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घनानंद – कवित्त – Class 12 Hindi Chapter 9 Notes & NCERT PDF

Class 12HindiChapter 9NCERT book: अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

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पाठ 9: घनानंद – कवित्त

परिचय

इस पाठ में रीतिकाल के रीतिमुक्त (स्वच्छंद) कवि घनानंद के दो कवित्त हैं। दोनों कवित्तों में कवि अपनी प्रेमिका सुजान को संबोधित करते हैं। पहले कवित्त में सुजान के दर्शन की अभिलाषा है — कवि कहते हैं कि उनके प्राण सुजान का संदेश पाने के लिए ही अटके हुए हैं। दूसरे कवित्त में प्रेमी का उलाहना और चुनौती है — प्रेमिका की उपेक्षा (आनाकानी) के सामने प्रेमी कहता है कि एक दिन उसकी पुकार सुजान के कान खोल ही देगी। पाठ छोटा है, पर भाषा अत्यंत सघन और लाक्षणिक है; इसलिए बोर्ड परीक्षा में अलंकार-पहचान और आशय-स्पष्टीकरण के प्रश्न प्रमुख रहते हैं।

कवि परिचय

  • जीवनकाल: सन् 1673-1760।
  • रीतिकाल के रीतिमुक्त या स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि।
  • दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे।
  • कहा जाता है कि सुजान नाम की एक स्त्री से उनका अटूट प्रेम था। उसी के प्रेम के कारण वे दरबार में बे-अदबी कर बैठे और नाराज़ बादशाह ने उन्हें दरबार से निकाल दिया। सुजान की बेवफ़ाई ने भी उन्हें निराश और दुखी किया।
  • वे वृंदावन चले गए और निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित होकर भक्त के रूप में जीवन बिताने लगे; फिर भी सुजान को भूल न सके और रचनाओं में सुजान नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते रहे।
  • मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि; वियोग-वर्णन में उनका मन अधिक रमा। प्रेम का गंभीर, निर्मल, आवेगमय और उदात्त रूप व्यक्त होने के कारण उन्हें "साक्षात रसमूर्ति" कहा गया।
  • कला: लाक्षणिकता, वक्रोक्ति, वाग्विदग्धता, अलंकारों का कुशल प्रयोग; सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल।
  • भाषा: परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा; कोमलता और मधुरता का चरम विकास। वे ब्रजभाषा-प्रवीण ही नहीं, सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्रणेता भी थे।
  • रचनाएँ: सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंद निबंध, रसकेलि वल्ली आदि।
  • पाठ का सार और व्याख्या

    कवित्त 1: "बहुत दिनान को अवधि आसपास परे…"

  • "बहुत दिनान को अवधि आसपास परे, खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को।" प्रिय के लौटने की बहुत दिनों से प्रतीक्षित अवधि अब पास आ गई है (या बीतने को है); इतने लंबे इंतज़ार से प्राण अत्यंत व्याकुल (अरबरनि भरे) होकर शरीर छोड़कर जाने को तैयार खड़े हैं।
  • "कहि कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि गहि राखति ही दे दे सनमान को।" अब तक मैं 'सुंदर मनभावन आने वाले हैं' — ऐसा बार-बार कहकर, आदर-सम्मान दे-देकर इन प्राणों को पकड़-पकड़कर रोकता रहा।
  • "झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास है कै, अब ना घिरत घन आनंद निदान को।" पर झूठी बातों पर विश्वास (पत्यानि) करते-करते प्राण अब उदास हो गए हैं; अब अंततः आनंद के बादल (घन आनंद) घिरते ही नहीं। यहाँ 'घन आनंद' में कवि का नाम भी है — श्लेष।
  • "अधर लगे हैं आनि करि के पयान प्रान, चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।" प्राण प्रस्थान करके होठों तक आ गए हैं (मृत्यु निकट है); वे जाना तो चाहते हैं, पर सुजान का संदेश लेकर ही। अर्थात् अंतिम साँस तक प्रेमी को प्रिया के संदेश की आशा है — यही आशा प्राणों को रोके हुए है।
  • भाव: लंबी प्रतीक्षा, झूठे आश्वासनों से टूटा विश्वास, और फिर भी मृत्यु के क्षण तक प्रिय के संदेश की अभिलाषा।

    कवित्त 2: "आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं?…"

  • "आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं? कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै?" प्रेमी सुजान से पूछता है: कब तक टाल-मटोल (आनाकानी) करते हुए अपनी आरसी (अँगूठे में पहना शीशा जड़ा आभूषण) में अपना ही रूप निहारते रहोगे? क्या मेरी चकित (हैरान, व्याकुल) दशा की ओर तुम्हारी दृष्टि कभी नहीं घूमेगी?
  • "मौन हू सौं देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू, कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।" मैं भी मौन रहकर देखूँगा कि तुम अपना (न बोलने, उपेक्षा करने का) प्रण कितना निभाते हो; मेरी पुकार भरी चुप्पी (कूकभरी मूकता) ही तुम्हें बुलाकर बुलवा लेगी।
  • "जान घनआनंद यों मोहिं तुम्हें पैज परी, जानियेगो टेक टरें कौन धौं मलोलिहै॥" हे सुजान, घनानंद कहते हैं: मेरे और तुम्हारे बीच यह होड़ (पैज) ठन गई है; देखना है कि किसका हठ (टेक) टलता है और कौन पछताता/दुखी होता है।
  • "रुई दिए रहौगे कहाँ लौं बहरायबे की? कबहूँ तो मेरिये पुकार कान खोलिहै।" कानों में रुई डालकर बहरे बनने का नाटक कब तक करोगे? कभी तो मेरी पुकार तुम्हारे कान खोल ही देगी।
  • भाव: प्रेमिका की निष्ठुरता और उपेक्षा के प्रति प्रेमी का उलाहना, आत्मविश्वास और चुनौती; मौन भी यहाँ पुकार बन जाता है।

    काव्य-सौंदर्य और शिल्प

  • भाषा: परिष्कृत साहित्यिक ब्रजभाषा — दिनान, बतियानि, पत्यानि, निहारिबो, देखिहौं, बोलिहै जैसे ब्रज रूप; मुहावरे — "प्राण अधर पर आना", "कान खोलना", "कानों में रुई देना"।
  • छंद: कवित्त (मनहरण कवित्त)।
  • रस: वियोग शृंगार।
  • शैली: लाक्षणिकता और वचन-वक्रता — सीधी बात न कहकर उलाहने, प्रश्न और चुनौती के रूप में कहना।
  • अलंकार (प्रश्न-अभ्यास का प्रश्न 5):
  • - (क) "कहि कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि गहि राखति ही दे दे सनमान को" — पुनरुक्तिप्रकाश (कहि कहि, गहि गहि, दे दे) और अनुप्रास।

    - (ख) "कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै" — विरोधाभास (मूकता, अर्थात् चुप्पी, में कूक, अर्थात् पुकार) — चुप्पी का बोलना विरोध का आभास देता है; साथ ही मानवीकरण (मूकता बुलाती है)।

    - (ग) "अब न घिरत घन आनंद निदान को" — श्लेष ('घन आनंद' = आनंद के बादल, और कवि का नाम घनानंद); साथ ही रूपक का भाव।

    - "जान घनआनंद" — 'जान' = सुजान (प्रिया) का संक्षेप; प्रतीकात्मक प्रयोग।

  • अनुप्रास के उदाहरण (योग्यता-विस्तार): "झूठी बतियानि की पत्यानि", "आनाकानी आरसी", "कूकभरी मूकता", "पन पालिहौ", "टेक टरें"।
  • बोर्ड परीक्षा फोकस (प्रश्न-अभ्यास पर आधारित)

    प्रश्न: कवि ने "चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को" क्यों कहा है?

    उत्तर-रूपरेखा: (1) लंबी प्रतीक्षा और झूठे आश्वासनों से प्राण निराश होकर होठों तक आ गए हैं। (2) फिर भी वे सुजान का संदेश पाए बिना नहीं जाना चाहते। (3) इससे प्रेम की गहराई और अंतिम क्षण तक बनी आशा प्रकट होती है — संदेश की अभिलाषा ही प्राणों को रोके हुए है।

    प्रश्न: कवि मौन होकर प्रेमिका के कौन-से प्रण का पालन देखना चाहता है?

    उत्तर-रूपरेखा: (1) प्रेमिका ने आनाकानी करने, न बोलने और प्रेमी की ओर न देखने का प्रण (हठ) ठाना है। (2) कवि भी मौन रहकर देखना चाहता है कि वह यह प्रण कब तक निभाती है। (3) उसे विश्वास है कि उसकी पुकार भरी चुप्पी ही प्रेमिका को बोलने पर विवश कर देगी।

    प्रश्न: किस प्रकार की पुकार से "कान खोलिहै" की बात कही गई है?

    उत्तर-रूपरेखा: हृदय की सच्ची, वेदना-भरी पुकार — जो मौन होकर भी 'कूकभरी' है। प्रेमिका कानों में रुई डालकर बहरी बनी है, पर प्रेमी को विश्वास है कि उसकी सच्ची पुकार एक दिन उसके कान खोल देगी।

    कठिन शब्द

  • अवधि — निश्चित समय, (लौटने की) मियाद
  • अरबरनि — व्याकुलता, हड़बड़ी
  • छबीले — सुंदर
  • पत्यानि — विश्वास करना
  • निदान — अंत में
  • अधर — होंठ
  • पयान — प्रस्थान
  • आनाकानी — टालने की बात
  • आरसी — स्त्रियों द्वारा अँगूठे में पहना जाने वाला शीशा जड़ा आभूषण
  • दीठि — दृष्टि
  • पन — प्रण
  • कूकभरी — पुकार भरी
  • पैज — होड़, हठ (पुस्तक में 'बहस')
  • टेक — हठ, प्रण
  • बहरायबे — बहरे बनने की, कानों से न सुनने की
  • सामान्य भूलें

  • घनानंद को रीतिबद्ध कवि लिखना — वे रीतिमुक्त/स्वच्छंद धारा के प्रतिनिधि हैं।
  • उन्हें अकबर का दरबारी लिखना — वे मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे।
  • 'सुजान' को केवल 'चतुर व्यक्ति' के अर्थ में लेना — यहाँ सुजान कवि की प्रेमिका का नाम है, जिसका वे प्रतीकात्मक प्रयोग करते हैं।
  • "कूकभरी मूकता" में केवल अनुप्रास लिखकर रुक जाना — मुख्य अलंकार विरोधाभास है।
  • "घन आनंद" में श्लेष न पहचानना — इसमें 'आनंद के बादल' और 'कवि का नाम' दोनों अर्थ हैं।
  • "आरसी" का अर्थ साधारण दर्पण लिखना — पुस्तक के अनुसार यह अँगूठे में पहना जाने वाला शीशा जड़ा आभूषण है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓घनानंद रीतिकाल की रीतिमुक्त (स्वच्छंद) धारा के प्रतिनिधि कवि और मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे; सुजान के प्रति प्रेम और विरह उनकी कविता का केंद्र है।
    • ✓पहले कवित्त में लंबी प्रतीक्षा और झूठे आश्वासनों से निराश प्राण होठों तक आ गए हैं, पर सुजान का संदेश लेकर ही जाना चाहते हैं।
    • ✓दूसरे कवित्त में प्रेमी उपेक्षा करती प्रेमिका को उलाहना और चुनौती देता है: उसकी 'कूकभरी मूकता' और पुकार एक दिन प्रेमिका के कान खोल देगी।
    • ✓प्रमुख अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश (कहि कहि, गहि गहि), विरोधाभास (कूकभरी मूकता), श्लेष (घन आनंद), अनुप्रास।
    • ✓भाषा परिष्कृत साहित्यिक ब्रजभाषा है, छंद कवित्त है; लाक्षणिकता और वचन-वक्रता घनानंद की विशेष पहचान हैं।

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →पहले घनानंद और सुजान की कथा सुनाएँ (दरबार से निष्कासन, वृंदावन, निंबार्क संप्रदाय); इससे 'सुजान' और 'जान' के प्रयोग का अर्थ खुलता है।
    • →रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त कवियों का अंतर एक छोटे चार्ट से समझाएँ और बिहारी, केशव से तुलना करें।
    • →कवित्त का सस्वर, लय सहित पाठ कराएँ; कवित्त छंद की गति का अनुभव कराना व्याख्या से पहले उपयोगी है।
    • →हर पंक्ति के लिए 'शब्द-अर्थ-भाव' की तीन-स्तरीय व्याख्या बोर्ड पर लिखें, क्योंकि ब्रज के क्रियारूप (देखिहौं, बोलिहै, खोलिहै) कठिन लगते हैं।
    • →'कूकभरी मूकता' पर चर्चा कराएँ: क्या चुप्पी भी बोल सकती है? विद्यार्थी अपने जीवन से उदाहरण दें — इससे विरोधाभास अलंकार पक्का होता है।
    • →मुहावरों की सूची बनवाएँ (प्राण अधर पर आना, कानों में रुई डालना, कान खोलना) और उनका वाक्य-प्रयोग कराएँ।
    • →योग्यता-विस्तार के अनुसार तुलसीदास, रसखान, पद्माकर, सेनापति के कवित्त एकत्र कराकर कक्षा में 'कवित्त-पाठ' आयोजित करें।

    📋 Assessment Questions

    1. विद्यार्थी दोनों कवित्तों की सप्रसंग व्याख्या कर सकें।
    2. 'चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को' और 'कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै' का आशय स्पष्ट कर सकें।
    3. प्रश्न-अभ्यास की तीनों पंक्तियों में अलंकार (पुनरुक्तिप्रकाश, विरोधाभास, श्लेष) पहचानकर कारण बता सकें।
    4. घनानंद की भाषिक विशेषताएँ (ब्रजभाषा, लाक्षणिकता, वचन-वक्रता, मुहावरे) उदाहरण सहित लिख सकें।

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    All chapters in अंतरा भाग 2 (Antra) - Hindi Class 12

    1. 1. जयशंकर प्रसाद – देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत
    2. 2. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – सरोज स्मृति
    3. 3. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' – यह दीप अकेला, मैंने देखा, एक बूँद
    4. 4. केदारनाथ सिंह – बनारस, दिशा
    5. 5. रघुवीर सहाय – वसंत आया, तोड़ो
    6. 6. तुलसीदास – भरत-राम का प्रेम, पद
    7. 7. मलिक मुहम्मद जायसी – बारहमासा
    8. 8. विद्यापति – पद
    9. 9. घनानंद – कवित्त
    10. 10. रामचंद्र शुक्ल – प्रेमघन की छाया-स्मृति
    11. 11. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी – सुमिरिनी के मनके
    12. 12. फणीश्वरनाथ 'रेणु' – संवदिया
    13. 13. भीष्म साहनी – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात
    14. 14. असगर वजाहत – शेर, पहचान, चार हाथ, साझा
    15. 15. निर्मल वर्मा – जहाँ कोई वापसी नहीं
    16. 16. ममता कालिया – दूसरा देवदास
    17. 17. हजारी प्रसाद द्विवेदी – कुटज