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रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो – Class 12 Hindi Chapter 5 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 5NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

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पाठ 5: रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो

परिचय

इस पाठ में नई कविता के कवि रघुवीर सहाय की दो कविताएँ हैं: 'वसंत आया' और 'तोड़ो'। 'वसंत आया' कहती है कि आज मनुष्य का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है। वसंत ऋतु का आना अब अनुभव से नहीं, कैलेंडर और दफ़्तर की छुट्टी से जाना जाता है। कवि ने आधुनिक शहरी जीवन-शैली पर व्यंग्य किया है। 'तोड़ो' एक उद्बोधनपरक (जगाने वाली) कविता है। इसमें कवि सृजन के लिए धरती को तैयार करने का आह्वान करता है: पत्थर, चट्टानें, ऊसर और बंजर तोड़ो, और मन की ऊब और खीज को भी तोड़ो। कवि विध्वंस के लिए नहीं, सृजन के लिए प्रेरित करता है।

कवि परिचय

  • जीवन-काल: सन् 1929–1990; जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में। संपूर्ण शिक्षा लखनऊ में; 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.।
  • पत्रकारिता: पेशे से पत्रकार। आरंभ में प्रतीक में सहायक संपादक, फिर आकाशवाणी के समाचार विभाग में; कुछ समय हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका कल्पना के संपादन से जुड़े; कई वर्षों तक दिनमान का संपादन किया।
  • काव्य-दृष्टि:
  • - नई कविता के कवि; कुछ कविताएँ अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक में संकलित।

    - उनकी कविता में आत्मपरक अनुभवों की जगह जनजीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति अधिक है; व्यापक सामाजिक संदर्भों का निरीक्षण और बोध।

    - उन्होंने पत्रकार-दृष्टि का सर्जनात्मक उपयोग किया। वे मानते हैं कि अखबार की खबर के भीतर ऐसी अनेक खबरें दबी रहती हैं जिनमें मानवीय पीड़ा छिपी होती है; उस छिपी पीड़ा को व्यक्त करना कविता का दायित्व है।

    - अनावश्यक शब्दों से प्रयासपूर्वक बचते हैं; भयाक्रांत अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति उनकी प्रमुख विशेषता है।

    - मुक्त छंद और छंद दोनों में रचना; कविता की संरचना में कथा या वृत्तांत का उपयोग।

  • प्रमुख कृतियाँ: सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं। छह खंडों में रघुवीर सहाय रचनावली प्रकाशित।
  • सम्मान: लोग भूल गए हैं पर साहित्य अकादमी पुरस्कार।
  • 'वसंत आया': सार और व्याख्या

    1. वसंत के संकेत, जो कवि ने अनजाने में देखे:

  • "जैसे बहन 'दा' कहती है / ऐसे किसी बँगले के किसी तरु (अशोक?) पर कोई चिड़िया कुऊकी"। किसी बँगले के पेड़ (शायद अशोक) पर कोई चिड़िया ऐसे कुहुकी जैसे बहन 'दा' (भैया) पुकारती है। कवि को पेड़ का नाम भी पक्का नहीं पता ("अशोक?"); यह प्रकृति से दूरी का संकेत है।
  • "चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराए पाँव तले / ऊँचे तरुवर से गिरे / बड़े-बड़े पियराए पत्ते"। सड़क किनारे पीले पड़ चुके पत्ते पाँव तले चुरमुराए।
  • "कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो— / खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई।" सुबह छह बजे की हवा ऐसी लगी जैसे गरम पानी से नहाई हो, यानी उसमें हल्की गरमाहट थी; वह फिरकी की तरह घूमती आई और चली गई।
  • "ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते। / कल मैंने जाना कि वसंत आया।"
  • 2. वसंत का 'ज्ञान', जो किताबी और कैलेंडरी है:

  • "और यह कैलेंडर से मालूम था / अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी / दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण"। वसंत पंचमी की जानकारी कैलेंडर से थी और दफ़्तर की छुट्टी उसका प्रमाण थी।
  • "और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था / कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल / आम बौर आवेंगे / रंग-रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के / वे नंदन-वन होवेंगे यशस्वी / मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व / अभ्यास करके दिखावेंगे"। कविताएँ पढ़कर पता था कि पलाश के जंगल दहकेंगे, आम पर बौर आएगा, नंदन-वन (इंद्र का उद्यान) फूलों से लदेगा और कोयल-भौंरे अपना कौशल दिखाएँगे। यह सब पढ़ा हुआ ज्ञान है, जिया हुआ नहीं।
  • 3. व्यंग्यपूर्ण निष्कर्ष: "यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा / जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।" कवि को यह पता नहीं था कि एक साधारण (नगण्य) दिन वह वसंत को इस तरह, बिना अनुभूति के, बस 'जान' लेगा।

    मूल चिंता: ऋतुओं का परिवर्तन पहले की तरह होता है (पत्ते झड़ते हैं, कोपलें फूटती हैं, ढाक दहकते हैं, भौंरे झूमते हैं), पर हमारी निगाह उन पर नहीं जाती; हम निरपेक्ष बने रहते हैं। कविता आधुनिक मनुष्य के प्रकृति से कट जाने पर व्यंग्य है। कवि ने अशोक, मदन महीना, पंचमी, नंदन-वन जैसे परंपरा में रचे-बसे शब्दों और देशज (तद्भव) शब्दों-क्रियाओं (कुऊकी, चुरमुराए, पियराए, होवेगी, आवेंगे) का प्रयोग करके कविता को आधुनिकता के सामने चुनौती की तरह खड़ा कर दिया है।

    'तोड़ो': सार और व्याख्या

  • "तोड़ो तोड़ो तोड़ो / ये पत्थर ये चट्टानें / ये झूठे बंधन टूटें / तो धरती को हम जानें"। कवि पत्थर, चट्टानें और झूठे बंधन तोड़ने का आह्वान करता है। ये बंधन टूटें तो हम धरती (वास्तविक जीवन, सृजन की संभावना) को जान सकें।
  • "सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है / अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है / आधे आधे गाने"। मिट्टी में रस (उर्वरता) है, जिससे दूब उगती है; पर हमारे मन के मैदानों पर ऊब फैली है, जिससे हमारे गीत (सृजन) अधूरे, 'आधे-आधे' रह जाते हैं।
  • "तोड़ो तोड़ो तोड़ो / ये ऊसर बंजर तोड़ो / ये चरती परती तोड़ो / सब खेत बनाकर छोड़ो"। ऊसर-बंजर और चरती-परती (पशुओं के लिए छोड़ी गई) ज़मीन तोड़कर सबको खेत बना दो। परती को खेत में बदलना सृजन की आरंभिक पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।
  • "मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को / हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को? / गोड़ो गोड़ो गोड़ो"। मिट्टी में रस तभी सार्थक है जब वह बीज को पाले। कवि पूछता है कि मन की खीज का क्या करें, और उत्तर देता है: गोड़ो, यानी मन की मिट्टी को भी गोड़कर (खोदकर, पलटकर) उर्वर बनाओ।
  • मूल भाव: कविता का ऊपरी ढाँचा सरल है, पर प्रकृति और मन की तुलना से इसका अर्थ-विस्तार होता है। बंजर प्रकृति में भी है और मानव-मन में भी। मन की ऊब और खीज सृजन में बाधक हैं, इसलिए उन्हें भी तोड़ना है। आरंभ 'तोड़ो' से (बाधाएँ हटाना) और अंत 'गोड़ो' से (सृजन के लिए भूमि तैयार करना) होता है। यह विध्वंस से सृजन की यात्रा है।

    काव्य-सौंदर्य और शिल्प

  • 'वसंत आया': मुक्त छंद; व्यंग्यात्मक स्वर; वृत्तांत शैली; देशज-तद्भव शब्द (कुऊकी, चुरमुराए, पियराए, होवेगी, आवेंगे, दिखावेंगे); बिंब और प्रतीकों का प्रयोग।
  • 'तोड़ो': गीतात्मक, छंदबद्ध, तुकांत (चट्टानें–जानें, दूब–ऊब, बीज–खीज); आह्वान शैली; पुनरावृत्ति से ओज ("तोड़ो तोड़ो तोड़ो", "गोड़ो गोड़ो गोड़ो")।
  • अलंकार (पुस्तक के प्रश्न 3 के अनुसार):
  • - "बड़े-बड़े पियराए पत्ते" – पुनरुक्ति प्रकाश।

    - "कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो" – उत्प्रेक्षा (संभावना: 'जैसे... हो'), साथ में मानवीकरण।

    - "खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई" – उपमा ('फिरकी-सी') और मानवीकरण।

    - "कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल" – पुनरुक्ति प्रकाश और अनुप्रास ('द' और 'ह' की आवृत्ति)।

  • प्रतीक: पत्थर-चट्टान (बाधाएँ, रूढ़ियाँ, झूठे बंधन), ऊसर-बंजर (अनुर्वर मन/भूमि), बीज (सृजन), खीज-ऊब (मानसिक जड़ता)।
  • प्रश्न-अभ्यास पर आधारित बोर्ड परीक्षा फोकस

    प्रश्न 1: वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?

    उत्तर-रूपरेखा: चिड़िया की कुहुक, पैरों तले चुरमुराते पीले पत्ते, सुबह की गुनगुनी हवा (अनजाने अनुभव); कैलेंडर में वसंत पंचमी की तिथि; दफ़्तर की छुट्टी 'प्रमाण'; कविताओं से पढ़ा ज्ञान। अनुभूति की जगह सूचना।

    प्रश्न 2: 'वसंत आया' कविता में कवि की चिंता क्या है?

    उत्तर-रूपरेखा: मनुष्य का प्रकृति से टूटता रिश्ता; वसंत का कैलेंडर और छुट्टी से पहचाना जाना; सौंदर्य-अनुभूति से वंचित शहरी जीवन; निरपेक्षता; आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य।

    प्रश्न 3: कविता का आरंभ 'तोड़ो' से और अंत 'गोड़ो' से क्यों हुआ है?

    उत्तर-रूपरेखा: 'तोड़ो' = बाधाएँ, चट्टानें, झूठे बंधन और बंजरपन हटाना; 'गोड़ो' = भूमि (और मन) को खोदकर, पलटकर बीज के योग्य बनाना। विध्वंस नहीं, सृजन की तैयारी; बाहर से भीतर (धरती से मन) की यात्रा।

    कठिन शब्द

  • कुऊकना – चिड़िया की स्वाभाविक आवाज़; 'कुहुकना' का तद्भव रूप
  • चुरमुराए – चरमराने की आवाज़
  • तरुवर – छायादार वृक्ष
  • पियराए – पीले पड़े हुए
  • फिरकी – लकड़ी का खिलौना जो ज़मीन पर गोल-गोल घूमता है
  • मदनमहीना – कामदेव का महीना (वसंत)
  • दहर-दहर – धधक-धधक कर
  • ढाक – पलाश
  • नंदन-वन – आनंददायी वन (इंद्र का उद्यान)
  • मधुमस्त – पुष्पों का रस पीकर मस्त
  • पिक – कोयल
  • नगण्य – जो गिनती योग्य न हो, तुच्छ
  • व्यापी – फैली हुई
  • ऊसर-बंजर – अनुपजाऊ ज़मीन
  • चरती-परती – पशुओं के चारागाह आदि के लिए छोड़ी गई ज़मीन
  • गोड़ना – मिट्टी खोदकर पलटना, निराई करना
  • सामान्य भूलें

  • 'वसंत आया' को वसंत की प्रशंसा का गीत समझना। यह वसंत के प्रति हमारी उदासीनता पर व्यंग्य है।
  • 'दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण' को सामान्य सूचना मानना। यहाँ व्यंग्य है कि ऋतु का प्रमाण प्रकृति नहीं, छुट्टी है।
  • 'तोड़ो' को विध्वंस का आह्वान मानना। कवि विध्वंस के लिए नहीं, सृजन के लिए प्रेरित करता है।
  • 'गोड़ो' को 'तोड़ो' का वर्तनी-दोष समझना। दोनों अलग क्रियाएँ हैं।
  • 'छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो' में केवल उपमा बताना। 'जैसे... हो' से संभावना व्यक्त है, इसलिए उत्प्रेक्षा है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓'वसंत आया' आधुनिक मनुष्य के प्रकृति से टूटे रिश्ते पर व्यंग्य है; वसंत अब कैलेंडर और दफ़्तर की छुट्टी से जाना जाता है।
    • ✓कवि ने देशज-तद्भव शब्दों (कुऊकी, चुरमुराए, पियराए, होवेगी) और परंपरागत शब्दों (मदनमहीना, नंदन-वन) से आधुनिकता को चुनौती दी है।
    • ✓'तोड़ो' उद्बोधनपरक कविता है: पत्थर, चट्टानें, झूठे बंधन, ऊसर-बंजर और मन की ऊब-खीज तोड़कर सृजन का आह्वान।
    • ✓'तोड़ो' से आरंभ और 'गोड़ो' से अंत विध्वंस से सृजन की ओर, और धरती से मन की ओर यात्रा दिखाता है।
    • ✓रघुवीर सहाय ने पत्रकार-दृष्टि से जनजीवन की छिपी मानवीय पीड़ा को आवेगरहित भाषा में व्यक्त किया।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पाठ से पहले पूछें: 'इस साल वसंत पंचमी कब थी, और आपने कैसे जाना?' उत्तरों से कविता के व्यंग्य तक पहुँचें।
    • →'वसंत आया' के दो भाग (अनुभव से मिले संकेत बनाम कैलेंडर और किताबों से मिला ज्ञान) बोर्ड पर दो स्तंभों में लिखवाएँ।
    • →पुस्तक के प्रश्न 3 की चारों पंक्तियों पर अलंकार-पहचान अभ्यास कराएँ, और उत्प्रेक्षा व उपमा का अंतर स्पष्ट करें।
    • →'तोड़ो' का समूह-पाठ ओजपूर्ण स्वर में कराएँ, ताकि आह्वान शैली अनुभव हो।
    • →खेत तैयार करने की प्रक्रिया (तोड़ना, गोड़ना, बीज बोना) किसी किसान या वीडियो के माध्यम से समझाएँ, फिर उसे मन पर लागू करें।
    • →योग्यता-विस्तार: वसंत पर दो अन्य कवियों की कविताएँ और पंत की 'बीज' खोजकर तुलना कराएँ।
    • →भारत के ऋतु-चक्र और उनके लक्षणों पर चार्ट बनवाएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. विद्यार्थी बता सकें कि कवि को वसंत आगमन की सूचना किन-किन स्रोतों से मिली।
    2. 'वसंत आया' की पंक्तियों में अलंकार (पुनरुक्ति प्रकाश, उत्प्रेक्षा, उपमा, अनुप्रास) पहचान सकें।
    3. 'पत्थर', 'चट्टान', 'झूठे बंधन', 'आधे-आधे गाने' के प्रतीकार्थ स्पष्ट कर सकें।
    4. 'तोड़ो' से आरंभ और 'गोड़ो' से अंत के औचित्य पर विचार लिख सकें।
    5. 'प्रकृति मनुष्य की सहचरी है' विषय पर आज के संदर्भ में अनुच्छेद लिख सकें।

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    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
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    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
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