तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद – Class 12 Hindi Chapter 6 Notes & NCERT PDF
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पाठ 6: तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
परिचय
यह पाठ गोस्वामी तुलसीदास की दो रचनाओं से लिया गया है। पहला अंश रामचरितमानस के अयोध्या कांड से है, जिसका शीर्षक पाठ्यपुस्तक में "भरत-राम का प्रेम" दिया गया है। दूसरे अंश में गीतावली के दो पद हैं। पहले अंश में राम के वनगमन के बाद चित्रकूट की सभा में खड़े भरत की मनोदशा है, और दूसरे अंश में पुत्र-वियोग से व्याकुल माता कौशल्या की विरह-वेदना है। दोनों अंशों का केंद्रीय भाव है प्रेम, आत्मग्लानि और वियोग की करुणा। बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से व्याख्या, भाव-सौंदर्य, शिल्प-सौंदर्य और अलंकार-पहचान के प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।
कवि परिचय
पाठ का सार और व्याख्या
(क) भरत-राम का प्रेम (रामचरितमानस, अयोध्या कांड)
प्रसंग: चित्रकूट में मुनि वसिष्ठ और राम की उपस्थिति में सभा हो रही है। भरत से अपनी बात कहने को कहा जाता है।
(ख) गीतावली के पद
पद 1: "जननी निरखति बान धनुहियाँ।" माता कौशल्या राम के छोटे-छोटे बाण और धनुष देखती हैं; प्रभु की सुंदर जूतियों (पनहियाँ) को बार-बार हृदय और नेत्रों से लगाती हैं। कभी पहले की तरह सवेरे जाकर प्रिय वचनों से जगाती हैं: "उठो तात, माता बलिहारी जाती है, छोटे भाई और सखा द्वार पर खड़े हैं।" कभी कहती हैं: "बड़ी देर हो गई, राजा के पास जाओ, भाइयों को बुलाकर भोजन करो।" फिर जब वनगमन की बात याद आती है तो वे "रहि चकि चित्रलिखी सी" — चकित होकर चित्र में लिखी-सी (निश्चल) रह जाती हैं। तुलसी कहते हैं कि उस समय का वर्णन करते हुए प्रेम भी मानो सीखा हुआ-सा लगता है।
पद 2: "राघौ! एक बार फिरि आवौ।" माता राम से एक बार लौट आने का निवेदन करती हैं: अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों (बाजि) को देखकर फिर वन चले जाना। जिन घोड़ों को राम ने अपने कर-कमलों से दूध पिलाकर पाला और बार-बार पुचकारा, वे अब कैसे जिएँगे? भरत उन्हें राम का प्रिय जानकर सौ गुनी देखभाल करते हैं, फिर भी वे दिन-प्रतिदिन ऐसे मलिन (झाँवरे) होते जा रहे हैं "मनहुँ कमल हिममारे" — मानो पाले के मारे कमल हों। अंत में माता पथिक से कहती हैं: राम मिलें तो माँ का संदेश कहना — मुझे और सबसे अधिक इन घोड़ों की चिंता (अंदेसो) है। माँ अपनी पीड़ा छिपाकर घोड़ों के बहाने राम को बुलाती है: यही इस पद की करुणा है।
काव्य-सौंदर्य और शिल्प
- "नीरज नयन" — रूपक/उपमा (कमल जैसे नेत्र)।
- "फरइ कि कोदव बालि सुसाली…" — दृष्टांत; साथ ही प्रश्न-शैली।
- "मोर अभाग उदधि अवगाहू" — रूपक (अभाग्य रूपी समुद्र)।
- "कुलिस कठिन उर" — उपमा (वज्र जैसा कठोर हृदय)।
- "रहि चकि चित्रलिखी सी" — उपमा (वाचक 'सी')।
- "मनहुँ कमल हिममारे" — उत्प्रेक्षा (वाचक 'मनहुँ')।
- "बार बार", "गुनि-गुनि" जैसे प्रयोगों में पुनरुक्ति; अनुप्रास स्थान-स्थान पर।
बोर्ड परीक्षा फोकस (प्रश्न-अभ्यास पर आधारित)
प्रश्न: "हारेंहु खेल जितावहिं मोही" का आशय?
उत्तर-रूपरेखा: (1) बचपन में खेल में राम जान-बूझकर हार जाते और भरत को जिता देते। (2) इससे राम का छोटे भाई के प्रति स्नेह, उदारता और त्याग प्रकट होता है। (3) भरत इसे राम की कृपा-रीति मानते हैं; इसी कारण उन्हें विश्वास है कि राम उनके अपराध पर भी क्रोध नहीं करेंगे।
प्रश्न: "महीं सकल अनरथ कर मूला" से भरत के भाव?
उत्तर-रूपरेखा: (1) भरत स्वयं को पिता की मृत्यु, राम के वनगमन, माताओं और प्रजा के दुख का मूल कारण मानते हैं। (2) यह आत्मग्लानि है, दोष दूसरों पर नहीं डालते। (3) इससे उनका विनम्र, पश्चात्तापी और राम-भक्त चरित्र सामने आता है।
प्रश्न: "राघौ! एक बार फिरि आवौ" में करुणा और संदेश?
उत्तर-रूपरेखा: (1) माँ घोड़ों के बहाने राम को लौटने का आग्रह करती है। (2) पशुओं तक का दुख दिखाकर वियोग की व्यापकता बताई गई है। (3) "मनहुँ कमल हिममारे" उत्प्रेक्षा से मलिनता का सजीव चित्र; माँ की अपनी पीड़ा अनकही पर गहरी है।
अन्य संभावित प्रश्न: "रहि चकि चित्रलिखी सी" का मर्म; उपमा के दो उदाहरण; उत्प्रेक्षा कहाँ और क्यों।
कठिन शब्द
सामान्य भूलें
💡 Key Learning Points
- ✓भरत-राम का प्रेम रामचरितमानस के अयोध्या कांड से है; इसमें चित्रकूट की सभा में भरत की आत्मग्लानि, राम के प्रति श्रद्धा और स्वयं को सारे अनर्थ का मूल मानने का भाव है।
- ✓राम का स्वभाव: अपराधी पर भी क्रोध न करना, खेल में हारकर भी भरत को जिताना, कभी भरत का मन न तोड़ना।
- ✓गीतावली के पहले पद में कौशल्या राम के बाल धनुष-बाण और जूतियाँ देखकर वियोग में 'चित्रलिखी-सी' हो जाती हैं।
- ✓दूसरे पद 'राघौ! एक बार फिरि आवौ' में माता घोड़ों के बहाने राम को लौटने का निवेदन करती हैं; 'मनहुँ कमल हिममारे' उत्प्रेक्षा है।
- ✓तुलसी का अवधी (मानस, दोहा-चौपाई) और ब्रजभाषा (गीतावली, पद) दोनों पर समान अधिकार है; वे समन्वय और लोकमंगल के कवि हैं।
👨🏫 Teaching Tips
- →पाठ शुरू करने से पहले अयोध्या कांड की कथा (कैकेयी के वर, दशरथ-मरण, भरत का चित्रकूट जाना) 5 मिनट में सुनाएँ, ताकि 'सभा' और 'मुनिनाथ' का संदर्भ स्पष्ट रहे।
- →चौपाइयों का सस्वर पाठ कराएँ; अवधी और ब्रज के उच्चारण का अंतर (जैसे 'मोही', 'आवौ') बोलकर दिखाएँ।
- →कक्षा को दो समूहों में बाँटें: एक समूह भरत के वाक्यों से 'आत्मग्लानि' के प्रमाण खोजे, दूसरा 'राम के स्वभाव' के प्रमाण।
- →'फरइ कि कोदव बालि सुसाली' को वस्तुओं के उदाहरण (मोटा अनाज बनाम उत्तम धान, घोंघा बनाम मोती) से समझाएँ और दृष्टांत अलंकार की परिभाषा वहीं लिखवाएँ।
- →कौशल्या वाले पदों को भूमिका-पाठ (रोल-रीडिंग) से पढ़वाएँ; विद्यार्थी माँ की आवाज़ में 'उठहु तात!' कहें, जिससे वात्सल्य और करुणा अनुभव हो।
- →बोर्ड के लिए उपमा बनाम उत्प्रेक्षा का एक चार्ट बनवाएँ: वाचक शब्द सा/सी/सम (उपमा) और मनहुँ/मानो/जनु (उत्प्रेक्षा)।
- →योग्यता-विस्तार के प्रश्न 'आज के संदर्भ में भरत जैसा भ्रातृप्रेम' पर 5 मिनट की वाद-विवाद गतिविधि कराएँ।
📋 Assessment Questions
- विद्यार्थी 'हारेंहुँ खेल जितावहिं मोही' और 'महीं सकल अनरथ कर मूला' की सप्रसंग व्याख्या कर सकें।
- मानस-अंश और गीतावली-पदों में भाषा, छंद और रस का अंतर बता सकें।
- पाठ से उपमा के दो और उत्प्रेक्षा का एक उदाहरण छाँटकर कारण सहित लिख सकें।
- 'रहि चकि चित्रलिखी सी' और 'राघौ! एक बार फिरि आवौ' की करुणा को अपने शब्दों में स्पष्ट कर सकें।
- कठिन शब्दों (कोह, खुनिस, कुलिस, संबुक, बाजि, अंदेसो) के अर्थ सही लिख सकें।
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All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12
- 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
- 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
- 3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' – यह दीप अकेला, मैंने देखा, एक बूँद
- 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
- 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
- 6. तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
- 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
- 8. विद्यापति – पद
- 9. घनानंद – कवित्त
- 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
- 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
- 12. फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया
- 13. भीष्म साहनी – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
- 14. असगर वजाहत – शेर, पहचान, चार हाथ, साझा
- 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
- 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
- 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज