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उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् – Class 9 Sanskrit Chapter 7 Notes & NCERT PDF

Class 9SanskritChapter 7NCERT book: शारदा (Sharada) - Sanskrit Class 9

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पाठ 7: उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् (बुद्धिमान उपाय के साथ उसका अपाय भी सोचे)

पाठ-परिचय

सप्तमः पाठः — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् (बुद्धिमान उपाय सोचे और उसके संकट/हानि को भी सोचे)

पाठ की शुरुआत माँ-बेटे के संवाद से होती है। पुत्र को रास्ते में पड़ा धन मिलता है और वह उससे खिलौने खरीदना चाहता है। माँ कहती है — यह दूसरे का परिश्रम से कमाया धन है, उसी को लौटाना चाहिए; दूसरे के धन को तिनके के समान समझना चाहिए। इसे समझाने के लिए माँ पञ्चतन्त्र की एक कथा सुनाती है — धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा, जो पाठ में नाट्य-रूप में दी गई है।

पाठ-सार (कथा)

  • दो मित्र: किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र रहते थे। पापबुद्धि सोचता है — मैं मूर्ख और दरिद्र हूँ; धर्मबुद्धि को साथ लेकर परदेश जाऊँगा, उसके सहारे धन कमाऊँगा, फिर उसे भी ठगकर सुखी हो जाऊँगा।
  • परदेश जाने का तर्क: पापबुद्धि दो श्लोक सुनाता है —
  • देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम् ।
    भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम् ॥

    (जिसने पृथ्वी पर घूमकर अन्य देशों की अनेक भाषाएँ, वेश आदि नहीं जाने, उसका जन्म व्यर्थ है।)

    विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक् ।
    यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥

    (मनुष्य तब तक विद्या, धन और शिल्प ठीक से नहीं पाता, जब तक प्रसन्न होकर एक देश से दूसरे देश नहीं जाता।)

  • धन गाड़ना: दोनों गुरुजनों की अनुमति लेकर परदेश जाते हैं और खूब धन कमाते हैं। लौटते समय पापबुद्धि कहता है कि सारा धन घर ले जाना ठीक नहीं; इसे घने जंगल में भूमि में गाड़कर थोड़ा-सा लेकर घर चलें। धर्मबुद्धि मान जाता है। आधी रात (निशीथे) पापबुद्धि जंगल में जाकर सारा धन निकाल लेता है और गड्ढा भर देता है।
  • झूठा आरोप: कुछ दिनों बाद दोनों धन लेने जाते हैं तो खाली बर्तन (रिक्तं भाण्डम्) मिलता है। पापबुद्धि सिर पीटते हुए धर्मबुद्धि पर ही चोरी का आरोप लगाता है और आधा धन माँगता है। धर्मबुद्धि कहता है —
  • मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् ।
    आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः ॥

    (धर्मबुद्धि वाले दूसरों की पत्नियों को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखते हैं।)

  • वनदेवता का निर्णय: कोई साक्षी न होने पर धर्माधिकारी कहता है कि वनदेवता ही निर्णय करेगी। पापबुद्धि अपने पिता को शमी वृक्ष के बड़े कोटर में छिपा देता है। अगले दिन पापबुद्धि श्लोक पढ़ता है —
  • आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
    अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम् ॥

    (सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ और धर्म — मनुष्य के आचरण को जानते हैं।) कोटर से पिता बोलता है — धर्मबुद्धि ने धन चुराया है।

  • सत्य का प्रकटीकरण: धर्मबुद्धि कोटर को जलने वाली वस्तुओं से घेरकर आग लगा देता है। अधजला पिता बाहर निकलकर कहता है — यह सब पापबुद्धि की करतूत है — और मर जाता है। राजपुरुष पापबुद्धि को दण्ड देते हैं और धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हैं।
  • सीख: पापबुद्धि की व्यर्थ चतुराई से उसका पिता आग से मारा गया। इसलिए — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् — बुद्धिमान उपाय के साथ उसके दुष्परिणाम (अपाय) को भी सोचे।
  • शब्दार्थ

  • अपायम् — विघ्न, संकट, हानि
  • अटव्याम् — वन में
  • निशीथे — आधी रात में
  • निक्षिप्य — रखकर (नि + √क्षिप् + ल्यप्)
  • खनित्वा — खोदकर
  • भाण्डम् — पात्र, घड़ा
  • वञ्चयित्वा — ठगकर
  • लोष्ठवत् — मिट्टी के ढेले के समान
  • वीक्षन्ते — देखते हैं
  • उत्फुल्ललोचनाः — आश्चर्य से फैली आँखों वाले (बहुव्रीहि)
  • परिवेष्ट्य — घेरकर
  • स्फुटितेक्षणः — जिसकी आँखें फूट गई हों (बहुव्रीहि)
  • प्रहृष्टमनाः — प्रसन्न मन वाला (बहुव्रीहि)
  • द्यौः — आकाश; आपः — जल
  • व्याकरण-बिन्दु

  • नित्य-बहुवचनान्त शब्द: कुछ शब्द सदा बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं — आपः (जल), दाराः (पत्नी), लाजाः (खील), अक्षताः (चावल), प्राणाः, असवः, सिकताः (रेत), वर्षाः, कति, यति, तति तथा त्रि से आगे की संख्याएँ। इसीलिए "आदित्यचन्द्रावनिलो…" श्लोक में अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः एकवचन में हैं, पर आपः बहुवचन में।
  • विशेषण-विशेष्य: विशेषण का विशेष्य के साथ लिङ्ग, विभक्ति और वचन में मेल होता है — नूतनं भवनम् / नूतनः विद्यालयः (लिङ्ग); चतुरः बालः / चतुराः बालाः (वचन); बुद्धिमती गृहिणी / बुद्धिमत्या गृहिण्या (विभक्ति)।
  • सर्वनाम भी विशेषण: एतेन धनेन, एनं धर्मबुद्धिम्, तस्मिन् वृक्षे, कां कथाम्।
  • क्तवतु प्रत्यय से भूतकाल: प्राप्तवान्, गतवान्, दण्डितवन्तः — इन्हें वर्तमान में बदलना अभ्यास में है (जैसे — धनं प्राप्तवान् → धनं प्राप्नोति)।
  • अभ्यास-संकेत

  • "कः कं प्रति कथयति" — संवाद को पात्रों के साथ पढ़ें: "वत्स ! द्रुतं वद…" — पिता, पापबुद्धिं प्रति; "भोः दुरात्मन् ! मा मैवं वद" — धर्मबुद्धिः, पापबुद्धिं प्रति; "एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्" — पिता, जनान् प्रति।
  • कथाक्रम-अभ्यास के लिए घटनाएँ क्रम से याद रखें: परदेश-गमन → धन-अर्जन → धन गाड़ना → रात्रि-चोरी → खाली पात्र → धर्माधिकारी → शमी-कोटर → आग → सत्य।
  • सामान्य भूलें

  • "अपाय" को "उपाय" का पर्याय समझना — अपाय का अर्थ है विघ्न/हानि।
  • यह मान लेना कि वनदेवता सचमुच बोली — बोलने वाला पापबुद्धि का पिता था जो कोटर में छिपा था।
  • "आपः" को एकवचन रूप समझना — यह नित्य बहुवचनान्त है।
  • "लोष्ठवत्" का अर्थ "लोहे के समान" करना — सही अर्थ मिट्टी के ढेले/पत्थर के टुकड़े के समान है।
  • 💡 Key Learning Points

    • ✓पञ्चतन्त्र की धर्मबुद्धि-पापबुद्धि कथा को क्रम से समझना और सुनाना
    • ✓दूसरे के धन को 'लोष्ठवत्' मानने का नैतिक मूल्य — ईमानदारी
    • ✓'उपाय' और 'अपाय' का अन्तर — किसी योजना के दुष्परिणाम भी सोचना
    • ✓नित्य-बहुवचनान्त शब्द (आपः, दाराः, प्राणाः आदि) पहचानना
    • ✓विशेषण-विशेष्य का लिङ्ग-विभक्ति-वचन में मेल समझना

    👨‍🏫 Teaching Tips

    • →शुरुआती माँ-बेटे संवाद पर चर्चा करें — 'रास्ते में मिला धन किसका है?'
    • →कथा का नाट्य-रूपान्तरण कराएँ — धर्मबुद्धि, पापबुद्धि, पिता, धर्माधिकारी, जन
    • →घटनाओं को कार्डों पर लिखकर कथाक्रम में लगाने की गतिविधि कराएँ
    • →'मातृवत्परदारेषु' श्लोक पर मूल्य-चर्चा — ईमानदारी और समभाव
    • →नित्य-बहुवचनान्त शब्दों की सूची बनवाकर वाक्य-प्रयोग कराएँ
    • →विशेषण-विशेष्य मेल के लिए 'सही जोड़ी बनाओ' खेल कराएँ
    • →क्तवतु-वाक्यों को वर्तमान काल में बदलने का बोर्ड-अभ्यास कराएँ

    📋 Assessment Questions

    1. पापबुद्धिः किं चिन्तयित्वा देशान्तरं प्रस्थितः?
    2. धर्मबुद्धयः परद्रव्याणि कथं वीक्षन्ते?
    3. शमीकोटरे कः निगूढः आसीत्, सत्यं कथं प्रकटितम्?
    4. नित्यबहुवचनान्तानां पञ्च शब्दानाम् उदाहरणानि लिखत।
    5. 'राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः' — वर्तमानकाले परिवर्तयत।

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    All chapters in शारदा (Sharada) - Sanskrit Class 9

    1. 1. सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
    2. 2. सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
    3. 3. आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
    4. 4. न खलु वयस्तेजसो हेतुः
    5. 5. एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी
    6. 6. मनःपूतं समाचरेत्
    7. 7. उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
    8. 8. अन्नाद् आनन्दं प्रति
    9. 9. कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
    10. 10. णमो अरिहन्ताणम्
    11. 11. वर्णोच्चारण-शिक्षा २
    12. 12. परिशिष्टम् १: अन्वयः
    13. 13. परिशिष्टम् २: समासः
    14. 14. परिशिष्टम् ३: वाच्यम्
    15. 15. परिशिष्टम् ४: शब्दरूपाणि
    16. 16. परिशिष्टम् ५: धातुरूपाणि