो स्वयं दरियादिल थे पर दुनिया की बेरुखी से झुँझलाए होंगे, कुटज को "एक चपत लगा दी" —

    "वे रहीम अब बिरछ कहँ, जिनकर छाँह गंभीर; बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़ कुटज करीर।"

    लेखक का उत्तर: छाया के लिए न सही, फूल के लिए तो सम्मान होना चाहिए; और गिरिकूट-बिहारी कुटज का बागों से क्या संबंध?

    4. 'कुटज' शब्द की व्युत्पत्ति

    'कुट' = घड़ा या घर। घड़े से उत्पन्न होने के कारण अगस्त्य मुनि भी 'कुटज' कहलाते हैं। घर में काम करने वाली दासी कुटहारिका/कुटकारिका, और गलत ढंग की दासी 'कुटनी' (संस्कृत में 'कुट्टनी') कही जा सकती है; 'कुटिया', 'कुटीर' भी इसी से जुड़े लगते हैं। पर लेखक को संदेह है कि यह आर्यभाषा का शब्द है भी या नहीं। सिलवाँ लेवी के अनुसार संस्कृत में फूलों, वृक्षों और खेती-बागबानी के अधिकांश शब्द आग्नेय भाषा-परिवार के हैं — जिसे आस्ट्रो-एशियाटिक या कोल-परिवार भी कहते हैं; संथाल, मुंडा आदि इसे बोलते हैं। कमल, कुड्मल, कंबु, कंबल, तांबूल ऐसे ही शब्द बताए जाते हैं। निष्कर्ष: "संस्कृत सर्वग्रासी भाषा है" — उसने शब्द-संग्रह में कभी छूत नहीं मानी।

    5. अपराजेय जीवनी-शक्ति और कुटज का उपदेश

    कुटज नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है। नाम हज़ारों वर्षों से संस्कृत की शब्दराशि में "जो जमके बैठा, सो बैठा ही है"। रूप ऐसा कि "कुपित यमराज के दारुण निःश्वास" जैसी लू में भी "हरा भी है और भरा भी है", पाषाण की कारा में रुद्ध जलस्रोत से रस खींचकर सरस है। वह ऊपर महादेव को पुष्पस्तबक चढ़ाता है और नीचे जड़ों से सरिताओं को रस का स्रोत बताता है। कुटज का उपदेश है: कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो; झंझा-तूफ़ान को रगड़कर अपना प्राप्य वसूलो; आकाश को चूमकर उल्लास खींच लो। "जीना भी एक कला है… कला ही नहीं, तपस्या है।"

    6. स्वार्थ से बड़ी शक्ति

    याज्ञवल्क्य ने पत्नी से कहा था — "आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" (सब अपने मतलब के लिए प्रिय होते हैं); पश्चिम के हॉब्स और हेल्वेशियस ने भी ऐसा कहा। पर लेखक का अंतर्मन कहता है कि स्वार्थ से भी बड़ी, जिजीविषा से भी प्रचंड कोई शक्ति है। याज्ञवल्क्य 'आत्मा' का अर्थ व्यापक करना चाहते थे — "अपने में सब और सबमें आप" की समष्टि-बुद्धि आए बिना पूर्ण सुख नहीं; अपने को "दलित द्राक्षा" की तरह निचोड़कर 'सर्व' के लिए निछावर किए बिना स्वार्थ खंड-सत्य है, जो मोह और तृष्णा बढ़ाकर मनुष्य को कृपण बनाता है।

    कुटज भीख नहीं माँगता, भय से अधमरा नहीं होता, अफ़सरों का जूता नहीं चाटता, ग्रहों की खुशामद नहीं करता, नीलम-अँगूठियाँ नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता। भीष्म (शांतिपर्व) की वाणी में वह कहता है — सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिले उसे "हृदयेनापराजितः" — हृदय से अपराजित होकर स्वीकार करो। लेखक कहते हैं: जो सोचता है कि वह उपकार कर रहा है, वह अबोध है; जो सोचता है दूसरे उसका अपकार कर रहे हैं, वह बुद्धिहीन है। "दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं" — सुखी वह जिसका मन वश में है, दुखी वह जिसका मन परवश है। कुटज राजा जनक की तरह संसार में रहकर भी मुक्त, वशी और वैरागी है। अंतिम वाक्य: "कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता। मनस्वी मित्र, तुम धन्य हो!"

    विषय विश्लेषण

  • कुटज = मनुष्य का आदर्श: कठिन परिस्थिति में स्वाभिमान से जीना, किसी पर निर्भर न रहना।
  • नाम-रूप विमर्श: व्यक्ति-सत्य बनाम समाज-सत्य।
  • भाषा-विज्ञान: संस्कृत की ग्रहणशीलता; आग्नेय/कोल भाषा-परिवार।
  • दर्शन: स्वार्थ बनाम समष्टि-बुद्धि; मन को वश में करना।
  • भाषा-शैली

  • ललित निबंध — आत्मपरक, बातचीत जैसा ("इन्हें क्या कहूँ?", "पर काहे वास्ते?")।
  • तत्सम पदावली के साथ उर्दू-अंग्रेज़ी शब्द: फकत, दरख्त, कम्बख्त, बेहया, 'व्हाट्स देयर इन ए नेम', 'मूड'।
  • संस्कृत उद्धरण (मेघदूत, उपनिषद्, महाभारत) और रहीम का दोहा — पांडित्य व्यंग्य और हास्य से हल्का।
  • मानवीकरण: कुटज को "मनस्वी मित्र", "उजाड़ के साथी" कहना।
  • प्रश्न-शैली और विरोधाभास: "हरा भी है और भरा भी"।
  • बोर्ड परीक्षा फोकस

    प्रश्न 1: कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है?

    उत्तर-रूपरेखा: मेघदूत — रामगिरि पर यक्ष को मेघ की अभ्यर्थना के लिए और कोई फूल नहीं मिला → कुटज के फूलों से ही अर्घ्य → संकट में काम आया → गाढ़े (कठिन) समय का साथी।

    प्रश्न 2: 'नाम' क्यों बड़ा है?

    उत्तर-रूपरेखा: रूप व्यक्ति-सत्य, नाम समाज-सत्य → नाम पर समाज की मुहर (सोशल सैंक्शन) → समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित → इसलिए सौ काल्पनिक नाम भी मन को संतुष्ट नहीं करते।

    प्रश्न 3: 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं' — सिद्ध कीजिए।

    उत्तर-रूपरेखा: मन वश में = सुखी; परवश = खुशामद, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी → परवश व्यक्ति मिथ्या आडंबर रचता है → कुटज वशी, वैरागी, जनक की तरह मुक्त → इसलिए विषम परिस्थिति में भी प्रसन्न।

    कठिन शब्द

  • अंतर्निरुद्ध — भीतरी रुकावट
  • गह्वर — गहरा गड्ढा
  • द्वंद्वातीत — द्वंद्व से परे
  • अकुतोभय — जिसे किसी से भय न हो
  • अवमानित — अपमानित, तिरस्कृत
  • विरुद — कीर्ति-गाथा, प्रशंसासूचक पदवी
  • स्तबक — फूलों का गुच्छा
  • अनत्युच्च — जो बहुत ऊँचा न हो
  • स्फीयमान — फैलता हुआ, व्यापक
  • मूर्धा — मस्तक, सिर
  • दुरंत — प्रबल, जिसका पार पाना कठिन हो
  • कार्पण्य — कृपणता, कंजूसी
  • उपहत — चोट खाया हुआ, नष्ट
  • अवधूत — विरक्त, संन्यासी
  • नितरां — बहुत अधिक
  • सामान्य भूलें

  • कुटज को सुगंधित या अत्यंत सुंदर फूल लिखना — पाठ-परिचय के अनुसार उसमें न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध; महत्त्व उसकी जीवनी-शक्ति का है।
  • 'गाढ़े के साथी' का संबंध रहीम से जोड़ना — यह कालिदास के मेघदूत प्रसंग से है; रहीम ने तो कुटज की उपेक्षा की।
  • 'रूप व्यक्ति-सत्य, नाम समाज-सत्य' को उलट देना।
  • याज्ञवल्क्य के कथन को लेखक का अंतिम मत मान लेना — लेखक स्वार्थ से बड़ी शक्ति (समष्टि-बुद्धि) मानते हैं।
  • कुटज की तुलना जनक के बजाय किसी और से करना — पाठ में "राजा जनक की तरह" संसार में रहकर भी मुक्त कहा गया है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓'कुटज' ललित निबंध है; शिवालिक की सूखी पहाड़ियों पर उगने वाला कुटज अपराजेय जीवनी-शक्ति, स्वावलंबन और शान से जीने का प्रतीक है।
    • ✓लेखक के अनुसार 'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य' — नाम इसलिए बड़ा है कि उस पर समाज की मुहर लगी होती है।
    • ✓मेघदूत में यक्ष ने कुटज पुष्पों से मेघ की अभ्यर्थना की, इसलिए कुटज 'गाढ़े के साथी' है; रहीम ने उसकी उपेक्षा की थी।
    • ✓'कुटज' शब्द संभवतः आग्नेय (कोल) भाषा-परिवार का है; लेखक संस्कृत को 'सर्वग्रासी' भाषा कहते हैं।
    • ✓स्वार्थ से बड़ी शक्ति समष्टि-बुद्धि है; 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं' — कुटज मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →कुटज (इंद्रजौ/कुरची) के पौधे और फूल का चित्र दिखाकर पाठ आरंभ करें; शिवालिक श्रृंखला मानचित्र पर दिखाएँ।
    • →'ललित निबंध' की विशेषताएँ — आत्मपरकता, विषयांतर, पांडित्य और हास्य — उदाहरण सहित समझाएँ।
    • →'नाम बड़ा या रूप' पर कक्षा में छोटा वाद-विवाद कराएँ, शेक्सपियर के 'व्हाट्स इन ए नेम' से जोड़कर।
    • →मेघदूत का प्रसंग और रहीम का दोहा संक्षेप में सुनाकर 'गाढ़े के साथी' का संदर्भ स्पष्ट करें।
    • →कुट, कुटज, कुटनी, कुटीर शब्दों का शब्द-वृक्ष बोर्ड पर बनवाएँ।
    • →'कुटज क्या केवल जी रहा है' अनुच्छेद से मानवीय कमज़ोरियों (खुशामद, भय, भीख, ग्रह-पूजा) की सूची बनवाएँ।
    • →योग्यता-विस्तार के अनुसार किसी जंगली फूल पर 'कुटज' की तर्ज़ पर लेख या कविता लिखवाएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. क्या विद्यार्थी कुटज को 'गाढ़े के साथी' कहने का कारण संदर्भ सहित बता सकता है?
    2. क्या वह 'नाम' के बड़े होने पर लेखक के तर्क स्पष्ट कर सकता है?
    3. क्या वह 'कुट', 'कुटज', 'कुटनी' का विश्लेषण कर आपसी संबंध बता सकता है?
    4. क्या वह कुटज के जीवन से मिलने वाली सीख और 'दुख-सुख मन के विकल्प' की व्याख्या कर सकता है?
    5. क्या वह निबंध के गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कर सकता है?

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    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
    3. 3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' – यह दीप अकेला, मैंने देखा, एक बूँद
    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
    6. 6. तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
    7. 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
    8. 8. विद्यापति – पद
    9. 9. घनानंद – कवित्त
    10. 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
    11. 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
    12. 12. फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया
    13. 13. भीष्म साहनी – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
    14. 14. असगर वजाहत – शेर, पहचान, चार हाथ, साझा
    15. 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
    16. 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
    17. 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज