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तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद – Class 12 Hindi Chapter 6 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 6NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

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पाठ 6: तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद

परिचय

यह पाठ गोस्वामी तुलसीदास की दो रचनाओं से लिया गया है। पहला अंश रामचरितमानस के अयोध्या कांड से है, जिसका शीर्षक पाठ्यपुस्तक में "भरत-राम का प्रेम" दिया गया है। दूसरे अंश में गीतावली के दो पद हैं। पहले अंश में राम के वनगमन के बाद चित्रकूट की सभा में खड़े भरत की मनोदशा है, और दूसरे अंश में पुत्र-वियोग से व्याकुल माता कौशल्या की विरह-वेदना है। दोनों अंशों का केंद्रीय भाव है प्रेम, आत्मग्लानि और वियोग की करुणा। बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से व्याख्या, भाव-सौंदर्य, शिल्प-सौंदर्य और अलंकार-पहचान के प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।

कवि परिचय

  • जीवनकाल: सन् 1532-1623।
  • जन्म: बाँदा ज़िले के राजापुर गाँव में। कुछ विद्वान जन्म-स्थान सोरों (एटा) भी मानते हैं; इस विषय में मतभेद है।
  • बचपन: घोर कष्ट में बीता। बालपन में ही माता-पिता से बिछोह हो गया और भिक्षाटन से जीवन चलाना पड़ा। कहा जाता है कि गुरु नरहरिदास की कृपा से उन्हें रामभक्ति का मार्ग मिला।
  • रत्नावली से विवाह और उनकी बातों से प्रभावित होकर गृहत्याग की कथा प्रसिद्ध है, किंतु पुस्तक स्पष्ट कहती है कि इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता।
  • गृहत्याग के बाद वे काशी, चित्रकूट, अयोध्या आदि तीर्थों में भ्रमण करते रहे। सन् 1574 में अयोध्या में रामचरितमानस की रचना प्रारंभ की; कुछ अंश काशी में लिखा। बाद में काशी में रहे और वहीं निधन हुआ।
  • उपाधियाँ/विशेषताएँ: लोकमंगल की साधना के कवि, समन्वय के कवि। उनके काव्य में विश्वबोध और आत्मबोध का अद्वितीय समन्वय है।
  • रचनाएँ: रामचरितमानस (हिंदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य; दोहा-चौपाई छंद; अवधी भाषा), कवितावली (कवित्त और सवैया), गीतावली, कृष्ण गीतावली, विनयपत्रिका (पद शैली; विनय और आत्म-निवेदन के पद), दोहावली (स्फुट दोहों का संकलन)। तुलसीकृत बारह कृतियाँ प्रामाणिक मानी जाती हैं, पर उनकी ख्याति का आधार रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली और विनयपत्रिका हैं।
  • भाषा: ब्रज और अवधी दोनों पर असाधारण अधिकार।
  • पाठ का सार और व्याख्या

    (क) भरत-राम का प्रेम (रामचरितमानस, अयोध्या कांड)

    प्रसंग: चित्रकूट में मुनि वसिष्ठ और राम की उपस्थिति में सभा हो रही है। भरत से अपनी बात कहने को कहा जाता है।

  • भरत की भाव-दशा: "पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥" भरत का शरीर पुलकित है, वे सभा में खड़े होते हैं और उनके कमल जैसे नेत्रों में प्रेम के आँसू उमड़ आते हैं। वे कहते हैं कि मुनिनाथ (वसिष्ठ) ने मेरी बात पहले ही कह दी है, इससे अधिक मैं क्या कहूँ।
  • राम का स्वभाव: "मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥" भरत अपने स्वामी का स्वभाव जानते हैं: वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझ पर उनकी विशेष कृपा और स्नेह रहा; खेल में भी मैंने उन्हें कभी अप्रसन्न (खुनिस) नहीं देखा।
  • बचपन की स्मृति: राम ने बचपन से कभी भरत का साथ नहीं छोड़ा, कभी उनका मन नहीं तोड़ा। "हारेंहुँ खेल जितावहिं मोही" — खेल में हारते हुए भी राम मुझे जिता देते थे। यह राम की उदारता, छोटे भाई के प्रति वात्सल्य और त्याग का प्रमाण है।
  • संकोच और अतृप्त प्रेम: स्नेह और संकोच के कारण भरत ने कभी राम के सामने मुँह नहीं खोला; प्रेम के प्यासे उनके नेत्र आज तक दर्शन से तृप्त नहीं हुए।
  • भाग्य और माता: "बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥" विधाता मेरा यह दुलार सह न सका और माता के बहाने उसने बीच में व्यवधान डाल दिया।
  • आत्मग्लानि: भरत कहते हैं कि यह कहना भी मुझे शोभा नहीं देता, क्योंकि अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र हुआ है? माता नीच है और मैं सदाचारी हूँ, ऐसा मन में लाना करोड़ों कुचालों के समान है।
  • प्रसिद्ध दृष्टांत: "फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली॥" क्या कोदों की बाली में उत्तम धान फल सकता है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है? अर्थात् बुरी माता से अच्छी संतान कैसे होगी: भरत स्वयं को भी दोषी मानते हैं। यहाँ दृष्टांत अलंकार है।
  • किसी का दोष नहीं: सपने में भी किसी का लेशमात्र दोष नहीं; मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। अपने पापों का परिणाम समझे बिना मैंने माता को कटु वचन कहकर व्यर्थ जलाया।
  • एकमात्र भरोसा: हृदय में सब ओर खोजकर मैं हार गया; मेरी भलाई का एक ही उपाय है: गुरु गोसाईं और स्वामी सीता-राम हैं, इसलिए परिणाम अच्छा ही लगता है। साधुओं की सभा में, गुरु और प्रभु के निकट मैं सच्चे भाव से कह रहा हूँ; यह प्रेम है या छल, झूठ है या सच, यह मुनि और रघुनाथ जानते हैं।
  • अनर्थ का मूल: पिता ने प्रेम का प्रण निभाकर प्राण त्यागे, माता की कुमति का सारा जगत साक्षी है। व्याकुल माताएँ देखी नहीं जातीं, नगर के नर-नारी दुःसह ताप में जल रहे हैं। "महीं सकल अनरथ कर मूला" — मैं ही सारे अनर्थ की जड़ हूँ, यह सुन-समझकर मैंने सब पीड़ा सही।
  • वनगमन की पीड़ा: राम मुनि-वेश में, लक्ष्मण और सीता के साथ, बिना जूतों के पैदल वन गए; शंकर साक्षी हैं कि इस घाव से भी मैं जीवित रहा। निषाद का प्रेम देखकर भी मेरा वज्र (कुलिश) जैसा कठोर हृदय नहीं फटा।
  • अंतिम दोहा: जिन्हें देखकर मार्ग के साँपिन और बिच्छू भी अपना विष त्याग देते हैं, वे राम, लक्ष्मण, सीता जिसे शत्रु लगे, उस (कैकेयी) के पुत्र को छोड़कर विधाता यह दुःसह दुख और किसे सहाए?
  • (ख) गीतावली के पद

    पद 1: "जननी निरखति बान धनुहियाँ।" माता कौशल्या राम के छोटे-छोटे बाण और धनुष देखती हैं; प्रभु की सुंदर जूतियों (पनहियाँ) को बार-बार हृदय और नेत्रों से लगाती हैं। कभी पहले की तरह सवेरे जाकर प्रिय वचनों से जगाती हैं: "उठो तात, माता बलिहारी जाती है, छोटे भाई और सखा द्वार पर खड़े हैं।" कभी कहती हैं: "बड़ी देर हो गई, राजा के पास जाओ, भाइयों को बुलाकर भोजन करो।" फिर जब वनगमन की बात याद आती है तो वे "रहि चकि चित्रलिखी सी" — चकित होकर चित्र में लिखी-सी (निश्चल) रह जाती हैं। तुलसी कहते हैं कि उस समय का वर्णन करते हुए प्रेम भी मानो सीखा हुआ-सा लगता है।

    पद 2: "राघौ! एक बार फिरि आवौ।" माता राम से एक बार लौट आने का निवेदन करती हैं: अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों (बाजि) को देखकर फिर वन चले जाना। जिन घोड़ों को राम ने अपने कर-कमलों से दूध पिलाकर पाला और बार-बार पुचकारा, वे अब कैसे जिएँगे? भरत उन्हें राम का प्रिय जानकर सौ गुनी देखभाल करते हैं, फिर भी वे दिन-प्रतिदिन ऐसे मलिन (झाँवरे) होते जा रहे हैं "मनहुँ कमल हिममारे" — मानो पाले के मारे कमल हों। अंत में माता पथिक से कहती हैं: राम मिलें तो माँ का संदेश कहना — मुझे और सबसे अधिक इन घोड़ों की चिंता (अंदेसो) है। माँ अपनी पीड़ा छिपाकर घोड़ों के बहाने राम को बुलाती है: यही इस पद की करुणा है।

    काव्य-सौंदर्य और शिल्प

  • भाषा: मानस-अंश अवधी में, गीतावली के पद ब्रजभाषा में। दोनों पर समान अधिकार: यही प्रश्न "तुलसी का भाषा पर पूरा अधिकार" का मुख्य आधार है।
  • छंद: मानस-अंश में चौपाई और दोहा; गीतावली में गेय पद।
  • रस: भरत प्रसंग में भक्ति, आत्मग्लानि और करुण भाव; कौशल्या के पदों में करुण/वात्सल्य वियोग।
  • अलंकार:
  • - "नीरज नयन" — रूपक/उपमा (कमल जैसे नेत्र)।

    - "फरइ कि कोदव बालि सुसाली…" — दृष्टांत; साथ ही प्रश्न-शैली।

    - "मोर अभाग उदधि अवगाहू" — रूपक (अभाग्य रूपी समुद्र)।

    - "कुलिस कठिन उर" — उपमा (वज्र जैसा कठोर हृदय)।

    - "रहि चकि चित्रलिखी सी" — उपमा (वाचक 'सी')।

    - "मनहुँ कमल हिममारे" — उत्प्रेक्षा (वाचक 'मनहुँ')।

    - "बार बार", "गुनि-गुनि" जैसे प्रयोगों में पुनरुक्ति; अनुप्रास स्थान-स्थान पर।

    बोर्ड परीक्षा फोकस (प्रश्न-अभ्यास पर आधारित)

    प्रश्न: "हारेंहु खेल जितावहिं मोही" का आशय?

    उत्तर-रूपरेखा: (1) बचपन में खेल में राम जान-बूझकर हार जाते और भरत को जिता देते। (2) इससे राम का छोटे भाई के प्रति स्नेह, उदारता और त्याग प्रकट होता है। (3) भरत इसे राम की कृपा-रीति मानते हैं; इसी कारण उन्हें विश्वास है कि राम उनके अपराध पर भी क्रोध नहीं करेंगे।

    प्रश्न: "महीं सकल अनरथ कर मूला" से भरत के भाव?

    उत्तर-रूपरेखा: (1) भरत स्वयं को पिता की मृत्यु, राम के वनगमन, माताओं और प्रजा के दुख का मूल कारण मानते हैं। (2) यह आत्मग्लानि है, दोष दूसरों पर नहीं डालते। (3) इससे उनका विनम्र, पश्चात्तापी और राम-भक्त चरित्र सामने आता है।

    प्रश्न: "राघौ! एक बार फिरि आवौ" में करुणा और संदेश?

    उत्तर-रूपरेखा: (1) माँ घोड़ों के बहाने राम को लौटने का आग्रह करती है। (2) पशुओं तक का दुख दिखाकर वियोग की व्यापकता बताई गई है। (3) "मनहुँ कमल हिममारे" उत्प्रेक्षा से मलिनता का सजीव चित्र; माँ की अपनी पीड़ा अनकही पर गहरी है।

    अन्य संभावित प्रश्न: "रहि चकि चित्रलिखी सी" का मर्म; उपमा के दो उदाहरण; उत्प्रेक्षा कहाँ और क्यों।

    कठिन शब्द

  • ठाढ़े — खड़े होना
  • कोह — क्रोध
  • बिसेखी — विशेष
  • खुनिस — क्रोध, अप्रसन्नता
  • मिस — बहाना, माध्यम
  • सुचि — पवित्र, शुद्ध
  • कोदव — मोटे चावल की एक किस्म (कोदों)
  • सुसाली — (उत्तम) धान
  • संबुक — घोंघा
  • उदधि — सागर
  • अघ — पाप
  • साखी — साक्षी
  • कुलिस — वज्र
  • पनहियाँ — जूतियाँ
  • बाजि — घोड़ा
  • झाँवरे — कुम्हलाना, मलिन होना
  • अंदेसो — अंदेशा, चिंता
  • सामान्य भूलें

  • "भरत-राम का प्रेम" को बालकांड या अरण्यकांड का बताना — यह अयोध्या कांड से है।
  • गीतावली के पदों को अवधी का लिखना — ये ब्रजभाषा में हैं; मानस-अंश अवधी में है।
  • "राघौ! एक बार फिरि आवौ" में बोलने वाले को भरत मान लेना — बोलने वाली माता कौशल्या हैं; भरत का उल्लेख घोड़ों की देखभाल करने वाले के रूप में है।
  • "मनहुँ कमल हिममारे" को उपमा लिखना — 'मनहुँ' वाचक होने से यह उत्प्रेक्षा है।
  • रत्नावली प्रसंग को प्रमाणित तथ्य की तरह लिखना — पुस्तक के अनुसार इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं है।
  • "हारेंहुँ खेल जितावहिं" का अर्थ "भरत राम को जिताते थे" कर देना — उल्टा है: राम भरत को जिताते थे।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓भरत-राम का प्रेम रामचरितमानस के अयोध्या कांड से है; इसमें चित्रकूट की सभा में भरत की आत्मग्लानि, राम के प्रति श्रद्धा और स्वयं को सारे अनर्थ का मूल मानने का भाव है।
    • ✓राम का स्वभाव: अपराधी पर भी क्रोध न करना, खेल में हारकर भी भरत को जिताना, कभी भरत का मन न तोड़ना।
    • ✓गीतावली के पहले पद में कौशल्या राम के बाल धनुष-बाण और जूतियाँ देखकर वियोग में 'चित्रलिखी-सी' हो जाती हैं।
    • ✓दूसरे पद 'राघौ! एक बार फिरि आवौ' में माता घोड़ों के बहाने राम को लौटने का निवेदन करती हैं; 'मनहुँ कमल हिममारे' उत्प्रेक्षा है।
    • ✓तुलसी का अवधी (मानस, दोहा-चौपाई) और ब्रजभाषा (गीतावली, पद) दोनों पर समान अधिकार है; वे समन्वय और लोकमंगल के कवि हैं।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पाठ शुरू करने से पहले अयोध्या कांड की कथा (कैकेयी के वर, दशरथ-मरण, भरत का चित्रकूट जाना) 5 मिनट में सुनाएँ, ताकि 'सभा' और 'मुनिनाथ' का संदर्भ स्पष्ट रहे।
    • →चौपाइयों का सस्वर पाठ कराएँ; अवधी और ब्रज के उच्चारण का अंतर (जैसे 'मोही', 'आवौ') बोलकर दिखाएँ।
    • →कक्षा को दो समूहों में बाँटें: एक समूह भरत के वाक्यों से 'आत्मग्लानि' के प्रमाण खोजे, दूसरा 'राम के स्वभाव' के प्रमाण।
    • →'फरइ कि कोदव बालि सुसाली' को वस्तुओं के उदाहरण (मोटा अनाज बनाम उत्तम धान, घोंघा बनाम मोती) से समझाएँ और दृष्टांत अलंकार की परिभाषा वहीं लिखवाएँ।
    • →कौशल्या वाले पदों को भूमिका-पाठ (रोल-रीडिंग) से पढ़वाएँ; विद्यार्थी माँ की आवाज़ में 'उठहु तात!' कहें, जिससे वात्सल्य और करुणा अनुभव हो।
    • →बोर्ड के लिए उपमा बनाम उत्प्रेक्षा का एक चार्ट बनवाएँ: वाचक शब्द सा/सी/सम (उपमा) और मनहुँ/मानो/जनु (उत्प्रेक्षा)।
    • →योग्यता-विस्तार के प्रश्न 'आज के संदर्भ में भरत जैसा भ्रातृप्रेम' पर 5 मिनट की वाद-विवाद गतिविधि कराएँ।

    📋 Assessment Questions

    1. विद्यार्थी 'हारेंहुँ खेल जितावहिं मोही' और 'महीं सकल अनरथ कर मूला' की सप्रसंग व्याख्या कर सकें।
    2. मानस-अंश और गीतावली-पदों में भाषा, छंद और रस का अंतर बता सकें।
    3. पाठ से उपमा के दो और उत्प्रेक्षा का एक उदाहरण छाँटकर कारण सहित लिख सकें।
    4. 'रहि चकि चित्रलिखी सी' और 'राघौ! एक बार फिरि आवौ' की करुणा को अपने शब्दों में स्पष्ट कर सकें।
    5. कठिन शब्दों (कोह, खुनिस, कुलिस, संबुक, बाजि, अंदेसो) के अर्थ सही लिख सकें।

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    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
    3. 3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' – यह दीप अकेला, मैंने देखा, एक बूँद
    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
    6. 6. तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
    7. 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
    8. 8. विद्यापति – पद
    9. 9. घनानंद – कवित्त
    10. 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
    11. 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
    12. 12. फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया
    13. 13. भीष्म साहनी – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
    14. 14. असगर वजाहत – शेर, पहचान, चार हाथ, साझा
    15. 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
    16. 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
    17. 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज